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सिगरेट सरीखी धूम्रपान की अत्याधुनिक तरीकों पर रोक लगाने का केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का फैसला सराहनीय है. पिछले साल दिल्ली के एक जागरूक नागरिक ने अदालत में जनहित याचिका डाली थी कि निकोटिन लेने की इलेक्ट्रानिक युक्तियों, जैसे- ई-सिगरेट, ई-हुक्का या फिर ई-शीशा के प्रचलन पर रोक लगाये. याचिकाकर्ता के पक्ष में निर्णय देते हुए […]

सिगरेट सरीखी धूम्रपान की अत्याधुनिक तरीकों पर रोक लगाने का केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का फैसला सराहनीय है. पिछले साल दिल्ली के एक जागरूक नागरिक ने अदालत में जनहित याचिका डाली थी कि निकोटिन लेने की इलेक्ट्रानिक युक्तियों, जैसे- ई-सिगरेट, ई-हुक्का या फिर ई-शीशा के प्रचलन पर रोक लगाये. याचिकाकर्ता के पक्ष में निर्णय देते हुए अदालत ने सरकार को टोका था कि वह इन चीजों पर रोक क्यों नहीं लगा रही है?
इसके बाद मंत्रालय ने तुरंत पहलकदमी करते हुए निकोटिन लेने के इलेक्ट्रानिक तरीकों के उत्पादन, आयात और बिक्री पर रोक लगाने का जरूरी फैसला किया है. इस तरह जनहित याचिका की राह अपनानेवाले उस नागरिक का प्रयास रंग लाया. इस प्रकरण से यह भी सिद्ध हुआ है कि लोकतंत्र की विधि-आधारित प्रणाली में व्यापक लोकहित की कामना से एक नागरिक भी समुचित प्रयास करे, तो कामयाबी मिल सकती है. लेकिन, शासन-प्रशासन का संवेदनशील होना भी समान रूप से जरूरी है.
गैर-संक्रामक रोगों की बढ़वार के उपचार और रोकथाम पर बढ़ते खर्च के मद्देनजर स्वास्थ्य मंत्रालय का यह फैसला दूरदर्शितापूर्ण कहा जाना चाहिए. सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता के बीच जब तंबाकू से बने नशे के उत्पाद बेचनेवाली कंपनियों के लिए अपना बाजार बनाये और बढ़ाये रखना मुश्किल हो गया, तब उन्होंने चतुराई करते हुए ई-सिगरेट जैसे उत्पादों को धूम्रपान का ‘हानिरहित विकल्प’ कहकर बेचना शुरू कर दिया.
शोध-अध्ययनों में यह बार-बार संकेत किया गया है कि ई-सिगरेट का चलन धूम्रपान के अन्य प्रचलित रूपों से कम जहरीला होने के बावजूद बच्चों, किशोरों तथा गर्भ में पलते भ्रूण के लिए बहुत घातक है. लेकिन जागरूकता के अभाव में धूम्रपान का यह छद्म रूप भारत में एक दशक से फलता-फूलता आ रहा था. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2005 में ई-सिगरेट निर्माता सिर्फ एक ही कंपनी (चीन की) थी, परंतु अब यह 500 ब्रांडों तथा 8,000 स्वादों के तीन अरब डॉलर के वैश्विक व्यवसाय में तब्दील हो चुका है.
भारत में ई-सिगरेट का तकरीबन 50 फीसदी बाजार ऑनलाइन होता है और चीन इस उत्पाद का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. सरकार कुछ देर से सचेत हुई और उसने ई-सिगरेट के हानिकारक प्रभावों के आकलन के लिए बीते साल मई में विशेषज्ञों का एक कार्य-समूह बनाया. इस समूह का निष्कर्ष था कि ई-सिगरेट कैंसरकारक है तथा नशे की लत का रूप ले सकता है.
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के अध्ययन के अनुसार, भारत में कैंसर के 30 फीसदी मामले तंबाकू के उपभोग से जुड़े हैं और कैंसरजन्य मृत्यु (पुरुष) के 42 फीसदी घटनाओं में कारण सिर्फ तंबाकू है. ई-सिगरेट, ई-हुक्का आदि के उपभोग और बिक्री पर रोक को प्रभावी बनाने की कोशिशों के साथ तंबाकू सेवन के भयंकर नुकसानों को लेकर लोगों को सचेत करने के ठोस प्रयास भी होने चाहिए.
Prabhat Khabar Digital Desk
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