वैकल्पिक राजनीति की संभावना

Updated at : 05 Jul 2018 4:59 AM (IST)
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वैकल्पिक राजनीति  की संभावना

II मनींद्र नाथ ठाकुर II एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू manindrat@gmail.com भारतीय राजनीति अभी जिस मुकाम पर है, उसमें लोगों के अंदर बेहद निराशा फैल रही है. राजनीतिक दलों को लेकर अच्छे-खासे लोग आश्वस्त नहीं हो सकते हैं कि उनका उद्देश्य सही में क्या है. आप सोशल मीडिया में जरूर देख रहे होंगे कि कोई नेता जब […]

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II मनींद्र नाथ ठाकुर II
एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू
manindrat@gmail.com
भारतीय राजनीति अभी जिस मुकाम पर है, उसमें लोगों के अंदर बेहद निराशा फैल रही है. राजनीतिक दलों को लेकर अच्छे-खासे लोग आश्वस्त नहीं हो सकते हैं कि उनका उद्देश्य सही में क्या है. आप सोशल मीडिया में जरूर देख रहे होंगे कि कोई नेता जब सत्ता से बाहर होता है, तो सत्ता पक्ष की जिन बातों को जन-विरोधी बताता है, उन्हें ही सत्ता में आने के बाद सही कहने लगता है.
यही नहीं, बल्कि सख्ती से उन्हें लागू भी करता है. वे या तो पहले सही थे या अब सही हैं. दोनों एक साथ सही तो नहीं हो सकते हैं. ये वादे जुमलों में क्यों बदल जाते हैं? इसका क्या कारण है? कई लोग केवल पक्ष-विपक्ष में अपने को रखकर देखते हैं, इसलिए इन विरोधाभासों पर ध्यान नहीं जा पता है. लेकिन, इसके गहरे विश्लेषण की जरूरत है. कुछ ऐसी मजबूरी तो जरूर होगी, जिसके चलते राजनीतिक दल और उसके शीर्ष नेता ऐसा करते हैं.
एक मजबूरी तो शायद यह है कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ ताल-मेल बिठाना पड़ता है, जिसका मतलब है देसी और विदेशी पूंजी का साथ ताल-मेल बिठाना. दूसरी संभावना यह है कि केवल सत्ता तक पहुंचने के लिए जुमलों का इस्तेमाल किया जाता है और वास्तव में उनका उद्देश्य स्वार्थ साधना हो, ताकि अर्थोपार्जन कर स्विस बैंक में जमा किया जा सके. इन दोनों ही हालत में जनतंत्र को बहकाने के लिए वैकल्पिक राजनीति के बारे में सोचना लाजिमी हो जाता है.
आम आदमी पार्टी को भी इसी तरह का एक प्रयोग माना जा सकता है. इस प्रयोग के दो आयाम थे. एक जो मानता था कि राजनीति एक दलदल है और उसमें नहीं जाना चाहिए. दूसरे ने यह तय किया कि बिना उसके कोई उपाय ही नहीं है.
दोनों की परिणति को हम देख सकते हैं. एक तो फेल होने के कगार पर है और दूसरा अर्थहीन होने के. ऐसे में क्या अब कोई तीसरा रास्ता हो सकता है? यही आज खोज का विषय है. ऐसा सोचना कोई नयी बात नहीं है. गांधी और जयप्रकाश नारायण, जिन्हें भारत की जनता तो बड़ी संख्या में राजनीतिक आंदोलनों से जोड़ने का श्रेय दिया जा सकता है, दोनों ने ही जनतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका पर संदेह जताया है. क्या यह समय आ गया है, जब भारतीय जनतंत्र पार्टीविहीन व्यवस्था की बात सोचना शुरू करे?
इस परिवर्तन के दौर में राज्य की नीतियों और कार्यक्रमों से परेशान लोग यह समझने लगे हैं कि सभी राजनीतिक दल एक जैसे ही होते हैं. उनमें आंतरिक लोकतंत्र नाम मात्र का होता है और सत्ता में आने के लिए किसी भी उपाय को सही मानने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती है.
ऐसे में लोक हित के लिए जनता को कोई और संस्था बनानी होगी. प्रतिनिधियों को बीच में हटाये जाने से लेकर अपराधियों को राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर करने तक के सुझाव आ रहे हैं.
लेकिन, इन सबका कोई प्रभाव पड़ेगा, इस बात की उम्मीद करना बेकार है. राजनीतिक शक्ति के गलियारे में घूमनेवाले एक ज्ञानी व्यक्ति ने कई वर्षों पहले मुझे बताया था कि पार्टियों में शक्ति का श्रोत अब नीचे नहीं है, बल्कि ऊपर है. अब यह सही लगता है कि पार्टियों को काॅरपोरेट घरानों की तरह ही देखना सही नजरिया है.
फिर इससे अलग कुछ सोचने का सूत्र क्या होगा? भारत में लोगों ने कई ऐसे प्रयोग किये हैं. जिन्हें देख-समझकर कुछ सीखा जा सकता है. गांधी की कल्पना सही लगती है कि यदि सत्ता का प्रवाह नीचे से ऊपर करना हो, तो जमीनी स्तर पर राजनीतिक संस्थाओं का निर्माण करना होगा. पंचायती राज की कल्पना कुछ ऐसी ही थी कि ऊपर की संस्थाओं का निर्माण नीचे की संस्थाओं से गये हुए लोग करेंगे.
लेकिन, पंचायती राज के आधुनिक स्वरूप ने तो उसे विकास मुहैया करने का एक साधन मात्र मानकर रख दिया है. यह भ्रष्टाचार का लौकिकीकरण हो गया है.
गांधी के इस सैद्धांतिक आधार को लेकर यदि कुछ प्रयोगों को देखा जाये, तो शायद कुछ रास्ता निकल सकता है. इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण प्रयोग था शंकर गुहा नियोगी का छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा. एक सीमित क्षेत्र में इस प्रयोग ने यह सुनिश्चित किया था कि जनप्रतिनिधि करनेवाला आदमी उनका अपना हो.
इस जनांदोलन ने न केवल मजदूरों को शराब माफिया के विरोध में गोलबंद किया, बल्कि जनसेवा के लाेक-कल्याणकारी कार्यों के लिए भी व्यवस्था बनायी. उनके चिकित्सालय में किसी भी सर्जरी की फीस सौ-पचास रुपये से ज्यादा नहीं थी. स्वास्थ्य की जानकारी देने के लिए छोटे-छोटे बुकलेट निकलते थे. अपनी भाषा में अपना विद्यालय भी चलते थे.
अर्थोपार्जन के क्षेत्र में भी बड़े प्रयोग किये गये. इन सबके साथ राजनीति को भी साधने का प्रयास किया गया. 1990 के दशक में एक विधानसभा क्षेत्र में इनका उम्मीदवार केवल कुछ हजार रुपये खर्च कर जीत जाता था. लेकिन, इस प्रयोग का विस्तार नहीं हो पाया, क्योंकि नियोगी की हत्या हो गयी.
अभी फिर इस तरह के प्रयोग कि संभावना बढ़ रही है, क्योंकि लोग गांधी की तरह ही सेवा और राजनीति को एक साथ चलने की बात सोचने लगे हैं.
उदाहरण के लिए बिहार के औरंगाबाद में रामरेखा नदी को पुनर्जीवित करनेवाली संस्था गोकुल सेना के लोगों ने हजारों लोगों के कार सेवा से नदी को ठीक भी कर लिया और नहर का निर्माण भी कर लिया, उन्हें अब यह लगने लगा कि केवल इतने से काम नहीं चलेगा. राजनीतिक निर्णय प्रणाली को प्रभावित किये बिना इस क्षेत्र के विकास की योजनाओं को चला पाना संभव नहीं है. अब लोग इस मंथन में हैं कि राजनीति में जन-भागीदारी को कैसे सुनिश्चित की जाये.
एक तरीका यह सोचा जा रहा है कि नीचे से ऊपर तक लोक संसद का निर्माण किया जाये और सांसदों का चुनाव जनता स्वयं करे. चुने हुए लोगों को पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के चुनाव के लिए खड़ा किया जाये.
यदि अलग-अलग इलाकों में जनसेवा के लिए काम कर रही संस्थाओं का ऐसा ताना बन सके, तो शायद राजनीतिक दलों को अच्छा प्रतिद्वंद्वी मिल सकता है. इस पूरी प्रक्रिया में चुनावी खर्च भी कम होगा और प्रतिनिधि स्थानीय विकास के मुद्दों से भी जुड़े रहेंगे.
पार्टी हाईकमान की संस्कृति से मुक्ति मिल सकती है. देखना यह है कि इस तरह के प्रयोगों का विस्तार कितना हो सकता है. शायद आनेवाले समय में लोकतंत्र को बचाने का यही तरीका हो सकता है.
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