इस दौर का युवा

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार kshamasharma1@gmail.com पिछले दिनों दो दिन की वर्कशाप में आगरा जाना हुआ था. सवेरे-सवेरे स्टेशन के लिए जाते वक्त, रास्तेभर खाली सड़कों को देखती रही. दिल्ली में सड़कों का खाली दिखना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है. दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर बैग लेकर सीढ़ियां चढ़ रही थी और सोच रही […]
क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
kshamasharma1@gmail.com
पिछले दिनों दो दिन की वर्कशाप में आगरा जाना हुआ था. सवेरे-सवेरे स्टेशन के लिए जाते वक्त, रास्तेभर खाली सड़कों को देखती रही. दिल्ली में सड़कों का खाली दिखना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है.
दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर बैग लेकर सीढ़ियां चढ़ रही थी और सोच रही थी कि आखिर इन स्टेशनों पर लिफ्ट या एक्सेलेटर की सुविधा कब होगी, जिससे कि बुजुर्ग और दिव्यांग यात्रियों को आराम हो.
अपने यहां रेलवे स्टेशंस दिव्यांगों और उम्रदराजों के लिए आफत की तरह हैं. कई जगह तो एक सांस में इतनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं कि दम फूल जाता है. आगे बढ़ी कि एक युवक पास से गुजरा. उसने बैग को सहारा देते हुए कहा- आंटी, लाइये मैं पकड़ लेता हूं.
मैंने कहा- नहीं बेटा, ले जाऊंगी. लेकिन वह मेरे साथ ही चलने लगा. और एक तरफ से उसने बैग को सहारा दिया. प्लेटफाॅर्म पर पहुंचकर मैंने उसे धन्यवाद दिया और वह मुस्कुराते हुए एक तरफ चला गया.
गाड़ी में चढ़कर बैग को ऊपर रखने की कोशिश कर रही थी कि साथ में बैठी एक लड़की उठी और उसने उसे ऊपर रख दिया. आगरा स्टेशन आने पर पहले उसने मेरा बैग उतारा, तब अपना सामान. वर्कशाॅप के आयोजकों ने भी मुझे ले जाने के लिए दो लड़के भेजे थे. उन्होंने मेरा बैग उठाया तो मैं मना करने लगी- अपना सामान खुद उठाना चाहिए. मगर वे नहीं माने.
लौटते वक्त जब गाड़ी आ गयी, तो मैं अपने डब्बे की जगह ढूंढ़ने लगी, मगर प्लेटफाॅर्म पर कहीं उसका उल्लेख नहीं दिखा. पूछने पर पता चला कि दो डब्बे पीछे है वह डब्बा. अपनी उम्र को भूलकर मैं उस डिब्बे की तरफ दौड़ पड़ी.
अपने डब्बे में चढ़कर फिर अपना बैग ऊपर रखने की कोशिश कर रही थी कि पीछे से आवाज सुनायी दी- लाइये आंटी, मैं रख देता हूं. मैंने पीछे मुड़कर देखा, एक लंबा लड़का खड़ा था. उसके पीछे उसकी पत्नी और छोटा बच्चा था.
उसने मेरा बैग रख दिया. मैंने उसे शुक्रिया कहा. और इस बात पर खुशी हुई कि आज भी लोग आगे बढ़कर दूसरों की मदद कर देते हैं. इस यात्रा में ही कई बार मेरे साथ ऐसा हुआ, तो दूसरों के साथ भी होता ही होगा, मैं सोच रही थी.
अकसर युवाओं को कोसा जाता है कि वे बड़े मतलबी और स्वार्थी हैं. सफर में जहां कोई किसी को नहीं जानता, अविश्वास के इस युग में जहां लोग किसी पर भी भरोसा न करने के लिए कहते हैं, अपराध की घटनाओं का हवाला देते हैं, वहां ऐसी घटनाएं मन को छू लेती हैं. इस सफर में जो युवा बिना किसी स्वार्थ के मदद को आगे आये, शायद वे फिर कभी नहीं मिलेंगे, लेकिन एक खूबसूरत अहसास साथ छोड़ गये.
गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली थी. खिड़की के पास बैठकर बाहर भागते खेतों और दूर तक फैली हरियाली को देखने लगी. दूर जाता सूरज, उससे प्रतियोगिता करते, अपने-अपने घरों को लौटते पक्षी दृश्यों को और भी मनोहारी बना रहे थे.
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