मिलते रहिए, बुलाते रहिए

Updated at : 20 Feb 2018 5:57 AM (IST)
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मिलते रहिए, बुलाते रहिए

II कविता विकास II लेखिका माना की आप एकांतप्रिय हैं, मौन के हिमायती हैं. मेल-जोल पसंद नहीं, फिर भी चाहते हैं कि चार दोस्तों के बीच आपकी पूछ हो, लोग आपकी खैरियत पूछें और अपने बीच आपको न पाकर आपकी कमी महसूस करें. यानी आप किसी को पूछें या नहीं, पर आपको लोग जरूर याद […]

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II कविता विकास II

लेखिका

माना की आप एकांतप्रिय हैं, मौन के हिमायती हैं. मेल-जोल पसंद नहीं, फिर भी चाहते हैं कि चार दोस्तों के बीच आपकी पूछ हो, लोग आपकी खैरियत पूछें और अपने बीच आपको न पाकर आपकी कमी महसूस करें. यानी आप किसी को पूछें या नहीं, पर आपको लोग जरूर याद करें. तो फिर मेल-जोल बढ़ाना ही होगा. दोस्तों के साथ उठना-बैठना होगा. मोबाइल हर वक्त आपकी जेब में होता है. तो कभी कॉल लगाकर ही बात कर लें, इस जिद को छोड़कर कि वह नहीं करता, तो मैं क्यों करूं?

अपने दोस्तों के साथ संबंध बनाये रखना इस बात का भी परिचायक है कि आप एक संवेदनशील इंसान हैं और जिंदगी की जद्दोजहद में भी जीने का आनंद लेना जानते हैं. एक-दूसरे के शहर और घर आने-जाने में अनेक बातें हम अनायास ही सीख जाते हैं.

मसलन, यात्रा के दौरान के कष्ट हमें जिन अनुभवों से परिचित कराकर मानवता की पहचान कराते हैं, वहीं दूसरे के घर की साज-सजावट, खान-पान की विविधता, आवभगत के तरीके आदि, आप जब उनके घर जायेंगे, तभी सीख पायेंगे. इससे घरेलू जिंदगी में भी बदलाव आयेगा और ढर्रे पर चली जा रही जिंदगी में रोमांच और परिवर्तन भी.

मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने की मिसाल सदियों से दी जा रही है. पर, आज के युग में सामाजिकता कहीं दब सी गई है. दंभ-दिखावा, मान-अपमान की आड़ में लोग संकुचित होते जा रहे हैं. समय की कमी का भी रोना है. परंतु दुख-तकलीफ के समय यही मित्र होते हैं, जो आपको हाथों-हाथ थाम लेते हैं. हर मनुष्य की चाह होती है कि उसे मददगारों का सान्निध्य मिलता रहे.

आजकल तो सोशल मीडिया ने स्थान-विशेष की दूरी हटा दी है. अब मोबाइल के एक क्लिक पर देश-दुनिया के लोग फेस-टू-फेस बात कर लेते हैं. दुनिया अपनी जेब में प्रतीत होती है. कई ऐसे ग्रुप बन गये हैं, जिसमें एक शहर में रहनेवाले मित्र दो-तीन महीने में एक बार मिलने का भी प्रोग्राम बना लेते हैं.यह उदारता और मैत्री का उदात्त रूप है.

सम्मेलन या सेमिनार के सिलसिले में जब भी मुझे किसी दूसरी जगह जाना होता है, तो मैं वहां रहनेवाले मित्रों से संपर्क साधकर अवश्य मिलती हूं. पुराने मित्रों के साथ मिलने का जो आनंद है, वही नये बने मित्रों के साथ भी है. किसी से मिलने का भी मन तभी करता है, जब वह आत्मीय बन जाता है. फिर नये-पुराने का भेद कहां रह जाता है! ऐसे पलों को जरा जीकर तो देखिए.

दोस्तों को गर्मजोशी से गले लगाना, प्यार और आत्मीयता से बतियाना जेहन में खास जगह बना लेता है, जो हर पल आपको गुदगुदाता है. बाहर जाना संभव न हो तो कभी उन्हें ही घर बुला लें. एकरसता से मुक्ति मिलेगी और कई सवालों के हल भी मिल जायेंगे. छूअन का एहसास ऊर्जा तो देता ही है, आनंद का भी स्रोत है. पहल करके तो देखिए, आप जैसे अंतर्मुखी हृदय वाले भी बढ़कर आपको थाम लेंगे.

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