जंगलों में स्कूल का होना

Updated at : 14 Feb 2018 4:19 AM (IST)
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जंगलों में स्कूल का होना

II डॉ अनुज लुगुन II सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया anujlugun@cub.ac.in सुबह सूरज उगने के साथ ही जैव वनस्पतियों में हलचल शुरू हो जाती है. पत्ते अपनी बाहें खोलने लगते हैं और फूल मुस्कुराने लगते हैं. इन्हीं के बीच एक और रंग खिलता है- बच्चों के स्कूल ड्रेस का रंग, जो बिना किसी […]

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II डॉ अनुज लुगुन II

सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

anujlugun@cub.ac.in

सुबह सूरज उगने के साथ ही जैव वनस्पतियों में हलचल शुरू हो जाती है. पत्ते अपनी बाहें खोलने लगते हैं और फूल मुस्कुराने लगते हैं. इन्हीं के बीच एक और रंग खिलता है- बच्चों के स्कूल ड्रेस का रंग, जो बिना किसी शोर के मद्धम-मद्धम जंगल की पगडंडियां चलने लगता है.

यह वह भारत है, जहां बच्चे बासी भात या आधा पेट, बिना नाश्ता और टिफिन के अपनी अधूरी किताब-कॉपी को झोले में लटकाये सूरज के साथ दौड़ लगाते हैं. यह उदासीन भारत नहीं है, यह सपनों से भरा हुआ भारत है, जहां जिजीविषा है, संघर्ष है. यह जंगल में मोगली की कहानी से ज्यादा रोमांचकारी यथार्थ है.

औपनिवेशिक समय में ईसाई मिशनरियों ने चर्च के साथ-साथ स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों इत्यादि के साथ जंगलों में प्रवेश किया था और उन्होंने कथित आधुनिकता के विचार को वहां के लोगों में आरोपित करना शुरू किया. धर्म प्रचार के उद्देश्य से गये मिशनरियों ने सेवा के नाम पर शिक्षा के क्षेत्र में अविस्मरणीय पहल की. यद्यपि महान अफ्रीकी लेखक न्गुगी वा थ्यांगों कहते हैं कि यह मानसिक गुलामी की प्रक्रिया का अनिवार्य चरण है, लेकिन सांस्कृतिक रूपांतरण का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह था जहां सांस्कृतिक राजनीति से ज्यादा सेवा कर्म प्रभावी था.

इन्होंने जंगल की दुनिया को बाकी वैश्विक दुनिया के संपर्क में लाया. इससे एक ओर बाहर की दुनिया को समृद्ध संसाधनों का ज्ञान हुआ, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदायों के यहां प्रतिरोध की नयी वैकल्पिक संस्कृति निर्मित हुई. इसी से बिरसा मुंडा के रूप में आदिवासी प्रतिरोध की आधुनिक चेतना पैदा हुई और मेनास राम ओड़ेया का ‘मतु रअ: कहनि’ मुंडा जीवन का बृहद कोश लिखित रूप में पहली बार संभव हुआ.

बाद में जब देश में नवजागरण का विचार आया, तब धीरे-धीरे भारतीयता के देशज विचार के साथ वे सेवा संस्थाएं और आश्रम जंगलों की तरफ रुख करने लगे. अब यहां से दो विचारों के बीच प्रतिस्पर्धा के साथ शिक्षा की बात कही जाने लगी. सेवा संस्थाएं और आश्रम वालों के यहां देशज शिक्षा के नाम पर पुनुरुत्थानवादी वैदिक-पौराणिक विचार हैं.

यूनिसेफ आदि संस्थाओं की योजनाओं और प्रोत्साहन से खुल रहे अभियान स्कूलों ने शिक्षा की पहुंच का विस्तार किया है. अब कई जगह नये स्कूल खुल रहे हैं और कई प्राथमिक स्कूलों को अपग्रेड किया जा रहा है. नवोदय विद्यालय भी खुल रहे हैं. छात्राओं के लिए कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय खुल रहे हैं, लेकिन इन सबके बावजूद स्कूलों का भारी अभाव है.

आमतौर पर जनसंख्या के अनुपात को देखकर स्कूलों के खोलने का निर्णय लिया जाता है, लेकिन जंगल के अंचलों में जनसंख्या का घनत्व कम होने के कारण बच्चों से स्कूल की पहुंच दूर है.

मसलन, झारखंड के अंचलों में एक बच्चे को अनुमानत: दस किमी की दूरी पैदल या साईकिल से तय करनी होती है. स्कूल के लिए विद्यार्थियों से संबंधित जरूरी कागजात जैसे जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र स्थानीय प्रमाण पत्र आदि के अलावा शिक्षकों से संबंधित जरूरी काम के लिए प्रखंड मुख्यालय की दूरी भी दस किमी से ज्यादा होती है. जिला मुख्यालय तो पचास किमी से भी ज्यादा दूर है. जंगली पहाड़ी रास्तों में परिवहन की व्यवस्था न होने से यह दूरी कष्टप्रद होती है. ‘डिजिटल इंडिया’ के बावजूद यहां नेटवर्क की कोई सुविधा नहीं है. स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा ठप रहती है. ऑनलाइन ऑफिशियल डाउनलोड-अपलोड संभव ही नहीं है. इन सबका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है.

जंगल के अंचलों में सबसे बड़ी चुनौती शिक्षकों की उपलब्धता की है. शिक्षकों की कमी की वजह से कुछ ही विषय पढ़ाये जाते हैं.अल्पसंख्यक स्कूल शिक्षकों की पूर्ति के लिए निजी प्रयास करते हैं, वहीं सरकार शिक्षा मित्र या पारा शिक्षकों से काम चलाती है. ऐसा नहीं है कि हमारी सरकारें शिक्षकों के अभाव से अनभिज्ञ हैं. एक ओर संसाधनों के अभाव में कुछ शिक्षक सुदूर इलाकों में अपनी पोस्टिंग से बचते हैं, और ट्रांसफर के जुगाड़ में होते हैं, वहीं दूसरी ओर नीतिगत सरकारी उदासीनता जंगल के क्षेत्रों में शिक्षा प्रतिबद्ध शिक्षकों के उत्साह को भी निराश करती है. शिक्षा के प्रति सामाजिक दायित्व का अभाव बहुत बड़ी विडंबना है.

भले ही आज की दुनिया वैश्वीकरण की दुनिया है, भले ही आज हम वैश्विक बाजार की गिरफ्त में उदारवादी-पूंजीवादी तरीके से विकास की दौड़ में शामिल हो रहे हैं, लेकिन इसकी गिरफ्त में शिक्षा को लेना समाज के लिए घातक है. इससे समाज में विभाजन की खाई घातक होगी. जंगल के सुदूरवर्ती अंचलों के विद्यार्थियों और शहरों के विद्यार्थियों की शिक्षा के हर चरण में गहरा फर्क है, इसके बावजूद खुली प्रतियोगिता में दोनों को समान रूप से उतरना पड़ता है.

शहरों में हर कोई प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम की तरफ रुख कर रहा है और सरकार भी शिक्षा के निजीकरण पर जोर दे रही है, लेकिन उन सुदूर ग्रामीण जंगली अंचलों में कौन है, जो शिक्षा का निवेश करने जायेगा? कौन दलित-आदिवासी, गरीब ग्रामीण जनता है, जो इतनी महंगी शिक्षा को खरीद सकेगा? उन क्षेत्रों में नक्सलियों के डर का प्रचार करने के बजाय इस कड़वी वास्तविकता का सामना हम सबको करना पड़ेगा कि समाज में बढ़ती खाई ही विद्रोहों को जन्म देती है.

जंगल में स्कूल होना मुहावरा नहीं है. लेकिन, जंगल में स्कूल होना स्कूल होने की जरूरत है. हमारे देश के सुदूरवर्ती इलाके जिन चीजों से वंचित हैं, वह लोकतंत्र ही है. अधूरे बुर्जुआ लोकतंत्रीकरण का ही परिणाम है जनता के लिए बुनियादी सुविधाओं का न होना.

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