स्वास्थ्य पर जोर

Updated at : 13 Feb 2018 3:49 AM (IST)
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स्वास्थ्य पर जोर

राज्य और केंद्र शासित प्रदेश लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने में किस हद तक कामयाब है, इस बारे में नीति आयोग ने एक स्वास्थ्य सूचकांक (हेल्थ इंडेक्स) रिपोर्ट जारी की है. इसमें 2014-15 को आधार वर्ष मानकर 2015-16 तक की अवधि में स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता के आधार पर राज्यों के प्रदर्शन की तुलना […]

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राज्य और केंद्र शासित प्रदेश लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने में किस हद तक कामयाब है, इस बारे में नीति आयोग ने एक स्वास्थ्य सूचकांक (हेल्थ इंडेक्स) रिपोर्ट जारी की है. इसमें 2014-15 को आधार वर्ष मानकर 2015-16 तक की अवधि में स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता के आधार पर राज्यों के प्रदर्शन की तुलना करते रैंकिंग दी गयी है. यह पहल कई कारणों से सराहनीय है.

आम तौर पर लोग यह तो जानते हैं कि स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना राज्यों की जिम्मेदारी है और केंद्र इसके लिए वित्तीय तथा नीतिगत सहायता देता है, लेकिन हर साल ऐसा कोई दस्तावेज प्रकाशित नहीं होता था, जिससे सेवा के विस्तार और गुणवत्ता के बारे में पता चले. इस सूचकांक से राज्यों पर कामकाज बेहतर करने का दबाव बढ़ेगा.

दूसरे, एक उम्मीद यह भी है कि मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था की खस्ताहाली ठोस बहस का विषय बनेगी और सुधार को लेकर विभिन्न पक्ष अपनी समझ स्पष्ट करेंगे. इस सूचकांक का मुख्य संदेश है कि जिन राज्यों ने साक्षरता, पोषण और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के विस्तार पर समुचित निवेश किया है, उनका प्रदर्शन अन्य राज्यों से अच्छा है.

केरल, तमिलनाडु तथा पंजाब सबसे बेहतर प्रदर्शन करनेवाले राज्य हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा ओडिशा सर्वाधिक पिछड़े राज्य हैं. दूसरा बड़ा संदेश यह है कि बाकी राज्यों से आगे दिखते केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य 2014-15 की तुलना में 2015-16 में पिछले प्रदर्शन में खास सुधार नहीं कर सके हैं. मिसाल के लिए, नवजात शिशुओं की मृत्यु दर कम करने में राज्यवार रैकिंग पर गौर किया जा सकता है. देश के 21 बड़े राज्यों में केवल पांच राज्य (आंध्र प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़ और झारखंड) ही आधार वर्ष (2014-15) की तुलना में अपना प्रदर्शन सुधार पाये हैं.

स्वास्थ्य के मोर्चे पर राज्यों की रैंकिंग से बेशक एक अहम जरूरत पूरी हुई है, परंतु स्वास्थ्य के मद में केंद्र से मिलनेवाली वित्तीय और नीतिगत सहायता के सवाल को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. नेशनल हेल्थ अकाउंट्स, 2014-15 के तथ्य बताते हैं कि स्वास्थ्य पर होनेवाले कुल खर्च का दो तिहाई से ज्यादा (67 फीसदी) अभी लोगों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है. उद्योग जगत की अहम संस्था सीआइआइ की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक देश में मौजूद स्वास्थ्य सेवा के ढांचे का 70 फीसदी हिस्सा सिर्फ 20 शहरों तक सीमित है और 30 फीसदी भारतीय प्राथमिक स्तर की भी चिकित्सा सुविधा से वंचित है.

लिहाजा, देश में चिकित्सा सेवा के ढांचागत विस्तार की बड़ी जरूरत है, पर सेहत के मद में सरकार अभी जीडीपी का बहुत ही थोड़ा हिस्सा (1.25 फीसदी) ही खर्च करती है. भारत सेहत के मोर्चे पर खर्च के लिहाज से दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों से भी पीछे है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आयोग की रिपोर्ट से स्वास्थ्य सेवा के मसले पर देश में नयी शुरुआत होगी.

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