पानी-बिजली नहीं बना चुनावी मुद्दा

Published at :18 Apr 2014 4:04 AM (IST)
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पानी-बिजली नहीं बना चुनावी मुद्दा

एक रिपोर्ट आयी है, जिसमें कहा गया है कि रांची में 14 साल में जलस्तर 140 फुट नीचे चला गया है. यही हाल अधिकांश झारखंड का है. खास तौर पर शहरी इलाकों का. बिजली की बात करें, तो राजधानी को छोड़ अन्य जिलों में बिजली की स्थिति बहुत खराब थी. लेकिन, अब तो रांची की […]

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एक रिपोर्ट आयी है, जिसमें कहा गया है कि रांची में 14 साल में जलस्तर 140 फुट नीचे चला गया है. यही हाल अधिकांश झारखंड का है. खास तौर पर शहरी इलाकों का. बिजली की बात करें, तो राजधानी को छोड़ अन्य जिलों में बिजली की स्थिति बहुत खराब थी. लेकिन, अब तो रांची की बिजली भी खराब हो गयी है. राज्य के एक बड़े इलाके में डीवीसी द्वारा बिजली की आपूर्ति की जाती है, लेकिन खुद डीवीसी गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है.

झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड की हालत भी अच्छी नहीं है. इसलिए बिजली की दुर्दशा है. लेकिन, इन सबके बाद भी पानी-बिजली चुनावी मुद्दा नहीं बन सका. हो सकता है कि विधानसभा चुनाव में भी यह मुद्दा नहीं बने. ऐसा इसलिए क्योंकि चुनाव मुद्दे पर लड़े ही नहीं जा रहे हैं. राजनेताओं को चुनाव जीतने का समीकरण अच्छी तरह आता है. ऐन चुनाव के वक्त राजनेता ऐसा खेल करते हैं कि असली मुद्दा गौण हो जाता है और जनता उनकी चाल में फंस जाती है. यह विडंबना है कि राज्य के लोगों को पानी नहीं मिल रहा. ऐसा भी नहीं है कि 14 साल से सूखा ही पड़ रहा है.

एक-दो साल को छोड़ दिया जाये, तो अच्छी बारिश होती रही है. लेकिन वर्षा जल को रोकने की व्यवस्था नहीं है. राज्य में जो बड़े-बड़े डैम हैं, जहां से पानी की आपूर्ति होती है, उनकी सफाई नहीं होती. आबादी बढ़ती गयी और नये डैम नहीं बने. ऐसे में पानी कहां से आयेगा? बहुमंजिली इमारतें बन गयीं, बोरिंग कर धरती का पानी तो निकाल लिया गया, लेकिन जलस्तर ऊपर लाने का प्रयास नहीं किया गया. यह तभी संभव है जब सरकार के पास विजन हो और वह उसकी प्राथमिकता में दिखे. कमजोर सरकार का ध्यान इस ओर नहीं रहा.

यही हाल है बिजली का. जो पावर प्लांट सफेद हाथी बन गये हैं, उन्हें बंद करना चाहिए. नौ की लकड़ी और नब्बे खर्च वाली कहावत है. उन्हें या तो बंद करें या उन्नत करे. नये पावर प्लांट बन नहीं रहे. जो निजी प्लांट बन भी रहे थे, उन कंपनियों की हालत खराब हो गयी. ओड़िशा जैसे राज्य बिजली में झारखंड से काफी आगे हैं. यहां संसाधन रहते हुए भी बिजली का उत्पादन नहीं होता. स्पष्ट है कि नीतियां गड़बड़ हैं. इन्हें सुधारने बगैर राज्य की जनता को पानी-बिजली नहीं मिल सकता.

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