अब तो बहुत बदल गया चुनावी माहौल

।। बृजेंद्र दुबे।। (प्रभात खबर, रांची) देश में चुनाव की गूंज है. मतदान के चार चरण पूरे हो चुके हैं. लेकिन कहीं कोई सनसनी नहीं, कोई उत्साह नहीं. इस बार चुनाव का सारा शोर टेलीविजन और अखबारों में है. बड़े-बड़े नेता भी टीवी पर आकर अपनी बात रख रहे हैं. राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर […]
।। बृजेंद्र दुबे।।
(प्रभात खबर, रांची)
देश में चुनाव की गूंज है. मतदान के चार चरण पूरे हो चुके हैं. लेकिन कहीं कोई सनसनी नहीं, कोई उत्साह नहीं. इस बार चुनाव का सारा शोर टेलीविजन और अखबारों में है. बड़े-बड़े नेता भी टीवी पर आकर अपनी बात रख रहे हैं. राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक के नेताओं को लेकर उड़नखटोले ऐसे उड़ रहे हैं, जैसे पक्षियों का झुंड आसमान में किल्लोल कर रहा हो.
जमीन पर कहीं कोई रस नहीं. कौन जीत रहा, कौन हारेगा, किसकी जमानत जब्त होगी. इसकी चर्चा नदारद है. मुङो याद है कि मेरे बचपन में चुनाव होते थे, तो शहर से लेकर गांव-गांव तक एक जोश होता था, त्योहार जैसा माहौल बन जाता था. प्रत्याशियों का एक ईमानदार समर्थक वर्ग होता था. ये लोग अपने नेता को जिताने के लिए दिन-रात एक कर देते थे. तर्क-कुतर्क भी होते थे. खाने-पीने का इंतजाम भी रहता था. शाम को कुछ नकद भी पा जाते थे समर्थक. पैसा बाजार में बहता था. बहुत लोगों को तो चुनाव में दो-चार जोड़ा कुरता-धोती भी मिल जाता था. प्रत्याशी भी आम आदमी की तरह गांव-गांव धूल फांकते घूमते थे. हालांकि जीतने के बाद कभी नहीं आते थे.
उनका दर्शन अगले चुनाव में ही होता था. फिर भी कहीं कोई शिकायत नहीं, सब नये सिरे से उम्मीद पाल कर उनके पीछे हो लेते थे. और बार-बार जिता कर अपने नेता को संसद या विधानसभा भेज दते थे. कितने भोले लोग थे. बार-बार ठगे जाते थे, लेकिन कहीं कोई शिकायत नहीं होती थी. लोग कम में ही संतुष्ट थे. बड़े-बड़े लोग विरोधियों के घर भी जाकर वोट मांगते थे. वोट मिले या नहीं, सत्कार खूब होता था. पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर जी के बारे में तो कहा जाता था कि वे उत्तर प्रदेश के बलिया सीट से अपने चुनाव प्रचार अभियान का श्रीगणोश अपने वर्षो पुराने चिर प्रतिद्वंद्वी जगन्नाथ चौधरी (कांग्रेस) के घर वोट मांग कर ही करते थे. जीतने के बाद भी चंद्रशेखर जीत की पहली बधाई भी अपने विरोधी से लेते थे. यानी चुनाव खत्म, फिर सब एक.
लेकिन अब चुनाव का सारा परिदृश्य बदल चुका है. सब कुछ हाइटेक है. लेकिन एक चीज पुराने चुनावों जैसी है. पहले की तरह नेता सत्ता के लिए अब भी जनता को ऐसे सपने दिखा रहे हैं, जो शायद कभी पूरे न हों. कुछ नेताओं का कद इतना बड़ा हो गया है कि उनके सामने उनकी अपनी ही पार्टियां छोटी हो गयी हैं. चुनावी हमले कटुता पूर्ण हो चुके हैं. सब मैदान में एक-दूसरे की कलई खोल रहे हैं. निजी हमलों के तड़के सुर्खियां बन रहे हैं. जाति-बिरादरी, हिंदू-मुसलमान के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं. चुनावी माहौल को तेजाबी बना दिया गया है. असली मुद्दे कहीं खो गये हैं. फिर भी गजोधर खुश हैं, उनकी चिंता अलग ही है. गजोधर कहते हैं कि जैसे भी हो, जल्दी नयी सरकार बन जाये. दस साल तक मौन रहे मनमोहन खुले में सांस लें. वरना विदाई वेला में भी ‘बेचारे’ पर आरोपों के नये-नये ‘बम’ फूटते रहेंगे.
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