यह सबका देश है

Updated at : 11 Sep 2017 6:43 AM (IST)
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यह सबका देश है

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार कर्नाटक के शृंगेर (चिकमगलूर) के पचास वर्षीय भाजपा विधायक डीएन जीवराज ने कहा है कि अगर गौरी लंकेश (29 जनवरी, 1962 – 5 सितंबर, 2017) ‘आरएसएस के खिलाफ न लिखतीं तो जिंदा होतीं.’ डीएन जीवराज के अनुसार, ‘गौरी जिस तरह लिखती थीं, वो बर्दाश्त के बाहर था.’ बाद में जीवराज ने अपने […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

कर्नाटक के शृंगेर (चिकमगलूर) के पचास वर्षीय भाजपा विधायक डीएन जीवराज ने कहा है कि अगर गौरी लंकेश (29 जनवरी, 1962 – 5 सितंबर, 2017) ‘आरएसएस के खिलाफ न लिखतीं तो जिंदा होतीं.’ डीएन जीवराज के अनुसार, ‘गौरी जिस तरह लिखती थीं, वो बर्दाश्त के बाहर था.’ बाद में जीवराज ने अपने बयान को ‘मीडिया द्वारा की गयी गलत व्याख्या’ कहा.

कवि, कथाकार, नाटककार, अनुवादक, पटकथा लेखक, पत्रकार पी लंकेश (8 मार्च, 1935-25 जनवरी, 2000) की साहसी, निर्भीक, सत्यवादी, प्रतिबद्ध 55 वर्षीय सक्रियतावादी पत्रकार बेटी गौरी लंकेश ने सोलह पृष्ठीय विज्ञापन रहित पंद्रह रुपये की कन्नड़ साप्ताहिक पत्रिका ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ द्वारा सदैव सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठायी. वे संघ परिवार के हिंदुत्व ब्रांड की मुखर आलोचक थीं. उनकी सक्रियता बहुस्तरीय थी. लेखन के अतिरिक्त सेमिनार और काॅन्फ्रेंसाें के आयोजन के साथ समान विचारों से जुड़े व्यक्तियों, संगठनों तक उनकी सक्रियता थी. वे कई वर्ष तक बेंगलुरु और दिल्ली में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की संवाददाता थीं.

कई वर्ष तक ‘संडे’ पत्रिका की भी संवाददाता रहीं. पिता पी लंकेश ने 1980 में बैंगलोर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के सहायक प्रोफेसर का पद छोड़कर कन्नड़ टैबलॉयड ‘लंकेश पत्रिके’ का प्रकाशन आरंभ किया था, जिसका कन्नड़ संस्कृति और राजनीति पर विपुल प्रभाव पड़ा. 2005 में गौरी लंकेश ने ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ शुरू की. पिता लंकेश ने अपनी पत्रिका का मॉडल गांधी के ‘हरिजन’ पत्र काे बनाया था. गौरी लंकेश ने अपनी पत्रिका को स्वयं एक मॉडल बना दिया. उन्होंने अपनी पत्रिका के द्वारा बसवन्ना (1105-1168) और आंबेडकर के संघर्ष को आगे बढ़ाया. वे वाम विचारधारा से जुड़ी थीं और उन्होंने कई नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने का कार्य किया था.

उनकी खरी, निर्भीक, दो टूक और साहसी आवाज सीधे जनता की भाषा और मुहावरों में जनता तक पहुंचती थी. उनकी चिंता के केंद्र में दलित, किसान और हाशिये के समुदाय थे. वे सोशल मीडिया पर पर सक्रिय थीं. उनके फेसबुक पेज पर रोहित वेमुला का चित्र था और ट्विटर पर कन्हैया कुमार का. 27 वर्ष पहले उनका उनके पति चिदानंद राजघट्टा से तलाक हुआ था. उसके बाद भी दोनों का हमेशा मैत्रीपूर्ण संबंध रहा. गौरी लंकेश की संतानें केवल दो (आशा और ऊषा) ही नहीं हैं. उन्होंने जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार, शेहला राशिद और उमर खालिद को अपनी संतानें कहा है. कन्हैया कुमार ने स्वीकारा है कि इस मां ने उन्हें सत्ता के सामने सच बोलना सिखाया है.

वर्ष 2003 में ही गौरी लंकेश ने संघ परिवार के विरुद्ध कन्नड़ लेखकों और समान मानस के संपादकों को एकत्र और प्रेरित किया था. कर्नाटक दक्षिण का पहला राज्य है, जहां भाजपा की सरकार बनी.

सरकार बनने से पहले गौरी लंकेश ने संघ परिवार के हिंदुत्ववादी एजेंडे का मुखर विरोध किया था. कर्नाटक में स्वतंत्र चिंतकों और उदारवादी लेखकों-पत्रकारों पर पहले से खतरे हैं. गौरी लंकेश लिंगायत थीं. थोंटाडरया मठ के निजग्रबानंद स्वामी लिंगायतों को अलग धार्मिक संप्रदाय के रूप में मान्यता दिलाने के लिए आंदोलनरत हैं, जबकि संघ परिवार इसका विरोधी है. गौरी लंकेश धर्म, संप्रदाय, विभेद, जाति-व्यवस्था, अंधास्था सबके खिलाफ थीं.

लिंगायत वे केवल कहने भर को थीं. रोहिंग्या मुसलमानों और नोटबंदी से हुए नुकसान पर उन्होंने लिखा. ‘कंडा हागे’ (जैसा मैंने देखा) नाम से अपने पत्र में वे कॉलम लिखती थीं. 13 सितंबर का संपादकीय ‘फेक न्यूज’ पर है. इसमें उनके मित्र डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह भारत में फेक न्यूज बनाने के कारखाने के बारे में लिखा. वे सच के साथ थीं और झूठ के विरुद्ध. जिस समय सच कहने से रोका जा रहा हो, उस समय गौरी ने अपने लेखन और कार्य से यह उदाहरण पेश किया कि पत्रकारों, मीडियाकर्मियों काे सदैव सच के साथ रहना चाहिए. ‘सत्यमेव जयते’ वाले देश में जो सच के साथ नहीं है, वह देश के साथ भी नहीं है.

वर्ष 1992 से अब तक के 25-26 वर्ष में भारत में 70 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. यह नव उदारवादी अर्थव्यवस्था का दौर है. सोशल मीडिया और ट्विटर पर गौरी लंकेश की हत्या का जश्न मनानेवाले कम नहीं हैं. यूआर अनंतमूर्ति के निधन पर ही नहीं, गांधी की हत्या पर भी मिठाइयां बांटी गयी थी. दाभोलकर, पनसारे, कलबुर्गी और अब गौरी लंकेश की हत्या से भय उत्पन्न किया जा रहा है. राजनीतिक माहौल ही नहीं, सामाजिक माहौल भी बदलने की कोशिश जारी है.

महाराष्ट्र और कर्नाटक की सरकारों ने दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी के हत्याराें को नहीं पकड़ा है. बेशक गौरी लंकेश वामपंथी, संघ विरोधी, हिंदुत्व की मुखर आलोचक, नक्सलियों के प्रति सहानुभूतिशील और व्यवस्था विरोधी थीं. उनके हत्यारे आैर हत्यारों के संगठन जनतंत्र विरोधी, संविधान विरोधी ही नहीं, राष्ट्रविरोधी भी हैं, क्योंकि यह देश सबका है, किसी एक मत, धर्म, संप्रदाय और विचारधारा के प्रवक्ताओं और अनुयायियों का नहीं है.

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