निराधार नहीं श्रीनिवासन पर आरोप

।। अभिषेक दुबे।।(वरिष्ठ खेल पत्रकार) क्रिकेट के मैदान में सचिन तेंडुलकर और सर डॉन ब्रैडमैन में से महानतम कौन है, इसे लेकर बहस की गुंजाइश है, लेकिन इसमें दो राय नहीं की मैदान के बाहर एन श्रीनिवासन ‘खिलाड़ियों के खिलाड़ी’ साबित हुए हैं. दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड में जब से शरद पवार की […]
।। अभिषेक दुबे।।
(वरिष्ठ खेल पत्रकार)
क्रिकेट के मैदान में सचिन तेंडुलकर और सर डॉन ब्रैडमैन में से महानतम कौन है, इसे लेकर बहस की गुंजाइश है, लेकिन इसमें दो राय नहीं की मैदान के बाहर एन श्रीनिवासन ‘खिलाड़ियों के खिलाड़ी’ साबित हुए हैं. दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड में जब से शरद पवार की बादशाहत खत्म हुई है, श्रीनिवासन ने ऐसा बेधड़क राज किया है जिसकी कोई मिसाल नहीं है. दो महीने पहले उन्होंने क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (आइसीसी) को जिस तरह से घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, यह साफ हो गया कि फॉमरूला वन के तानाशाह बर्नी अकोल्स्टों या फिर फीफा के डॉन सेप ब्लात्तेर की तरह वे क्रिकेट के बेताज निरंकुश शासक बनने की ओर हैं. लेकिन अहम सवाल है कि क्या देश की सबसे बड़ी अदालत ने उनके बेजा अरमानों पर ब्रेक लगा दिया है? जो पूरी दुनिया को दिख रहा था, उसे देखने में बीसीसीआइ के बाकी अधिकारियों ने क्यों आंखों पर पट्टी बांध रखी है, जिसमें भारतीय राजनीति के बड़े दलों के सूरमा भी शामिल हैं? क्या आखिरकार वे अपना विकेट खो देंगे?
सुप्रीम कोर्ट के कथन के बावजूद श्रीनिवासन अपनी जिद पर अड़े हैं, लेकिन सवाल है कि कब तक? बोर्ड में श्रीनिवासन के सहयोगियों को यह डर सता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी करने पर उनका कहीं वही हश्र न हो, जो सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय का हुआ. बोर्ड के अधिकारियों को यह भी खतरा सता रहा है कि अदालत अपने आदेश में न सिर्फ श्रीनिवासन को हटाने का फैसला सुना दे, बल्कि बोर्ड का कामकाज देखने के लिए किसी पूर्व या मौजूदा जज को जिम्मेवारी न दे दे. 2004 में जगमोहन डालमिया और शरद पवार के लिए बादशाहत की लड़ाई ने खतरनाक रास्ता अख्तियार कर लिया था, तभी अदालत ने जज एस मोहन को बोर्ड के काम की देखरेख करने को कहा था. इस तरह के किसी भी फैसले से बोर्ड के अधिकारियों को अपनी स्वायत्तता खत्म होने का डर है, जिसके गंभीर दूरगामी परिणाम हो सकते हैं.
बोर्ड में एन श्रीनिवासन से पहले भी माधव राव सिंधिया, जगमोहन डालमिया से लेकर शरद पवार जैसे मुखिया हुए, लेकिन अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद इन्होंने दूसरे को मौका दिया. इसी वजह से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की दूसरे भारतीय खेल संगठनों से अलग पहचान बन सकी. शरद पवार के दौर में, ललित मोदी की अगुवाई में इंडियन प्रीमियर लीग का जन्म हुआ और इसके बाद दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड में बेताज पावरसेंटर बनने की गुंजाइश बनी. इंडियन प्रीमियर लीग के संस्थापक पूर्व मुखिया इस ओर बढ़ रहे थे कि एक ट्वीट ने उनके अरमानों के पंख कतर दिये. यहां श्रीनिवासन ने मौका देखा और वे सभी नियमों को ताक पर रखते हुए आगे बढ़ते चले गये. श्रीनिवासन बोर्ड के अध्यक्ष बने और इंडियन प्रीमियर लीग की एक टीम चेन्नई सुपर किंग्स के अघोषित मालिक भी. उन्होंने प्राइवेट लीग में अपनी टीम की ताकत बनाये रखने के लिए तमाम तरह की मनमानी की, जिसमें कोच्चि और सहारा जैसी नयी टीम की एंट्री के बावजूद क्रीम खिलाड़ियों पर कुंडली मार कर बैठना भी शामिल था. एक दौर ऐसा भी आया, जब बीसीसीआइ के मुख्य चयनकर्ता चेन्नई सुपर किंग्स के ब्रांड अंबेसडर थे और भारतीय टीम के कप्तान धौनी चेन्नई सुपर किंग्स के भी कप्तान. जाहिर तौर पर बोर्ड से लेकर भारतीय टीम तक श्रीनिवासन का वर्चस्व था और हर कोई शांत होकर यह खेल देखता जा रहा था.
लेकिन हद तब हो गयी, जब चेन्नई सुपर किंग्स के कर्ताधर्ता मयप्पन को श्रीनिवासन ने एक जोशीला क्रिकेट प्रशंसक बता दिया, जब उन पर सट्टेबाजी और फिक्सिंग के आरोप लगे. जब दबाव बढ़ा, तो उन्होंने कुछ वक्त के लिए खुद को बीसीसीआइ से अलग तो कर लिया, लेकिन दूसरों की आंखों में धूल झोंकने के लिए एक समिति से क्लीन चिट ले ली. सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति को गैर कानूनी करार दिया और मुद्गल समिति की नियुक्ति कर दी. समिति की रिपोर्ट से साफ था कि सट्टेबाजी और फिक्सिंग जैसे आरोप बेबुनियाद नहीं और निष्पक्ष जांच के लिए श्रीनिवासन का हटना जरूरी है, बावजूद इसके उन्होंने विश्व क्रिकेट में अपना दबदबा बनाये रखने के लिए एक व्यापक रोडमैप को अमली जामा पहना दिया. बोर्ड में श्रीनिवासन के करीबी लोगों की मानें, तो वे इस बात की भी पूरी तरह से तैयारी कर चुके थे कि सितंबर के बाद भी बोर्ड के अध्यक्ष बने रहेंगे, या किसी करीबी को इस पद पर बिठा देंगे.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अब्जर्वेशन के बाद उनको अध्यक्ष पद खाली करना पड़ सकता है. ग्लोबल क्रिकेट का निरंकुश तानाशाह बनने का उनका अरमान तार-तार हो गया है. पर सबसे बड़ा सवाल यह है किजो काम बोर्ड के दूसरे भारी-भरकम अधिकारियों को करना चाहिए था, वह काम आखिर देश की सबसे बड़ी अदालत को क्यों करना पड़ा!
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