शासन की सुस्ती पर कोर्ट की फटकार

मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में पिछले साल सितंबर में हुए दंगों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को जिम्मेवार मानते हुए कहा है कि यह घटना प्रशासनिक विफलता का परिणाम थी. इन दंगों में 60 से अधिक लोगों की जान गयी थी, जबकि 40,000 से अधिक लोगों को विस्थापित […]
मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में पिछले साल सितंबर में हुए दंगों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को जिम्मेवार मानते हुए कहा है कि यह घटना प्रशासनिक विफलता का परिणाम थी. इन दंगों में 60 से अधिक लोगों की जान गयी थी, जबकि 40,000 से अधिक लोगों को विस्थापित होना पड़ा था.
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली खंडपीठ ने कहा कि नागरिकों के जान-माल और अधिकारों की रक्षा सरकार की जिम्मेवारी होती है. हालांकि, राज्य सरकार द्वारा दंगों के बाद उठाये गये कदमों पर संतोष व्यक्त करते हुए न्यायालय ने दंगों की सीबीआइ या विशेष दल से तहकीकात कराने के अनुरोध को खारिज कर दिया. इस खंडपीठ की एक उल्लेखनीय राय यह भी है कि अगर केंद्र और राज्य की खुफिया संस्थाएं चौकस रहतीं, तो इस भयानक त्रसदी को टाला जा सकता था.
यह अक्सर देखा गया है कि सांप्रदायिक दंगे सरकारी और प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही के कारण विभीषिका में बदल जाते हैं तथा इनके पीछे सक्रिय शरारती तत्व अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में कामयाब हो जाते हैं. दंगों में तबाही के बाद राहत, पुनर्वास और मुआवजे की आड़ में सरकारें अपनी विफलता छुपाने का जुगत लगाती हैं. आजाद हिंदुस्तान का इतिहास सांप्रदायिक हिंसा के अनगिनत वारदातों से बिंधा पड़ा है. कुछेक मामलों को छोड़ दें, तो ऐसे हादसों के लिए जिम्मेवार लोगों को शायद ही कभी कड़ी सजा हुई है.
ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की ताजा टिप्पणियां गौरतलब हैं, जिनमें अन्य बातों के अलावा यह भी कहा गया है कि दंगों के आरोपियों की यथाशीघ्र गिरफ्तारी होनी चाहिए, चाहे उनकी राजनीतिक संबद्धता कुछ भी हो. दुर्भाग्यवश, हिंदुस्तान में सांप्रदायिकता एक राजनीतिक प्रोजेक्ट के बतौर इस्तेमाल होती रही है. आजादी से अबतक दंगों में हजारों जानें जा चुकी हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वोच्च न्यायालय की बात को गंभीरता से लेना चाहिए और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए. उचित मुआवजा और राहत देना तो जरूरी है ही, साथ में यह भी जरूरी है कि समाज में सुरक्षा का माहौल बने और पीड़ितों को न्याय मिले. सांप्रदायिकता का दाग लेकर हिंदुस्तान विकास और बेहतरी की ओर नहीं बढ़ सकेगा.
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