केरा, बिच्छू, बांस-अपने जन्मे नास

।। चंचल ।। ( सामाजिक कार्यकर्ता ) ये भाई! जब संसद में अडवानी, सुसमा, मुरजी मनोहर जोसी, जेटली, जसवंत पता नहीं के के ना रहिहें, त ऊ गिरोह त बिलकुले भकुआ होइ जाई? लाल्साहेब की यह बात कीन उपाधिया को चुभ गयी. सच बात तो यही है कि कीन उपाधिया तिलमिलाते रहें, लाल्साहेब का यही […]
।। चंचल ।।
( सामाजिक कार्यकर्ता )
ये भाई! जब संसद में अडवानी, सुसमा, मुरजी मनोहर जोसी, जेटली, जसवंत पता नहीं के के ना रहिहें, त ऊ गिरोह त बिलकुले भकुआ होइ जाई? लाल्साहेब की यह बात कीन उपाधिया को चुभ गयी. सच बात तो यही है कि कीन उपाधिया तिलमिलाते रहें, लाल्साहेब का यही असल मकसद रहता है. कीन पायजामा के बाहर हो गये- काहे संसद में ना पहुचिहें? के रोक देई?
लखन कहार ने जुमला कसा- अक्खा गांव जल गया, सुखनी कहे, कहीं लत्ता जला? उमर दरजी ने नयी जानकारी दी- चुन्नी क लड़िका सुनिल्वा के पास पूरी लिस्ट है, कउन कउन हार रहा है और काहें. उसमें इनके अलावा स्वामी चिन्मयानन्द हैं, स्वामी वेदांती हैं, लोटा बाबा हैं, सडसा महराज हैं, पुल्पुलिया मिसिर हैं.. अबे उमर के बच्चे! तमीज से बोला कर, इ पुल्पुलिया मिसिर के हौ बे? यह सवाल लाल्साहेब की ओर से आया और इसलिए कि जब तक भट्ठी नहीं सुलग रही है, तब तक कीन ही सुल्गें. मद्दू पत्रकार ने उमर का बचाव किया- बुड़बक हो का? अक्खा सूबा जानता है कि कउन है पुल्पुलिया मिसिर. कलराज मिश्र का रहे उत्तर प्रदेश में? अपने कार्यकाल में बहैसियत सार्वजनिक निर्माण मंत्री के उन्होंने जितने पुल और पुलिया का शिलानाश किया उतने में बाघा बॉर्डर का पुल बन जाता. तभी तो उनका नाम पुल्पुलिया पड़ा..
तभी अखबार वाले की जोर की आवाज आयी. भोला दुबे ने लपक कर अखबार लिया, सारी निगाहें भोला पर. ये लो नयी खबर- वो अपना पोस्टर बदल रहे हैं, अब दूसरा पोस्टर लगेगा. सवाल उछला- के? नवल ने आंख गोल की- सुना जाये, भोला सुना रहे हैं पब्लिक सुन रही है.. अब व्यक्ति नहीं, पार्टी चुनाव लड़ेगी.. ये भाई! इन्हें इतनी अकल पहले नहीं रही का? भारत के संविधान में प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे नहीं होता, देश की सबसे बड़ी पंचाइत के सदस्य चुने जाते हैं, फिर वे सदस्य अपना नेता चुनते हैं, वही प्रधानमंत्री बनता है. गजब क गिरोह है भाई. साल भरसे प्रधानमंत्री लदावत रहे, अकल अब आयी कि भइये! इ चुनाव होनूलुलू में ना होत बा. इ इंडिया का चुनाव है.
मद्दू पत्रकार ने मामले को संभाला – एक बात जान लो, वह इतना बुड़बक भी ना है. इसीलिए तो सब को एक-एक करके ठिकाने लगा आया. जिनका नाम ऊपर गिनाये हो, सब को बारी-बारी पटखनी देकर गड्ढे में ढकेल आया, अब बचेगा कौन? एक अकेला. माई-धिया गवनिहार, बाप-पूत बजनिया. यही है सियासत. अब अपने लालमुनी चौबे से पूछ आइये. अटल मिजाज वाले चौबे जी की कहां चलेगी?
लो भाई चाय, आज का पैसा कौन देगा? चिखुरी काका तो हैं नहीं? नवल उपधिया उठे, उठ कर निगाह दौड़ाये- वो आ रहे हैं, खरामा खरामा. लोगों ने देखा लाठी कंधे पर लिये उस पर दोनों हाथ लटकाये चिखुरी चले आ रहे हैं. कल हम टीवी देखे भाई. ऊ पत्रकार बिहार वाले अजीत अंजुम जी हैं न, हिरेन पाठक की जगह हिरेन पंड्या बोलत रहे. नवल उपाधिया ने अपनी जानकारी का खुलासा किया. मद्दू पत्रकार का बिरादराना सुर मुखर हुआ- नवल तुम बुड़बक हो, पत्रकारिता में एक टर्म है पञ्च मारो कहीं, लगे वहीं. कैसे? सो सुनो. उसने दोनों को मारा है, पंड्या बुलेट से मरा, पाठक बैलेट से मारा जा रहा है. पंड्या के घरवाले घूम-घूम कर चीख रहे हैं हिरेन की मौत साजिश का हिस्सा है. जांच कराओ. कौन सुनता है. बात पूरी होने के पहले ही चिखुरी आ जमे. चाय चली. बात चली. चिखुरी बगैर भूमिका के संजीदा हो गये. घर से ही भरे हुए आये थे. बस उलटना भर था सो चालू हो गये..
अब तो हद हो गयी. राजनीति के नाम पर होनेवाली बेहूदगी अपनी सीमा भी तोड़ आयी. इन चू.. यों की शक्ल देखो, तो उबकाई आती है. मोहाजिर जलालुद्दीन अकबर कल तक उसे हिटलर बता रहे थे, आज वहीं पनाह ले रहे हैं. सांप्रदायिकता देश का सबसे घिनौना कर्म है. बोलनेवाला जगदंबिका पाल एक काठ की कुर्सी के लिए सांप्रदायिकता ओढ़ लिया. क्या कहा जाये इनको? और उनकी देखो, जो अंदर-बाहर हो रहे हैं. प्रमोद मुथालिक श्रीराम सेने का अलमबरदार औरतों को सड़क पर घसीट कर नंगा करनेवाला, अंदर लिया जाता है. फिर वोट के वास्ते बाहर किया जा रहा है. बिहार का क्रांतिकारी साबिर अंदर होता है. फिर बाहर फेंक दिया जाता है. ये सब कचड़े हैं. और इस गिरोह का करतब तो देखो. अपने को कोतवाल कह रहा था और काम कबाड़ी का कर रहा है. हर दल का कचड़ा मूड़ी पर लादे घूम रहा है.
तो होगा क्या? नवल को जल्दी रही. चिखुरी ने गौर से नवल को निहारा, फिर बोले- केरा, बिच्छू, बांस-अपने जन्मे नास. इसका भी वही हश्र होना है. कीन बगैर चाय पिये उठ गये. नवल सायकिल के साथ उठे. घंटी बजी और गीत सप्तम में उठा..ये ही ठइयां मोतिया हेरानी हो रामा, कहवां मैं ढूंढूं..
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