ढहा कलकत्ता का किला: BJP ने बंगाल में लगाई सेंध, 'स्ट्रीट फाइटर' दीदी को मिली ऐतिहासिक हार

भाजपा ने टीएमसी को दी करारी मात.
BJP Wins West Bengal Election 2026: भाजपा ने 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी को हरा दिया है. भाजपा 200 सीटें जीतने के करीब है. पिछले चुनाव- 2021 में 213 सीटें जीतने वाली ममता बनर्जी को इस बार 100 का आंकड़ा पार करने के लिए भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा रहा है.
BJP Wins West Bengal Election 2026: पूर्वी भारत की राजनीति में बड़ा बदलाव करते हुए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है, जिससे ममता बनर्जी के 15 साल लंबे शासन का अंत होता दिख रहा है. सोमवार दोपहर तक बीजेपी 198 सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 100 सीटों के आंकड़े तक पहुंचने के लिए संघर्ष करती नजर आई. यह उस पार्टी के लिए बड़ा झटका है, जिसने पांच साल पहले 213 सीटों के साथ राज्य में दबदबा कायम किया था.
94 रैलियों और 13 पदयात्राओं वाले व्यापक चुनाव अभियान के बावजूद, 71 वर्षीय ‘दीदी’ की आक्रामक राजनीति पर सवाल उठे. विपक्ष के नेता और बीजेपी के प्रमुख चेहरे शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पार्टी ने सत्ता विरोधी लहर और ‘वोटर लिस्ट सफाई’ जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से भुनाया.
ज्यादा मतदान ने ही साफ कर दिया था नतीजा
दो चरणों में हुए मतदान में रिकॉर्ड 92.47% मतदान दर्ज किया गया, जो भारी जनभागीदारी को दर्शाता है. ममता बनर्जी का अभियान मुख्य रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ उनके कानूनी और सड़क संघर्षों पर केंद्रित रहा. इस प्रक्रिया में लगभग 89 लाख नाम हटाए गए, जिसे उन्होंने अपने समर्थकों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश बताया.
आमतौर पर ज्यादा मतदान बदलाव की इच्छा का संकेत होता है. 92.47% का रिकॉर्ड मतदान एक अत्यधिक सक्रिय मतदाता समूह की ओर इशारा करता है. विश्लेषकों का मानना है कि ‘माइग्रेंट वोटर्स’ (राज्य में लौटकर मतदान करने वाले श्रमिक) और पहली बार वोट देने वालों की बड़ी संख्या बीजेपी के ‘असल परिवर्तन’ के नारे के पक्ष में गई, जो मुख्यमंत्री के ‘बंगाली अस्मिता’ के संदेश पर भारी पड़ा.
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भाजपा ने ममता की हर रणनीति को विफल कर दिया
बीजेपी ने मतदाता सूची की सफाई को ‘अवैध घुसपैठियों’ को हटाने की कार्रवाई बताया, जबकि ममता बनर्जी ने खुद सुप्रीम कोर्ट में इसे अपने मूल वोट बैंक को निशाना बनाने की कोशिश करार दिया. आंकड़े बताते हैं कि इस प्रक्रिया ने टीएमसी की पारंपरिक बूथ-स्तरीय पकड़ को काफी हद तक कमजोर कर दिया.
नतीजों के रुझान आने के बीच भी ममता बनर्जी ने हार नहीं मानी और एक वीडियो जारी कर चुनाव में ‘अनियमितताओं’ का आरोप लगाया. उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग और केंद्रीय बल मिलकर टीएमसी की बढ़त को रोकने की कोशिश कर रहे हैं.
उनके गढ़ भवानीपुर में मुकाबला राज्य की राजनीतिक ध्रुवीकरण की झलक बन गया. शुरुआती रुझानों में ममता बनर्जी को शुभेंदु अधिकारी पर 17,371 वोटों की बढ़त मिलती दिखी, लेकिन पूरे राज्य में टीएमसी के पारंपरिक ‘मां, माटी, मानुष’ आधार में गिरावट के संकेत साफ नजर आए.
2021 में टीएमसी ने ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाए रखी थी, लेकिन 2026 में बड़ा बदलाव देखने को मिला. बीजेपी ने जंगलमहल और उत्तर बंगाल में अपनी पकड़ और मजबूत की और इन्हें अपने गढ़ में बदल दिया. यहां तक कि प्रेसिडेंसी क्षेत्र (कोलकाता और आसपास के इलाके), जिसे टीएमसी का सबसे सुरक्षित इलाका माना जाता था, वहां भी सोमवार दोपहर तक बीजेपी 89 में से 49 सीटों पर आगे थी.
टीएमसी के पूर्व नेताओं ने ममता की स्थिति और खराब की
स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बनाते हुए, टीएमसी के पूर्व नेताओं और अब आलोचकों ने इन नतीजों को ‘लूट के खिलाफ जनादेश’ बताया. हुमायूं कबीर ने मुख्यमंत्री पर ‘परिवार केंद्रित सत्ता संरचना’ बनाने का आरोप लगाया. कबीर आम जनता उन्नयन पार्टी के संस्थापक हैं और इस समय रेजिनगर और नौदा दोनों सीटों पर आगे चल रहे हैं.
कबीर ने कहा, ‘मैं बंगाल की जनता को टीएमसी को ऐसा जवाब देने के लिए बधाई देता हूं. 15 साल में उन्होंने अंग्रेजों से भी ज्यादा लूट की.’ यह बयान टीएमसी के भीतर बढ़ती अंदरूनी कलह को दर्शाता है, जो पूरे चुनाव के दौरान साफ दिखी.
शुभेंदु अधिकारी और हुमायूं कबीर जैसे नेताओं ने ‘संस्थागत लूट’ के मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया. यह धारणा कि सत्ता केवल मुख्यमंत्री के परिवार, खासकर उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के इर्द-गिर्द सिमट रही है, जमीनी नेताओं में असंतोष का कारण बनी, जिससे कई बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ी और नए दल बने, जैसे कबीर की एजीयूपी. आरजी कर मामले और भर्ती घोटालों से उपजा असंतोष ‘साइलेंट एंटी-इंकम्बेंसी’ में बदल गया, जिसे ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाएं भी पूरी तरह शांत नहीं कर सकीं.
ममता के कुछ काम उन पर पड़े भारी
2011 और 2021 में ममता बनर्जी की ‘स्ट्रीट फाइटर’ छवि प्रभावी रही थी, लेकिन 2026 तक इसका असर कम होता दिखा. केंद्रीय एजेंसियों के साथ उनके लगातार टकराव, जैसे जनवरी 2026 का ED फाइल छीनने वाला मामला, आलोचकों के अनुसार संवैधानिक मर्यादा से हटकर नजर आया. वहीं, बीजेपी इस बार विरोधी वोटों को एकजुट करने में सफल रही और ‘लेफ्ट-कांग्रेस’ गठबंधन को कई सीटों पर वोट बांटने से रोक दिया.
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ममता को उम्मीद शाम तक बदलेंगे नतीजे
2026 के नतीजे संकेत देते हैं कि ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता अब भी कायम है, लेकिन साफ मतदाता सूची, मजबूत सत्ता विरोधी लहर और बीजेपी की बेहतर जमीनी संगठन क्षमता ने आखिरकार ‘कालीघाट के किले’ में सेंध लगा दी. ममता बनर्जी ने अपने समर्थकों से ‘हिम्मत न हारने’ की अपील की है और शाम के बाद स्थिति बदलने की उम्मीद जताई है. हालांकि बीजेपी पहली बार राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में दिख रही है, ऐसे में ‘फाइटर दीदी’ की छवि, जो कभी उनकी सबसे बड़ी ताकत थी, अब सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रही है.
यह बदलाव पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक युग के अंत का संकेत देता है, जहां आंदोलन की राजनीति से हार की स्थिति तक का सफर तय होता नजर आ रहा है, और पूर्वी भारत में भगवा लहर ने आखिरकार आखिरी बड़े गढ़ को भी भेद दिया है.
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लेखक के बारे में
By Anant Narayan Shukla
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
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