पीएम मोदी ने झालमुड़ी खाकर बदल दी राजनीति, फोटो-ऑप नहीं… बन गया बंगाल जीत का मंत्र!

Published by :Pritish Sahay
Published at :07 May 2026 7:02 PM (IST)
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jhalmuri Impact in West Bengal

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फोटो- पीटीआई

jhalmuri Impact in West Bengal: पश्चिम बंगाल के झारग्राम में पीएम मोदी का झालमुड़ी विक्रेता के पास रुकना सिर्फ राजनीतिक फोटो-ऑप बनकर नहीं रह गया. यह दृश्य धीरे-धीरे सांस्कृतिक प्रतीक, राजनीतिक संदेश और जनता से जुड़ाव की चर्चा का हिस्सा बन गया.

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jhalmuri Impact in West Bengal: भारत की राजनीति में चाय की दुकान पर रुकना, किसी ठेले वाले से बातचीत करना या सड़क किनारे किसी स्थानीय व्यंजन के साथ फोटो खिंचवाना आम हो चुके हैं . यह करीब हर बड़े नेता की चुनावी यात्रा का हिस्सा बन चुका है. ऐसे पल अक्सर एक-दो दिन खबरों में रहते हैं, सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते हैं और फिर धीरे-धीरे चर्चा से बाहर हो जाते हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल में पीएम मोदी का झालमुड़ी वाले मामले में ऐसा नहीं हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पश्चिम बंगाल के झारग्राम में एक झालमुड़ी विक्रेता के पास रुकना एक ऐसा दृश्य बन गया, जो सामान्य राजनीतिक फोटो-ऑप की तरह गायब नहीं हुआ. यह समय के साथ चर्चा, व्याख्या और राजनीतिक संकेतों का हिस्सा बनता गया. इसकी वजह सिर्फ यह घटना नहीं थी. बल्कि वह सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भ था जिसमें यह घटित हुआ.

पश्चिम बंगाल में झालमुड़ी सिर्फ एक स्ट्रीट फूड नहीं है. यह रेलवे स्टेशनों, कॉलेज परिसरों, बाजारों और यहां तक कि राजनीतिक रैलियों तक में मौजूद एक साझा सामाजिक अनुभव है. यह सस्ता है, आसानी से उपलब्ध है और हर वर्ग के लोग इसे पसंद करते हैं. इसी वजह से झालमुड़ी केवल एक व्यंजन नहीं रह गया, बल्कि जन जीवन का हिस्सा बन चुका एक सांस्कृतिक प्रतीक है.

भारत की राजनीति में, खासकर चुनाव के समय, इस तरह से तस्वीरें खिंचवाना आम लोगों से जुड़ाव दिखाने का एक स्थापित तरीका बन चुका है. हालांकि समय के साथ इसको लेकर लोगों की सोच में बदलाव आया है. ऐसे दृश्यों को लोगों ने अक्सर एक औपचारिक राजनीतिक प्रैक्टिस के रूप में देखना शुरू कर दिया है, जो सामने आता है, चर्चा में रहता है और फिर धीरे-धीरे भुला दिया जाता है. लेकिन झालमुड़ी वाला यह दृश्य इस सामान्य पैटर्न से थोड़ा अलग साबित हुआ. यह एक ट्रेंड बना गया, पूरे देश में इसकी चर्चा होती रही और अभी भी हो रही है.

झालमुड़ी प्रकरण का लंबे समय तक चर्चा में बने रहने का एक कारण बंगाल का राजनीतिक माहौल है. यहां राजनीति सिर्फ घोषणाओं या रैलियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह संस्कृति, प्रतीकों और भावनाओं में गहराई से जुड़ी होती है. यहां छोटे-छोटे संकेतों का भी बड़ा राजनीतिक अर्थ निकाल लिया जाता है. इस संदर्भ में, यह दृश्य अलग-अलग लोगों के लिए अलग अर्थ लेकर आया. कुछ लोगों के लिए यह नेतृत्व और जनता के बीच सीधे जुड़ाव का प्रतीक बना- ऐसा जुड़ाव जो रोजमर्रा की जिंदगी में उतरता दिखाई देता है. कुछ के लिए यह राजनीतिक संदेश था कि नेतृत्व ‘ग्राउंड लेवल’ पर मौजूद है. और कुछ लोगों ने इसे आधुनिक राजनीतिक संचार की उस शैली के रूप में देखा, जिसमें साधारण जीवन को दृश्य प्रतीकों के जरिए प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन जो बात इसे अन्य घटनाओं से अलग करती है, वह है इसकी ‘टिकाऊपन’.

अधिकतर राजनीतिक वीडियो तेजी से फैलते हैं और फिर गायब हो जाते हैं. लेकिन कुछ वीडियो ऐसे होते हैं जो लंबे समय तक चर्चा में रहते हैं, क्योंकि वे किसी गहरी सामाजिक या सांस्कृतिक भावना से जुड़ जाते हैं. झालमुड़ी का यह दृश्य भी वैसा ही था. झालमुड़ी अपने आप में एक सामाजिक रूपक है. इसे लोग चलते-फिरते, खड़े होकर, बातचीत करते हुए खाते हैं. यह किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है. यह सड़क की संस्कृति का हिस्सा है, जहां जीवन औपचारिक नहीं बल्कि सहज और साझा होता है. यही वजह है कि जब यह किसी राजनीतिक दृश्य से जुड़ता है, तो उसका अर्थ भी गहरा हो जाता है.

आज की राजनीति में दृश्य संचार (Visual Cmmunication) बहुत महत्वपूर्ण हो गया है. एक छोटी सी तस्वीर या पल भी बड़ी राजनीतिक कहानी का हिस्सा बन सकता है. नेता और जनता के बीच संबंध अब केवल भाषणों या नीतियों से नहीं, बल्कि ऐसे छोटे-छोटे दृश्यों से भी बनता है. हालांकि, हर दृश्य प्रभावी नहीं होता. बहुत से दृश्य आते हैं और चले जाते हैं. लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो जनता की व्याख्या के कारण लंबे समय तक बने रहते हैं. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.

यह दृश्य सिर्फ एक घटना नहीं रहा, बल्कि बातचीत का हिस्सा बन गया- समर्थकों और आलोचकों दोनों के बीच. किसी ने इसे सादगी और जुड़ाव के रूप में देखा, तो किसी ने इसे राजनीतिक संचार की रणनीति के रूप में. यह पूरा प्रसंग दिखाता है कि आधुनिक राजनीति में ‘घटना’ और ‘अर्थ’ अलग-अलग चीजें हैं. घटना तो कुछ सेकंड की होती है, लेकिन उसका अर्थ समय के साथ बनता और बदलता है. झारग्राम में झालमुड़ी वाला यह क्षण भी ऐसा ही था- एक छोटा सा दृश्य, जो समय के साथ एक बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया.

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Pritish Sahay

लेखक के बारे में

By Pritish Sahay

12 वर्षों से टीवी पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सेवाएं दे रहा हूं. रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से पढ़ाई की है. राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय विषयों के साथ-साथ विज्ञान और ब्रह्मांड विषयों पर रुचि है. बीते छह वर्षों से प्रभात खबर.कॉम के लिए काम कर रहा हूं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद डिजिटल जर्नलिज्म का अनुभव काफी अच्छा रहा है.

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