थर्मल पावर प्लांट बंद होने की स्थिति से निपटने के लिए देश में कोई कानून स्पष्ट नहीं, iFOREST की रिपोर्ट

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आईफाॅरेस्ट के अध्यक्ष और सीईओ चंद्र भूषण ने कहा कि यदि ऊर्जा मंत्रालय 2030 तक 25 साल से अधिक पुराने कोयला आधारित उत्पादन इकाइयों को बंद करने का फैसला लेता है तो 50 से 60 हजार मेगावाट क्षमता का उत्पादन ठप होगा.

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Energy Transition : iFOREST ने पर्यावरण की सुरक्षा को देखते हुए 12 अक्टूबर को ‘जस्ट ट्रांजिशन आॅफ कोल बेस्ड पावर प्लांट्‌स इन इंडिया : ए पाॅलिसी और रेग्युलेटरी रिव्यू’ (Just Transition of Coal Based Power Plants in India: A Policy and Regulatory Review) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी किया है. इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि भारत के वर्तमान पर्यावरण, भूमि और श्रम कानून थर्मल पावर प्लांट और अन्य उद्योगों के बंद होने की स्थिति में उनसे निपटने के लिए समर्थ नहीं हैं.

पर्यावरण की सुरक्षा के लिए काम करता है आईफाॅरेस्ट

आईफाॅरेस्ट पर्यावरण की सुरक्षा के लिए काम करने वाला एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी संगठन है, जो पर्यावरण अनुसंधान पर काम करता है. पर्यावरण की रक्षा के लिए यह संगठन वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की सहायता से मुद्दों का समाधान खोजता है और उन्हें लागू करवाने के लिए काम करता है.

50-60 हजार मेगावाट क्षमता का उत्पादन ठप होगा

iFOREST द्वारा आयोजित वेबिनार में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, थर्मल पावर प्लांट, श्रमिक संघ, शोधकर्ता और गैर सरकारी संगठन के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. इस वेबिनार में, आईफाॅरेस्ट के अध्यक्ष और सीईओ चंद्र भूषण ने कहा कि यदि ऊर्जा मंत्रालय 2030 तक 25 साल से अधिक पुराने कोयला आधारित उत्पादन इकाइयों को बंद करने का फैसला लेता है तो 50 से 60 हजार मेगावाट क्षमता का उत्पादन ठप होगा. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या मंत्रालय इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता को बंद करके उसका विकल्प तैयार कर चुकी है? साथ ही अगर उत्पादन इकाइयां बंद होती हैं तो जस्ट ट्रांजिशन के लिए क्या व्यवस्था की गयी है? खासकर मजदूरों और पर्यावरण के नजरिये से इसे देखा जाना जरूरी है.

अस्पष्ट हैं कानून

रिपोर्ट में पाया गया है कि भारत में ऐसा कोई कानून नहीं हैं जो कोयला संयंत्रों के बंद होने के बाद की स्थिति से निपट सके. रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका मांडवी सिंह ने बताया कि पर्यावरण, मजदूरों और जमीन से जुड़े कानून उन स्थितियों के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं कहते हैं, जिसमें कोयला संयंत्रों को बंद करने की बात कही गयी है.

वित्तीय पहलुओं पर स्पष्टता की जरूरत

वेबिनार में डीवी लक्ष्मीपति, एनटीपीसी लिमिटेड के सीजीएम (बदरपुर) ने बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन के बंद होने के बाद की स्थिति का अनुभव बताया. उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में और थर्मल पावर स्टेशन बंद होते हैं तो हमें वित्तीय पहलुओं पर स्पष्टता की जरूरत है. उन्होंने कहा कि वित्त पोषण एक चिंता का विषय है क्योंकि बिजली खरीद समझौतों के प्रावधान नहीं हैं.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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