आचार्य प्रमोद कृष्णम का हमला, बोले - कांग्रेस में वामपंथियों का कब्जा, तो कुछ नेता बन गए भाजपा के एजेंट
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 May 2022 9:46 AM
कांग्रेस के नेता प्रमोद कृष्णम ने कहा कि महात्मा गांधी खुद भगवान राम के सबसे बड़े उपासक थे और इंदिरा गांधी देवरहा बाबा की भक्त थीं. सोनिया गांधी कुंभ में स्नान कर चुकी हैं, तो राहुल गांधी भी स्वयं को बार-बार शिवभक्त साबित कर चुके हैं.
नई दिल्ली : कांग्रेस के नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने अपनी ही पार्टी के नेतृत्व पर सवाल खड़ा करते हुए बड़ा हमला किया है. उन्होंने अपने ताजा बयान में आरोप लगाया है कि कांग्रेस में वामपंथी पार्टी के लोगों ने कब्जा जमा लिया है, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए हिंदू धर्मावलंबियों की आस्था का लगातार अपमान कर रहे हैं. इसके साथ ही, उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि उनकी पार्टी के कुछ नेता ऐसे भी हैं, जो भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं. इससे पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है.
पार्टी छोड़ने का सवाल ही नहीं
कांग्रेस छोड़ने की अटकलों पर विराम लगाते हुए आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि फिलहाल पार्टी छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं है. उन्होंने कहा कि जिन लोगों को कांग्रेस के मूल सिद्धांतों पर भरोसा नहीं है, वे उनके बारे में अफवाह फैला रहे हैं. हिंदी के एक अखबार से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी कांग्रेस महात्मा गांधी, नेहरू और इंदिरा गांधी के आदर्शों वाली पार्टी रही है.
महात्मा गांधी राम के उपासक तो इंदिरा गांधी देवराहा बाबा की भक्त
कांग्रेस के नेता प्रमोद कृष्णम ने आगे कहा कि महात्मा गांधी खुद भगवान राम के सबसे बड़े उपासक थे और इंदिरा गांधी देवरहा बाबा की भक्त थीं. सोनिया गांधी कुंभ में स्नान कर चुकी हैं, तो राहुल गांधी भी स्वयं को बार-बार शिवभक्त साबित कर चुके हैं. बावजूद इसके उनकी पार्टी के कुछ लोग जो न तो कांग्रेस को समझते हैं और न ही संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना का सही अर्थ समझते हैं, वे खुद को ज्यादा धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए हिंदू आस्थाओं का अपमान करने में जुटे हुए हैं.
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी धर्म का विरोध करना नहीं
प्रमोद कृष्णम ने कहा कि देश के संविधान को धर्मनिरपेक्ष बनाया गया है, लेकिन इसका अर्थ किसी धर्म का अपमान करना नहीं है. यदि ऐसा होता तो संविधान के पन्नों पर भगवान राम के दरबार का चित्र अंकित न होता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर संस्कृत में जहां धर्म होता है, वहीं विजय होती है लिखा न होता. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी सहित विपक्ष के नेताओं को समझना चाहिए कि धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ किसी धर्म का विरोध करना नहीं है.
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