Bhagat Singh Untold Stories: हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले भगत सिंह को अंधेरे से लगता था डर
Published by : Amitabh Kumar Updated At : 22 Jan 2025 5:53 PM
भगत सिंह के किताब का कवर पेज (बाएं) हाथ में तिरंगा लिए बच्चा (दाएं)
Amazing Facts about Bhagat Singh : 28 सितंबर 1907 को आजादी के दीवाने भगत सिंह का जन्म हुआ था. हंसते-हंसते फांसी पर वे चढ़ गए थे. उनकी बहन ने एक बार कहा था कि भगत को अंधेरे से डर लगता था.
Amazing Facts about Bhagat Singh: भगत सिंह आजादी के ऐसे दीवाने थे, केंद्रीय असेंबली पर बम फेंकने, पुलिस अधीक्षक जेपी सांडर्स की हत्या करने और काकोरी कांड को अंजाम देकर ब्रिटिश सरकार को परेशान कर दिया था. शहीद भगत सिंह को अंग्रेजों ने 23 मार्च 1931 को जेल में फांसी दे दी थी. आज जबकि पूरा देश गणतंत्र दिवस की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है हम इन शहीदों को नमन करते है, जिनके बदौलत हमें ये आजादी मिली.
भगत सिंह के बारे में कई कहानियां भी प्रचलित हैं, जिनमें से एक बहुत ही खास है. जिस भगत सिंह ने हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ना स्वीकार किया उन्हें अंधेरे से बहुत डर लगता था. आजादी के लगभग 40 साल पहले इस आजादी के दीवाने का जन्म हुआ था. साल था 1907 तारीख थी 28 सितंबर, दिन था शनिवार. सुबह के 9 बज रहे थे. ठीक इसी वक्त सरकार किशन सिंह के घर किलकारी गूंजी. उनकी बहन बीबी अमर कौर ने एक बार बताया था कि भगत सिंह को अंधेरे से डर लगता था. आइए हम आपको उनके जीवन से जुड़ी एक खास बात बताते हैं जिसका जिक्र एमएम जुनेजा ने अपनी किताब बायोग्राफी ऑफ भगत सिंह में किया है.
भगत सिंह के जन्म के वक्त पिता थे जेल में
भगत सिंह का जब जन्म हुआ तो उनके पिता सरदार किशन सिंह और दोनों चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह जेल में बंद थे. अंग्रेजों ने उन्हें एंटी ब्रिटीश एक्टिविटी की वजह से सलाखों के पीछे डाल दिया गया था. भगत सिंह परिवार के लिए खुशहाली लेकर आए थे. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके जन्म के दो दिन के बाद उनके पिता को बेल मिली और वे जेल से छूट गए. उनके साथ एक भाई स्वर्ण सिंह भी जेल से बाहर आए. अब बारी दूसरे चाचा की थी. जनता के दबाव की वजह से अजीत सिंह को भी 11 नवंबर 1907 को जेल से रिहा किया गया.
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इस खुशी के वक्त भगत सिंह की दादी ने अपने मन की बात कही. जेल से छूटे तीनों बेटों को साथ देखकर उन्होंने कहा – ‘ ये बेटा भागां वाला है यानी नया बच्चा बहुत ही लकी है.’ इन शब्दों को सुनने के बाद भगत सिंह का नाम ‘भागां वाला’ रख दिया गया. यह नाम उनकी दादी सरदारनी जय कौर ने रखा. यही ‘भागां वाला’ बाद में चलकर भगत सिंह बना. उनके नाम का मतलब ‘महान देश भक्त’ होता है.
भगत सिंह को लगता था अंधेरे से डर
भगत सिंह एक एवरेज बच्चे की तरह ही थे. अंधेरे में वे घर से बाहर नहीं निकलते थे. उन्हें अंधेरे से डर लगता था. उनकी बहन बीबी अमर कौन की टिप्पणी का हवाला किताब में किया गया. वह कहतीं थी कि मैं और भगत सिंह दोनों ही रात के समय घर के बाहर जाने से डरते थे. पांच साल की उम्र में भगत सिंह का एडमिशन स्कूल में करवाया गया. भगत सिंह के स्कूल के दिनों की बात उनकी मां ने एक इंटरव्यू के दौरान बताई थी. इस इंटरव्यू को 23 दिसंबर 1966 को जीएस गोयल ने लिया था. इसमें उनकी मां विद्यावती ने कहा था ‘ स्कूल में मेरे बेटे को सभी बहुत प्यार करते थे. वह तुरंत दोस्ती करने में माहिर थे. दोस्त और उसके सीनियर क्लास वाले उसे कंधे में उठाकर घर तक छोड़ जाते थे.’
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By Amitabh Kumar
अमिताभ कुमार झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं. हरे-भरे झारखंड की मिट्टी से जुड़े अमिताभ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जिला स्कूल रांची से पूरी की और फिर Ranchi University से ग्रेजुएशन के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही साल 2011 में रांची में आयोजित नेशनल गेम को कवर करने का मौका मिला, जिसने पत्रकारिता के प्रति जुनून को और मजबूत किया.1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है. प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है.
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