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1982 में हुई 3000 रुपये की डकैती: 2026 में आया फैसला, संदेह का लाभ; 3 जिंदा आरोपी बरी

Updated at : 18 Feb 2026 8:24 AM (IST)
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Allahabad High Court acquitted 3 men convicted of robbery in 1983 giving benefit of doubt.

कोर्ट की प्रतीकात्मक तस्वीर. फोटो- कैनवा.

UP News: भारतीय न्याय व्यवस्था में फैसले आने में सालों लग जाते हैं. इसकी एक बानगी मंगलवार को देखने को मिली, जब 3000 रुपये की डकैती के एक 43 साल पुराने मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया. इसमें तीन जिंदा आरोपियों को बरी कर दिया गया. इन्हें संदेह का लाभ दिया गया. इस पूरी सुनवाई के दौरान 4 आरोपियों की मौत हो गई.

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UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 43 साल पुराने डकैती के मामले में 2026 में बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने 1982 में उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की इस कथित डकैती की घटना में जीवित बचे तीन आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया. यह आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकलपीठ ने आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए कमजोर अभियोजन के आधार पर बरी कर दिया.

मामला बदायूं जिले के उझानी थाना क्षेत्र का है. 26-27 जुलाई 1982 की रात धनपाल के घर डकैती हुई थी. आरोप था कि गांव के ही सात लोगों ने घर में घुसकर मारपीट की और करीब तीन हजार रुपये नकद व सोने-चांदी के जेवर लूट लिए. उनके खिलाफ बदायूं के उझानी पुलिस थाना में भारतीय दंड संहिता की धारा 395 (डकैती की सजा) और 397 (जान से मारने या गंभीर चोट पहुंचाने की कोशिश के साथ डकैती) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी. इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 29 अगस्त 1983 को सभी सात आरोपियों को दोषी मानते हुए पांच से सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.

सत्र अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील

सभी आरोपियों ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की. यह पुरानी आपराधिक अपील 1983 में सात आरोपियों ने दायर की थी, जो 29 अगस्त, 1983 को बदायूं के विशेष सत्र न्‍यायाधीश की अदालत के सजा के फैसले के विरोध में थी. अपील लंबित रहने के दौरान चार आरोपियों की मौत हो गई, जिसके चलते उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई. शेष तीन आरोपी अली हसन, हरपाल और लतूरी अब 70 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और उनकी अपील पर सुनवाई हुई.

कोर्ट ने क्यों जताया संदेह

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के सबूत भरोसेमंद नहीं हैं. कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते और मेडिकल रिपोर्ट भी कथित चोटों से अलग तस्वीर पेश कर रही थी. जहां एक गवाह ने चाकू से चोट लगने की बात कही, वहीं मेडिकल जांच में चोट किसी कठोर और कुंद वस्तु से लगने की बात सामने आई. अदालत ने यह भी कहा कि यह बात भी संदिग्ध है कि गांव के लोग बिना चेहरा ढके अपने ही पड़ोसियों के घर डकैती डालें. 

इसके अलावा, पुलिस न तो लूट का माल बरामद कर सकी और न ही घटनास्थल से कोई ठोस सबूत जुटा पाई. पुरानी रंजिश के कारण झूठा फंसाए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सका. इन सभी कमियों और संदेहों को देखते हुए हाईकोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और तीनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया.

संदेह का लाभ देकर किया बरी

फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने कहा कि गवाहों के बयान में महत्वपूर्ण विसंगतियां पाईं, इसलिए आरोपियों को संदेह के आधार पर इसका लाभ दिया जाना चाहिए. अदालत ने अली हसन, हरपाल और लटूरी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया. पीठ ने कहा, अली हसन को भारतीय दंड संहिता की धारा 395 के तहत अपराध के लिए बरी किया जाता है, जबकि हरपाल और लटूरी को भारतीय दंड संहिता की धारा 395 के साथ 397 के तहत अपराध से बरी किया जाता है.

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Anant Narayan Shukla

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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