मांडले में कैद है तिलक की याद

By Prabhat Khabar Digital Desk
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-हरिवंश-


म्यांमार की धरती पर पांव पड़ते ही दो भारतीय गौरव कौंध गये. मांडले, मध्य म्यांमार में है, अंगरेजों के शासनकाल में वहां किलानुमा जेल था. लाजपत राय, सुभाष बाबू वगैरह अनेक कैदी वहां एकांतवास में रखे गये. पर सबसे अधिक दिनों. छह वर्ष तक बाल गंगाधर तिलक वहां रखे गये. तनहा और असुविधाओं के बीच, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने कहा था, 'स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. 'म्यांमार विजिट 96' अभियान में मांडले का वह जेल किला भी टूटा है. टूटनेवाले हिस्से में वह भाग भी हैं. जहां तिलक कैद कर रखे गये थे. भारत सरकार ने म्यांमार सरकार से अनुरोध किया है कि वह जगह भारत को दी जाये, ताकि वहां स्मारक बनाया जा सके.
पर क्या स्मारक तिलक का गौरव स्मरण करायेगा? लांछने और परनिंदा की इस राजनीति में तिलक पर भी छांटे डाले गये. इससे क्या उनका गौरव घटा? तिलक को जब सजा सुनायी गयी, तब अंगरेज उन्हें अपना सबसे बजा शत्रु मानते थे. उन्हें गुप्त रूप से बंबई से रंगून भेजा गया. हार्डिंग नामक पानी के जहाज था. उन्हें डेक के नीचे कमरे में बंद रखा गया था. वहां वह लेट कर कभी हवा के लिए बनाये गोल सुराखों में से सांस लेकर समय काटते थे. सुबह-शाम महज एक घंटे अंगरेज अफसर के सख्त पुलिस पहरे में डेक पर घूमने की इजाजत थी.
मांडले जेल में बड़े-बड़े बैरक हैं. एक बैरक में पार्टशिन कर उन्हें एकांतवास में रखा गया. मांडले का मौसम उग्र है. सर्दियों में कड़ी सर्दी, गर्मियों में आकाश-धरती भट्टी की तरह तपता है. बरसात में भारी वर्षा, तिलक डायबेटीज के मरीज थे. गर्मी उन्हें बहुत सताती थी. वह लकड़ी के बने कमरे में रहते थे. तीनों मौसम के प्रतिकूल था. यह कमरा, मांडले जेल जाते समय उनकी उम्र थी 52 वर्ष स्वास्थ्य कमजोर था. अपने जेल जीवन के बारे में उन्होंने लिखा है, 'वर्षों से मेरा यह विचार था कि भगवद्गीता पर आजकल जो टीकाएं प्रचलित हैं, उनमें से किसी में उसका रहस्य ठीक से नहीं बताया गया.

अपने इस विचार को कार्यरूप में परिणत करने के लिए मैं पश्चिमी और पूर्वी तत्वज्ञान की तुलना करके भगवद्गीता का भाष्य लिखा.'ग्रंथ लेखन के अतिरिक्त मैंने फ्रेंच, जर्मन और पाली भाषाओं का स्वयमेव अध्ययन किया. गणित, ज्योतिष आदि के चिंतन में यह कह सकते हैं कि सामान्य रूप से जेल में मेरी तबीयत ठीक रही. वर्ष में एकाध बार बुखार हो जाता था. लेकिन कोई लंबी बीमारी नहीं हुई. मधुमेह (डायबेटीज) की बीमारी अवश्य बढ़ गयी. बुढ़ापे के कारण पांच-छह दांत गिर गये. कम से कम सुनाई देने लगा और आंखों की ज्योति कुछ मंद हो गयी.

मशहूर पुस्तक 'भगवद्गीता का रहस्य' उन्होंने लिखा.वहीं 1921 के जून में उन्हें अपनी पत्नी के निधन का समाचार मिला.
यह खबर पा कर वह स्तब्ध रह गये. कहते हैं कि उनकी आंखों से आंसू नहीं निकले. एक व्यक्ति ने पूछा भी. उन्होंने जवाब दिया 'क्या करूं? मैं देश के लिए अपने आंसू बहा चुका हूं. आंखों में आंसू बाकी नहीं रहे.' उन्होंने अपने घर मांडले जेल से ही पत्र भेजा. तार मिला, दिल को भारी आघात पहुंचा.

यह सच है कि संकट आते हैं, तो उन्हें मैं शांति से सह लेता हूं. परंतु इस समाचार ने तो वस्तुत: मुझे भूकंप की तरह झकझोर दिया है. हम लोग है, तो हिंदू ही. पति से पहले पत्नी मर गयी. कोई कहेगा कि यह अच्छा हुआ. सबसे बड़ा दुख मुझे इस बात का है कि अंतिम समय में मैं उनके पास नहीं रह सका. मुझे सदा इस बात का डर बना रहता था और वैसा ही हुआ भी. परंतु होनहार को कौन मिटा सकता है. मेरे जीवन का पहला भाग समाप्त हुआ. और अब मुझे मालूम होता है कि दूसरा भाग भी शीघ्र ही समाप्त होनेवाला है.

पत्नी की मृत्यु पर भी उन्हें छोड़ा नहीं गया. अंतत: 8 जून 1914 की उन्हें अचानक तैयार होने की सूचना दी गयी. उन्हें उसी दिन शाम रेल से रंगून भेजा गया. वहां 'मेमो नामक पानी के जहाज से कष्टकर स्थिति में मद्रास से पूना के लिए उन्हें रेल पर बैठाया गया. पूरी यात्रा में उनके साथ दो अंगरेज पुलिस अफसर और काफी सिपाही थे. उन्हें पूरी यात्रा में महाराष्ट्र की प्रमुख पहचान 'लाल पगड़ी' पहनने की इजाजत नहीं दी गयी. सरकार को डर था कि कहीं रास्ते में तिलक पहचान न लिये जायें और देश में कोई नया तूफान उठ खड़ा हो.

6 जून की रात चुपचाप पूना से कुछ दूर हडपसर स्टेशन पर उन्हें उतारा गया. वहां से मोटर द्वारा पूना भेजा गया. दो बजे रात एक रिश्तेदार के घर पहुंचाया गया.फिर भी सुबह होते-होते पूना और पूरे देश में आग की तरह खबर फैल गयी कि तिलक रिहा हो गये. लोग उमड़ पड़े. पूना में विराट सार्वजनिक सभा हुई. तिलक फिर लड़ाई में कूद पड़े.आज भारत में उसी तिलक के तप-त्याग पर सवाल उठाये जा रहे हैं?
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