पाकिस्तान की सुरक्षा को खतरा भारत से नहीं, उसके अपने आंतरिक संघर्षों से

Updated at : 01 May 2016 11:16 AM (IST)
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पाकिस्तान की सुरक्षा को खतरा भारत से नहीं, उसके अपने आंतरिक संघर्षों से

नयी दिल्ली : पाकिस्तान की सुरक्षा को खतरा भारत से नहीं बल्कि अपने आंतरिक संघर्षो से होने को रेखांकित करते हुए एक पुस्तक में कहा गया है कि आंतरिक और बाहरी ताकतों से निपटने में पाकिस्तान की ‘‘लचर” नीति के कारण वहां की स्थिति और जटिल बन गई है. लेखक क्रिस्टोफे जैफरेलॉट की पुस्तक ‘‘पाकिस्तान […]

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नयी दिल्ली : पाकिस्तान की सुरक्षा को खतरा भारत से नहीं बल्कि अपने आंतरिक संघर्षो से होने को रेखांकित करते हुए एक पुस्तक में कहा गया है कि आंतरिक और बाहरी ताकतों से निपटने में पाकिस्तान की ‘‘लचर” नीति के कारण वहां की स्थिति और जटिल बन गई है. लेखक क्रिस्टोफे जैफरेलॉट की पुस्तक ‘‘पाकिस्तान ऐट द क्रॉसरोड्स” में प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने पाकिस्तान की राजनीति, अर्थव्यवस्था और वहां के नेताओं और सैन्य शासकों समेत घरेलू और रणनीतिक स्तर पर उत्पन्न चुनौतियों का मूल्यांकन किया है. इसमें कहा गया है कि बलूचिस्तान और कराची के नस्ली संघर्षो के अलावा अफगानिस्तान में अमेरिका की अगुवाई में सैन्य दखल की प्रतिक्रिया के रुप में पाकिस्तान में होने वाली आतंकवादी हिंसा और पाकिस्तान के संघीय प्रशासित आदिवासी क्षेत्रों में ड्रोन से होने वाले हमले अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गए हैं.

पुस्तक के अनुसार, अब पाकिस्तान के नेताओं में यह धारणा बन रही है कि पाकिस्तान की सुरक्षा को असली खतरा भारत से नहीं, बल्कि वहां होने वाले आंतरिक संघर्षो से है. हालांकि यह एहसास पाकिस्तान सेना को अपने सबसे बडे पडोसी देश को निशाना बनाने से रोक पाने में पर्याप्त रुप से सक्षम नहीं है. किताब में आतंरिक और बाहरी ताकतों से निपटने में पाकिस्तान की ‘‘लचर” नीति की आलोचना की गई है जहां के आंतरिक, बाहरी संघर्षो ने ही मौजूदा हालात को और जटिल बना दिया है.

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के संदर्भ में पुस्तक में कहा गया है कि जवाहर लाल नेहरु और चाउएन लाई के संबंध शुरुआत में काफी गर्माहट भरे थे और इसी दौर में पाकिस्तान ने चीन के साथ करीबी बढानी शुरु की थी. इस दौरान पाकिस्तान के प्रति चीन का रुख भी झुकवा वाला ही रहा. राजनीतिक स्तर पर चीन और पाकिस्तान की करीबी बढी और यह कोरियाई युद्ध के समय पाकिस्तान के रुख से भी स्पष्ट होता है. इस दौर में 60 के दशक के शुरुआत में पाकिस्तान और चीन ने एक दूसरे को ‘तरजीही राष्ट्र का दर्जा प्रदान किया.

रैंडम हाउस प्रकाशित पुस्तक में कहा गया है. लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में सबसे अहम योगदान उस समय आया जब 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया. इस युद्ध में पाकिस्तान और चीन ने भारत को साझा शत्रु के रुप में पेश किया. इस युद्ध के पश्चात ही दोनों देशों ने कश्मीर पर अवैध रुप से कब्जा किये गये हिस्सों का आदान प्रदान किया. 1965 के भारत..पाकिस्तान युद्ध के बाद चीन को दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के रुप में सहयोगी मिला और उसने पाकिस्तान के साथ ही तरह से एकजुटता प्रदर्शित की. पुस्तक में कहा कि चीन और पाकिस्तान ने परस्पर सहयोग समझौता किया. चीन ने पाकिस्तानों को हर तरह से हथियार उपलब्ध कराये. पाकिस्तान ने अपने बंदरगाहों के विकास का दायित्व चीन को दिया और इसके जरिये हिन्द महासागर में चीन के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ. इसके साथ ही चीन के सिल्क रुट के विकास की योजना में पाकिस्तान को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है.

चीन, पाकिस्तान के ग्वदार बंदरगाहर का विकास कर रहा है, इसके साथ ही बंदरगाहों पर आवाजाही के लिए सडक का नेटवर्क बनाने के लिए बडे पैमान पर निवेश कर रहा है. चीन और पाकिस्तान के बीच परमाणु सहयोग समझौता भी है और वह रिएक्टर स्थापित करने में भी उसकी मदद कर रहा है. यह मुख्य रुप से भारत केंद्रीत ही प्रतीत होती है. पुस्तक में आतंरिक खतरों से निपटने में पाकिस्तान के शासकों की कार्यप्रणाली, नागरिकों और सेना से जुडे संबंधों, राजनैतिक दलों की रणनीति, पुलिस और कानून प्रवर्तन सुधार, न्यायिक सक्रियता के ट्रेंड, सीमा पर होने वाली झडपों में बढोतरी, आर्थिक चुनौतियां, विदेशी शक्तियों से मिलने वाली आर्थिक मदद और पाकिस्तान के भारत, चीन, ईरान, सउदी अरब, अफगानिस्तान और अमेरिका के संबंधों का गहराई से विश्लेषण और परीक्षण किया है.

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