पाकिस्तान के लिए 1965 का युद्ध महंगा साबित हुआ : हामिद अंसारी

Updated at : 01 Sep 2015 4:56 PM (IST)
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पाकिस्तान के लिए 1965 का युद्ध महंगा साबित हुआ : हामिद अंसारी

नयी दिल्ली : साल 1965 में पाकिस्तान के हमले को नाकाम कर देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नेतृत्व और कश्मीरियों की प्रशंसा करते हुए उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने आज कहा कि यह युद्ध पडोसी देश के लिए महंगी सैन्य और राजनीतिक विपदा साबित हुआ. भारत पाक युद्ध के 50 साल 1965 […]

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नयी दिल्ली : साल 1965 में पाकिस्तान के हमले को नाकाम कर देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के नेतृत्व और कश्मीरियों की प्रशंसा करते हुए उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने आज कहा कि यह युद्ध पडोसी देश के लिए महंगी सैन्य और राजनीतिक विपदा साबित हुआ.

भारत पाक युद्ध के 50 साल

1965 के भारत-पाक युद्ध के 50 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित स्मृति कार्यक्रम हमारे जवानों के बलिदान और बहादुरी के प्रति उचित श्रद्धांजलि है. उन्होंने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के 50 वर्ष पूरे होने के मौके पर आयोजित तीनों सेनाओं के सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि जिन घटनाक्रमों की वजह से युद्ध हुआ वे पाकिस्तान के मूल में बसी उसकी जिद और भ्रमपूर्ण धारणा को रेखांकित करते हैं कि वह उपमहाद्वीप के भूगोल और राजनीतिक वास्तविकताओं को बदलने के लिए बल का इस्तेमाल कर सकता है.

पाकिस्तान के लिए युद्धमहंगा पडा
उपराष्ट्रपति ने कहा कि अंतिम विश्लेषण करें तो युद्ध पाकिस्तान के लिए महंगी सैन्य और राजनीतिक विपदा साबित हुआ. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के विफल रहने के बाद भी संघर्ष विराम की घोषणा को ‘गोलीबारी बंदी’ कहा गया, ‘जंग बंदी’ नहीं.अंसारी ने कहा, ‘‘इस परेशान करने वाले कदम से हमारे बल हैरत में थे लेकिन उन्होंने डटकर मुकाबला किया और पाकिस्तान की साजिश जल्द ही मिट्टी में मिल गयी.
डटकर किया मुकाबला
प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अगुवाई में राजनीतिक नेतृत्व ने ताकत और दृढता के साथ जवाब दिया.’’ अनेक मोर्चे पर मुंह की खाने के बावजूद युद्ध में हमेशा अपनी जीत का दावा करने वाले पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के नाम से पांच अगस्त, 1965 को अपनी चाल चली थी. इसमें उसके सशस्त्र बलों की मदद से प्रशिक्षित अनियमित जवानों को जम्मू कश्मीर में घुसपैठ कराई गयी.अंसारी ने कहा कि इस मिशन का मकसद व्यापक तौर पर नुकसान पहुंचाने और आगजनी का था और साथ ही स्थानीय समर्थन हासिल करने का भी था जिससे आजादी की लडाई के नाम पर ऐलान किया जाए. उन्होंने कहा कि एक विश्वसनीय पाकिस्तानी विवरण के अनुसार इसका मकसद कश्मीर की समस्या को बनाये रखना, भारतीय संकल्प को कमजोर करना आदि था.
अंसारी ने कहा, ‘‘प्रयास नाकाम रहे क्योंकि कश्मीर की जनता ने इसका विरोध किया. उन्होंने इसके बजाय स्थानीय पुलिस और हमारे सुरक्षा बलों को उनके ठिकाने, गतिविधियों और इरादों के बारे में जानकारी दी.’’ ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के विफल होने के बाद पाकिस्तान ने अपनी साजिश के दूसरे चरण पर काम किया.
इसमें एक सितंबर, 1965 को पाकिस्तानी सेना द्वारा चांब-अखनूर-जूरियन क्षेत्र में भारतीय बलों पर सीधा हमला शामिल है जिसका मकसद रणनीतिक महत्व वाले अखनूर पर कब्जा करना था जहां अंतरराष्ट्रीय सीमा संघर्ष विराम रेखा बन जाती है. पाकिस्तान का उद्देश्य भारत और कश्मीर घाटी के बीच मुख्य संचार संपर्क तोडना था.
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