400 साल से चल रहा था अयोध्या विवाद
Updated at : 10 Nov 2019 3:52 AM (IST)
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अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को विवादित पूरी 2.77 एकड़ जमीन राम लला को दे दी. यह विवाद करीब 491 साल पुरान था. आइए जानें पूरे घटनाक्रम के बारे में… 1528 : बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबर के आदेश से अयोध्या में एक मस्जिद का निर्माण […]
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अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को विवादित पूरी 2.77 एकड़ जमीन राम लला को दे दी. यह विवाद करीब 491 साल पुरान था. आइए जानें पूरे घटनाक्रम के बारे में…
1528 : बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबर के आदेश से अयोध्या में एक मस्जिद का निर्माण किया. अनेक हिंदू समूहों का मानना है कि यह मस्जिद वहां स्थित राम मंदिर को गिरा कर बनायी गयी है.
1853 : मंदिर और मस्जिद विवाद को लेकर अयोध्या में पहली बार सांप्रदायिक हिंसा हुआ था.
1859 : ब्रिटिश प्रशासन ने बाड़ लगाकर विवादित ढांचे को दो हिस्से में बांट दिया, ताकि हिंदू-मुस्लिम दोनों यहां पूजा कर सकें.
1949 : बाबरी मस्जिद के भीतर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी गयी, जिसका मुसलमानों ने विरोध किया. इसके बाद दोनों ही पक्षों ने दीवानी मुकदमा दायर किया. सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित कर यहां ताला लगा दिया.
1984 : विवादित भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिंदू परिषद ने एक समिति का गठन किया.
1986 : जिला न्यायाधीश ने मस्जिद परिसर का दरवाजा खोलने का आदेश देते हुए वहां स्थापित मूर्तियों की पूजा की अनुमति दी. इस आदेश को चुनौती देने के लिए मुस्लिम समूहों द्वारा मस्जिद एक्शन कमिटी बनायी गयी.
1989 : विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर के लिए अपना आंदोलन तेज किया.
25 सितंबर, 1990 राम मंदिर निर्माण के लिए समर्थन जुटाने के लिए भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के विवादित रथयात्रा की शुरुआत.
23 अक्तूबर, 1990 बिहार के समस्तीपुर जिले में रथयात्रा रोक दी गयी और आडवाणी को गिरफ्तार किया गया.
6 दिसंबर, 1992 मंदिर निर्माण के उद्देश्य से अयोध्या में जुटी भीड़ ने मस्जिद की इमारत को ढाह दिया और अस्थायी मंदिर की स्थापना कर दी.
10 दिसंबर, 1992 केंद्र सरकार द्वारा अयोध्या की घटनाओं की जांच के लिए लिब्राहन आयोग का गठन.
2002 : तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या प्रकोष्ठ का गठन किया. इसी वर्ष अयोध्या से लौट रहे लोगों पर गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर हमला हुआ था. इसके बाद पूरे राज्य में भयानक दंगे हुए थे.
5 मार्च, 2003 इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व विभाग को खुदाई का आदेश दिया.
22 अगस्त, 2003 भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि मस्जिद के नीचे 10वीं सदी की मंदिर के प्रमाण मिले हैं.
31 अगस्त, 2003 ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को न्यायालय में चुनौती देने की बात कही.
30 सितंबर, 2010 इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर अपना फैसला सुनाते हुए विवादित क्षेत्र को तीन बराबर भागों में बांट दिया. एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड, एक हिस्सा निर्मोही अखाड़ा और एक हिस्सा रामलला को दिया गया. इस बंटवारे में रामलला को भूमि का मुख्य विवादित भाग दिया गया, जिसका मुस्लिम पक्षकरों ने विरोध किया.
दिसंबर 2010 रामलला व सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी.
2011 : सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित स्थल को तीन भागों में विभाजित करने के उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी और यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया. सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाशीधों की पीठ ने टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय का फैसला आश्चर्यजनक था, क्योंकि कोई भी पार्टी इस स्थल का विभाजन नहीं चाहती थी.
26 फरवरी, 2016 विवादित ढांचे के स्थान पर राम मंदिर के निर्माण के लिए भाजपा सांसद सुब्रमण्यन स्वामी की हस्तक्षेप की मांग को सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया.
2017 : उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में भाजपा नेताओं पर आपराधिक षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया और लखनऊ की ट्रायल कोर्ट को दो वर्षों में सुनवाई खत्म करने का आदेश दिया.
5 दिसंबर, 2017 तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षतावाली एक खंडपीठ ने 8 फरवरी, 2018 को इस मामले की अंतिम सुनवाई की तारीख तय की.
2018 : उच्चतम न्यायालय ने जनवरी, 2019 में इस मामले की सुनवाई का निर्देश दिया.
26 फरवरी, 2019 : मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने 26 फरवरी को मध्यस्थता से मामले का साैहार्दपूर्ण हल निकालने की वकालत की.
6 मार्च, 2019 उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले में अदालत की निगरानी में मध्यस्थता की कोशिश पर अपना आदेश सुरक्षित रखा. इस बीच हिंदू पक्ष के वकीलों ने यह कहते हुए मध्यस्थता का विरोध किया कि इस तरह की पहले हुई कोशिशें असफल रही हैं. जबकि, मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने बातचीत के लिए मतदान किया था.
6 अगस्त, 2019 उच्चतम न्यायालय में इस मामले की ियमित
सुनवाई शुरू हुई.
16 अक्तूबर, 2019 मामले की अंतिम सुनवाई पूरी हुई और फैसला सुरक्षित रख लिया गया.
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