सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से ''कॉमन सिविल कोड'' फिर चर्चा में, क्या इस पर भी आगे बढ़ेगी मोदी सरकार?

Published at :14 Sep 2019 11:08 AM (IST)
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सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से ''कॉमन सिविल कोड'' फिर चर्चा में, क्या इस पर भी आगे बढ़ेगी मोदी सरकार?

नयी दिल्लीः कॉमन सिविल कोड या समान नागरिक आचार संहिता एक बार फिर से फिर चर्चा के केंद्र में है. कारण है सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देश में सभी नागरिकों के लिए कॉमन सिविल कोड लागू न होने पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की. देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि […]

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नयी दिल्लीः कॉमन सिविल कोड या समान नागरिक आचार संहिता एक बार फिर से फिर चर्चा के केंद्र में है. कारण है सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देश में सभी नागरिकों के लिए कॉमन सिविल कोड लागू न होने पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की. देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए. कोर्ट ने गोवा का उदाहरण भी दिया.
कॉमन सिविल कोड देश की राजनीति का एक बड़ा सवाल है. पहले से ही इस बात की संभावना जताई जा रही है कि एनआरसी, तीन तलाक और अनुच्छेद 370 पर ऐतिहासिक फैसले लेने के बाद मोदी सरकार की नजर अब यूनिफॉर्म सिविल कोड पर है. अब सुप्रीम कोर्ट के इस अहम टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर पूछ रहे हैं कि या मोदी सरकार इस पर भी कुछ करेंगी.
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिए गए एक फैसले में कहा कि देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए अभी तक कोई प्रयास नहीं किया गया है.जबकि कोर्ट इस संबंध में कई बार कह चुका है. जस्टीस दीपक गुप्ता और जस्टीस अनिरुद्ध की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि गोवा भारतीय राज्य का एक बेहतरीन उदाहरण है जिसमें समान नागरिक संहिता लागू है, जिसमें सभी धर्मों की परवाह किए बिना यह लागू है, वो भी कुछ सीमित अधिकारों को छोड़कर.
बेंच ने एक संपत्ति विवाद मामले में ये टिप्पणियां की. बेंच ने कहा कि गोवा राज्य में लागू पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 है, जो उत्तराधिकार और विरासत के अधिकारों को भी संचालित करती है. जबकि भारत में कहीं भी गोवा के बाहर इस तरह का कानून लागू नहीं है. कोर्ट ने कहा कि गोवा में जिन मुस्लिम पुरुषों की शादियां पंजीकृत हैं, वे बहुविवाह नहीं कर सकते हैं. इस्लाम को मानने वालों के लिए मौखिक तलाक (तीन तलाक) का भी कोई प्रावधान नहीं है.
आपको बता दें कि देश में तमाम मामलों में कॉमन लॉ हैं, लेकिन शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर अभी भी फैसला पर्सनल लॉ के हिसाब से फैसला होता है.
बीजेपी सरकार कर चुकी है कॉमन सिविल कोड लाने की कोशिश
भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पहले से ही कॉमन सिविल कोड की वकालत करते आए हैं. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब इस मुद्दे के फिर से गर्माने के आसार बन गए हैं. अब भाजपा का इस पर फोकस बढ़ सकता है. पहले भी सत्तारूढ़ पार्टी सिंगल सिविल कोड की वकालत करती रही है और विरोधियों पर ‘वोट बैंक पॉलिटिक्स’ का आरोप लगाकर उसे घेरती रही है.
बता दें कि मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में इस पर सभी की राय मांगने के लिए लॉ कमीशन भी बनाया गया था जिसने अपनी रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी थी. लेकिन विपक्ष के भारी विरोध के चलते तीन तलाक की तरह इससे भी सरकार को पीछे हटना पड़ा, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. राज्य सभा में बहुमत नहीं होने के बाद भाजपा सरकार ने हाल ही में कई ऐतिहासिक बिलों को पास कराया.
कॉमन सिविल कोड क्या है
संविधान के अनुच्छेद-44 में समान नागरिक आचार संहिता की बात है और नीति निर्देशक तत्व में वर्णित है. संविधान कहता है कि सरकार इस बारे में विचार विमर्श करे. हालांकि सरकार इसके लिए बाध्यकारी नहीं है. देश में तमाम मामलों में यूनिफॉर्म कानून है, लेकिन शादी, तलाक और उत्ताराधिकार जैसे मुद्दों पर अभी पर्सनल लॉ के हिसाब से फैसला होता है, लेकिन गोवा जैसे राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है.
देखा जाए तो कॉमनसिविल कोड के मुद्दे पर बहस आजादी के बाद से ही चल रही है. यूनिफॉर्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता जैसा कानून दुनिया के अधिकतर विकसित देशों में लागू है. कॉमन सिविल कोड का विरोध करने वालों का कहना है कि ये सभी धर्मों पर हिंदू कानून को लागू करने जैसा है.
मुस्लिम समुदाय के लोग तीन तलाक की तरह इस पर भी तर्क देते हैं कि वह अपने धार्मिक कानूनों के तहत ही मामले का निपटारा करेंगे. दरअसल, समान नागरिक संहिता लागू होने से भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार आएगा. अभी कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं. उधर, कॉमन सिविल कोड के समर्थकों का कहना है कि सभी के लिए कानून एक समान होने से देश में एकता बढ़ेगी और जिस देश में नागरिकों में एकता होती है, किसी प्रकार वैमनस्य नहीं होता है वह देश तेजी से विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा.
अकेले गोवा में ये कानून कैसे?
अकेले गोवा में कॉमन सिविल कोड कैसे लागू है? दरअसल, 1961 में भारत में शामिल होने के बाद गोवा, दमन और दीव के प्रशासन के लिए भारतीय संसद ने कानून पारित किया- गोवा, दमन और दीव एडमिनिस्ट्रेशन ऐक्ट 1962 और इस कानून में भारतीय संसद ने पुर्तगाल सिविल कोड 1867 को गोवा में लागू रखा. इस तरह से गोवा में समान नागरिक संहिता लागू हो गई.
शुक्रवार को पीठ ने भी कहा कि गोवा राज्य में पुर्तगीज सिविल कोड 1867 लागू है, जिसके तहत उत्तराधिकार को लेकर कानून स्पष्ट हैं. गोवा में लागू समान नागरिक संहिता के अंतर्गत वहां पर उत्तराधिकार, दहेज और विवाह के संबंध में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई के लिए एक ही कानून है.
इसके साथ ही इस कानून में ऐसा प्रावधान भी है कि कोई माता-पिता अपने बच्चों को पूरी तरह अपनी संपत्ति से वंचित नहीं कर सकते. इसमें निहित एक प्रावधान यह भी है कि यदि कोई मुस्लिम अपनी शादी का पंजीकरण गोवा में करवाता है तो उसे बहुविवाह की अनुमति नहीं होगी.
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