वाजपेयी के खिलाफ प्रचार करने नहीं गये थे नेहरू, सत्ता और विपक्ष दोनों वाजपेयी को संसद में देखना और सुनना चाहते थे
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :28 Mar 2019 5:23 AM (IST)
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अनुज सिन्हा अब नहीं देखने को मिलता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच ऐसा संबंध रांची : अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक टिप्पणी बड़ी चर्चित रही है. नेहरू ने एक विदेशी टीम के साथ वाजपेयी का परिचय कराते हुए कहा था-एक न एक दिन यह युवक (तब […]
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अनुज सिन्हा
अब नहीं देखने को मिलता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच ऐसा संबंध
रांची : अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक टिप्पणी बड़ी चर्चित रही है. नेहरू ने एक विदेशी टीम के साथ वाजपेयी का परिचय कराते हुए कहा था-एक न एक दिन यह युवक (तब वाजपेयी युवा सांसद थे) देश का प्रधानमंत्री बनेगा. नेहरू की भविष्यवाणी सच साबित हुई.
वाजपेयी द्वारा संसद में दिये गये भाषण से नेहरू बहुत प्रभावित हुए थे. जब 1962 का लाेकसभा चुनाव हाे रहा था तब भी नेहरू चाहते थे कि वाजपेयी चुनाव जीत कर संसद में पहुंचें.
वाजपेयी उत्तरप्रदेश के बलरामपुर लाेकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बने थे. इससे पहले 1957 में बलरामपुर से ही वाजपेयी सांसद बने थे. संसद में उनका जाेरदार भाषण हाेता था. कांग्रेस (नेहरू नहीं) चाहती थी कि वाजपेयी हारें. इसलिए वाजपेयी के खिलाफ दमदार महिला नेता सुभद्रा जाेशी काे मैदान में उतारा गया. वह राष्ट्रीय आंदाेलन से जुड़ी रही थीं.
दाे बार की सांसद भी थीं. जब वाजपेयी के खिलाफ प्रचार के लिए नेहरू काे कहा गया, ताे उन्हाेंने वहां जाने से इनकार कर दिया. पार्टी काे उन्हाेंने बता दिया कि उन पर बलरामपुर में प्रचार के लिए दबाव नहीं दिया जाये. नेहरू के इनकार करने के बाद वहां प्रचार के लिए फिल्म अभिनेता बलराज साहनी काे भेजा गया. असर यह हुआ कि वाजपेयी 1962 का चुनाव हार गये. हालांकि अंतर ज्यादा नहीं था. सुभद्रा जाेशी काे 102260 वाेट मिले थे, जबकि वाजपेयी (जनसंघ) काे 100208 वाेट.
सत्ता और विपक्ष दोनों वाजपेयी को संसद में देखना और सुनना चाहते थे
वाजपेयी काे सत्ता और विपक्ष दाेनाें सदन में देखना और सुनना चाहता था. इसलिए हार के तुरंत बाद वाजपेयी काे राज्यसभा भेज दिया गया.
वाजपेयी का पहली बार सांसद बनना भी आसान नहीं था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय के आदेश पर वाजपेयी ने लखनऊ में 1953 में लाेकसभा का उपचुनाव लड़ा था और हार गये थे. इसके बाद 1957 का आम चुनाव आया. पार्टी (भारतीय जन संघ) चाहती थी कि हर हाल में वाजपेयी चुनाव जीतें. इसलिए एक नहीं, तीन-तीन सीट से उन्हें प्रत्याशी बनाया गया था. लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से. मथुरा में निर्दलीय प्रत्याशी राजा महेंद्र प्रताप सिंह जीते थे. वाजपेयी चाैथे स्थान पर आये.
लखनऊ से भी वाजपेयी नहीं जीत पाये. हालांकि, बलरामपुर के मतदाताओं ने उनका साथ दिया. बलरामपुर में कांग्रेस ने अल्पसंख्यक हैदर हुसैन काे वाजपेयी के खिलाफ उतारा था. इसका फायदा वाजपेयी काे मिला. मताें का ध्रुवीकरण हुआ और वाजपेयी लगभग दस हजार मताें से जीत गये.
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