विश्व नेता बनने की दिशा में नेहरू का वह पहला कदम

Updated at : 08 Jun 2014 12:15 PM (IST)
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विश्व नेता बनने की दिशा में नेहरू का वह पहला कदम

आजादी के ठीक पहले जिस तरह नेहरू ने एशियाई मुल्कों के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन दिल्ली में आमंत्रित किया था, वह आभास दे रहा था कि वे भारत के साथ-साथ तीसरी दुनिया के मुल्कों का भी नेतृत्व करना चाह रहे हैं. रामचंद्र गुहा नई दिल्ली में आयोजित एशियन रिलेशन कांफ्रेंस इस दिशा में एक उल्लेखनीय […]

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आजादी के ठीक पहले जिस तरह नेहरू ने एशियाई मुल्कों के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन दिल्ली में आमंत्रित किया था, वह आभास दे रहा था कि वे भारत के साथ-साथ तीसरी दुनिया के मुल्कों का भी नेतृत्व करना चाह रहे हैं.

रामचंद्र गुहा

नई दिल्ली में आयोजित एशियन रिलेशन कांफ्रेंस इस दिशा में एक उल्लेखनीय शुरुआत थी. यह कांफ्रेंस मार्च 1947 के आखिरी सप्ताह में आयोजित की गयी. इस कांफ्रेंस में 28 देशों ने अपने प्रतिनिधियों को भेजा जिसमें भारत के कुछ निकट पड़ोसी देशों (जैसे अफगानिस्तान, वर्मा, सिलोन और नेपाल) के प्रतिनिधि भी शामिल थे. इसके अलावा इस कांफ्रेंस में कुछ ऐसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया जो अभी तक पराधीन थे (जैसे मलाया, इंडोनेशिया और वियतनाम). इसके साथ-साथ इसमें चीन और तिब्बत(दोनों ने ही अलग-अलग प्रतिनिधिमंडल भेजा), सोवियत संघ से सात गणराज्यों और कोरिया ने भी हिस्सा लिया. अरब लीग ने भी इसमें हिस्सा लिया और फिलीस्तीन से एक यहूदियों को प्रतिनिधिमंडल भी इसमें शरीक हुआ. उस घटना की रिपोर्टिग करते हुए एक पश्चिमी पत्रकार ने याद किया कि एक सप्ताह तक दिल्ली शहर रंग-बिरंग के लोगों से गुलजार रहा जिनके कपड़े और मुखाकृतियां अलग-अलग थीं. उनमें दक्षिण-पूर्व एशिया से आनेवाले आने वाले लोग बेल-बूटेदार वस्त्र पहने हुए थे तो पूर्वी सोवियत गणराज्यों के लोग बेलबॉटन. तिब्बत के लोग बालों में चोटी बांधे हुए कई तहों में बनाये गये घाघरा पहने हुए थे. वे कई तरह के कौतुहल पैदा करने वाली भाषाएं बोल रहे थे और उनके कई तरह के उपनाम थे. किसी भी तरह से देखा जाए तो वहां उपस्थित हुए लोग आधी मानवता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.

इस कांफ्रेंस का आयोजन पुराना किला में किया गया. पुराना किला सोलहवीं सदी में शेरशाह सूरी द्वारा बनाया गया किला था जो काफी विशाल है लेकिन जीर्णशीर्ण होने के बावजूद इसकी भव्यता काफी बची हुई है. इसका उद्घाटन और समापन समारोह आम जनता के लिए खुला हुआ था और इसने लोगों की भारी भीड़ को आकर्षित किया. एक अनुमान के मुताबिक इसे देखने के लिए करीब 20,000 लोगों को भीड़ उमड़ी. इस कांफ्रेंस की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी थी, लेकिन प्रतिनिधियों को अनुवादक मुहैया कराया गया था. वक्ताओं ने मंच से भाषण दिया उनके पीछे एशिया विशाल नक्शा लगाया गया था जिसके ऊपर नियोन के प्रकाश में मोटे अक्षरों में एशिया लिखा हुआ था. इस समारोह का उद्घाटन भाषण नेहरू ने दिया. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नेहरू ने कहा कि कैसे एक लंबे समय की सुसुप्तावस्था के बाद अचानक एशिया अंतरराष्ट्रीय पटल पर महत्वपूर्ण हो गया है. नेहरू ने कहा, अब एशियाई देश दूसरे देशों द्वारा प्यादों की तरह इस्तेमाल नहीं किये जा सकते. हालांकि पत्रकार जीएच जेनसन ने याद करते हुए कहा कि नेहरू का भाषण प्रत्यक्ष तौर पर या बहुत कड़े शब्दों में साम्राज्यवाद विरोधी नहीं था. नेहरू के शब्दों में अब पुराना साम्राज्यवाद अपना प्रभाव खोता जा रहा है. उन्होंने अपने हाथ हिलाने की विशेष मुद्रा से साम्राज्यवादी देशों की विदाई की घोषणा कर दी, जो शायद ुउन पर सीधे तौर पर हमला करने से भी कटु था.

नेहरू ने जब अपना भाषण दे दिया तो उस समारोह में भाग लेने वाले सभी देशों के प्रतिनिधि अपने देश के नाम के शुरुआती अक्षरों के क्रम में एक-एक कर मंच पर भाषण देने आये. इसमें पूरे दो दिन लगे, उसके बाद समारोह को अलग-अलग विषयों के कई गोलमेज सम्मेलनों में कई टुकड़ों में बांट दिया. गोलमेज के लिए अलग-अलग विभाग बनाये गये मसलन आजादी के लिए राष्ट्रीय आंदोलन, नस्लीय समस्या और अंतर एशियाई देशों में पलायन, आर्थिक विकास और समाज सेवा, सांस्कृतिक समस्याएं और महिलाओं की स्थिति और महिला आंदोलन आदि.

इस समारोह का अंत महात्मा गांधी के एक भाषण से हुआ. महात्मा ने इस बात पर खेद प्रकट किया कि यह समारोह गांवों में रहने वाले असली हिंदुस्तान में नहीं, बल्कि पश्चिमी प्रभाव वाले एक शहर में हो रहा है. गांधी ने जोर देकर कहा कि एशिया का संदेश न तो पश्चिमी चश्मे से देखा जा सकता है, न ही एटम बम की नकल से. मैं आपको यही संदेश देना चाहता हूं कि आप इस विचार के साथ अपने देश को लौटिए कि एशिया को प्रेम और सत्य के सहारे पश्चिम पर विजय प्राप्त करनी है.

हालांकि गांधी इस समारोह में उपस्थित हुए, लेकिन वास्तव में यह नेहरू का समारोह था. उनके प्रशंसकों की राय में इस समारोह से इस बात की तस्दीक हुई कि नेहरू एशिया की प्रमाणिक आवाज के रूप में उभर कर सामने आये थे जो पुनर्जागरण की ओर अग्रसर हो रहा था. हालांकि उनके आलोचक उतने उदार नहीं थे. उस समारोह का ब्योरा देते हुए मुस्लिम लीग के अखबार डॉन ने लिखा था कि नेहरू ने किस तरह बड़ी चालाकी से अपने आपको एशिया स्तर के नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है. यह एक ऐसी चाल है जो इस महत्वाकांक्षी हिंदू नेता ने बड़ी होशियारी से चली है. उन्होंने अपने आपको एशियाई देशों के ऊपर थोपने की कोशिश की है, ताकि उस प्रतिष्ठा और महत्व का इस्तेमाल करके भारतीय हिंदुत्व को फैलाने का काम किया जा सके.

(उनकी पुस्तक इंडिया ऑफ्टर गांधी से)

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