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धारा 377 पर अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कई देशों की अदालत के फैसले का जिक्र किया

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने इस सप्ताह आईपीसी की धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त करने के दौरान एलजीबीटी समुदाय के लिए समानता और न्याय का मार्ग प्रशस्त करने वाले दुनियाभर के देशों का हवाला दिया और इस मुद्दे पर उन देशों की अदालतों के फैसलों को उद्धृत किया. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, […]


नयी दिल्ली :
सुप्रीम कोर्ट ने इस सप्ताह आईपीसी की धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त करने के दौरान एलजीबीटी समुदाय के लिए समानता और न्याय का मार्ग प्रशस्त करने वाले दुनियाभर के देशों का हवाला दिया और इस मुद्दे पर उन देशों की अदालतों के फैसलों को उद्धृत किया.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविल्कर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पीठ ने गुरुवार को सर्वसम्मति से आपसी रजामंदी से दो वयस्कों के बीच स्थापित समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने वाली आईपीसी की धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया. पीठ ने कहा था कि यह धारा समानता और गरिमा के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है.

सीजेआई मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविल्कर ने 166 पन्नों का मुख्य फैसला लिखा. उन्होंने अपने फैसले में अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपीनी गणराज्य और यूरोपीय मानवाधिकार अदालत के इसी तरह के फैसलों का उल्लेख किया. इस मुद्दे पर अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए शीर्ष अदालत ने लिखा, ‘एलजीबीटी अपने निजी जीवन के लिए सम्मान के हकदार हैं और राज्य उनके अस्तित्व को नीचा नहीं दिखा सकता या उनके निजी यौन आचरण को अपराध बनाकर उनकी नियति पर नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि उचित प्रक्रिया प्रावधान के तहत उनकी स्वतंत्रता का अधिकार उन्हें राज्य के हस्तक्षेप के बिना आचार-व्यवहार में शामिल होने का उन्हें पूरा अधिकार देता है.’

सीजेआई मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविल्कर ने लिखा कि ‘‘रॉबर्टस बनाम यूनाइटेड स्टेट्स जेसीज’ मामले में अमेरिका की शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कुछ अंतरंग मानवीय संबंधों को रखने की पसंद को राज्य के अनुचित दखल से अवश्य सुरक्षित करना चाहिए.’ पीठ ने कहा कि एलजीबीटी समुदाय से संबंधित एक मामले में दक्षिण अफ्रीका की एक संवैधानिक अदालत ने कहा, ‘हमारी आबादी के एक हिस्से से जुड़ा कलंक प्रकट है.’ उसने कहा था, ‘अपराध होने के परिणामस्वरूप समलैंगिक लोगों पर गिरफ्तारी, मुकदमा और अप्राकृतिक यौनाचार का दोषी ठहराए जाने का खतरा सिर्फ इसलिए मंडराता रहता है कि वे ऐसे यौन संबंध में शामिल होना चाहते हैं जो मानव होने के उनके अनुभव का हिस्सा है.’

दक्षिण अफ्रीका की संवैधानिक अदालत ने समलैंगिकों के साथ भेदभाव की तुलना दक्षिण अफ्रीकी देशों में व्याप्त रंगभेद की व्यवस्था से की थी. सीजेआई और न्यायमूर्ति खानविल्कर ने डेलविन व्रेंड मामले में कनाडा के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी गौर किया. उसने कहा था कि सबसे महत्वपूर्ण नतीजा मनोवैज्ञानिक नुकसान का है जो भेदभाव के डर की स्थिति से शुरू हो सकता है और असली पहचान छिपाने में परिणत हो सकता है. पीठ ने कहा कि यूरोपीय मानवाधिकार अदालत ने कहा था कि समलैंगिकता को जनमत की वजह से अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. इसी तरह फिलीपीनी गणराज्य के सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि अदालत जनता पर अपनी राय नहीं थोप सकती.

Prabhat Khabar Digital Desk
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