सुप्रीम कोर्ट का फैसला समलैंगिक संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं, 72 देशों में समलैंगिकता अब भी अपराध, 125 में नहीं, जानें

Updated at : 07 Sep 2018 12:26 AM (IST)
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला समलैंगिक संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं, 72 देशों में समलैंगिकता अब भी अपराध, 125 में नहीं, जानें

नीदरलैंड ने दिसंबर 2000 में समलैंगिक शादियों को सही करार दिया था नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के साथ ही भारत उन 125 अन्य देशों के साथ जुड़ गया जहां समलैंगिकता वैध है. लेकिन, दुनियाभर में अब भी 72 ऐसे देश और क्षेत्र हैं जहां […]

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नीदरलैंड ने दिसंबर 2000 में समलैंगिक शादियों को सही करार दिया था

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के साथ ही भारत उन 125 अन्य देशों के साथ जुड़ गया जहां समलैंगिकता वैध है.

लेकिन, दुनियाभर में अब भी 72 ऐसे देश और क्षेत्र हैं जहां समलैंगिक संबंध को अपराध समझा जाता है. उनमें 45 वे देश भी हैं जहां महिलाओं का आपस में यौन संबंध बनाना गैर कानूनी है. उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बृहस्पतिवार को भादंसं की धारा 377 के तहत 158 साल पुराने इस औपनिवेशिक कानून के संबंधित हिस्से को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया और कहा कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है.

इंटरनेशनल लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांस एंड इंटरसेक्स एसोसिएशन के अनुसार आठ ऐसे देश हैं जहां समलैंगिक संबंध पर मृत्युदंड का प्रावधान है और दर्जनों ऐसे देश हैं जहां इस तरह के संबंधों पर कैद की सजा हो सकती है. जिन कुछ देशों समलैंगिक संबंध वैध ठहराये गये हैं उनमें अर्जेंटीना, ग्रीनलैंड, दक्षिण अफ्रीका, आॅस्ट्रेलिया, आइसलैंड, स्पेन, बेल्जियम, आयरलैंड, अमेरिका, ब्राजील, लक्जमबर्ग, स्वीडन और कनाडा शामिल हैं.

विवाह को कानूनी रूप देने का सरकार करेगी विरोध

सरकार के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि दो समलैंगिक के बीच आपसी सहमति से बनाया जाने वाला यौन संबंध ठीक है, लेकिन सरकार उनके बीच विवाह को कानूनी रूप देने की किसी भी मांग का विरोध करेगी. ऑफ द रिकाॅर्ड उन्होंने कहा कि रूढ़िवादी हिंदुओं को सत्तारूढ़ भाजपा का मजबूत समर्थक के तौर पर देखा जाता है.

समलैंगिकता एक आनुवांशिक दोष

समलैंगिकता एक आनुवांशिक दोष है. यह समाज में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से आपकी स्थिति को प्रभावित नहीं करता है. समलैंगिकों के बीच संबंध को अपराध नहीं करार नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह प्राइवेट रूप से किया जाता है.

सुब्रमण्यम स्वामी

प्रकृति और सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ

समलैंगिकता प्रकृति, धर्म और सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ है. इसको इजाजत नहीं दी जानी चाहिए थी. कुछ तत्वों के शोर-शराबे को आधार बनाकर पूरे समाज को व्यावहारिक परेशानी में नहीं डाला जा सकता. इससे समाज में दिक्कतें पैदा होंगी.

जमीयत उलेमा-ए-हिंद

संघर्षरत लोगों के लिए उम्मीद की किरण

फैसला भारतीय इतिहास के एक काले अध्याय का द्वार बंद करता है. यह लाखों लोगों के लिए समानता के नये युग का प्रतीक है. आज की यह जीत समुदाय के तीन दशक के संघर्ष में एक मील का पत्थर है. शादी, गोद लेने, उत्तराधिकार के लिए संघर्ष जारी रहेगा.

एमनेस्टी इंटरनेशनल

विश्व मीडिया ने दिल खोलकर किया स्वागत

वाशिंगटन पोस्ट : इस फैसले से दुनिया भर में समलैंगिक अधिकारों को बढ़ावा मिलेगा. यह फैसला भारत में तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश को दिखाता है.

न्यू यॉर्क टाइम्स : दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में समलैंगिक अधिकारों की जीत, फैसले ने वर्षों से चल रही कानूनी लड़ाई को खत्म कर दिया.

ह्यूमन राइ्टस वाच : इस फैसले के बाद अन्य देशों को भी प्ररणा मिलेगी कि वे समलैंगिकों और ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर अभी तक मौजूद औपनिवेशिक कानून को खत्म करें.

समलैंगिक अधिकारों को लेकर इन लोगों ने किया संघर्ष

केशव सूरी (33)

कार्यकारी निदेशक : ललित सूरी हॉस्पिटालिटी ग्रुप

विशेष : ग्रुप दिव्यांगों एवं एलजीबीटीक्यूआइ को नौकरी देने के लिए जाना जाता है

– सूरी ने अदालत में अपनी याचिका में कहा कि उनके एक दशक से एक अन्य व्यस्क पुरूष से संबंध हैं.

रितु डालमिया (45)

सह-मालिक : इतालवी रेस्टूरेंट ‘दिवा’, दिल्ली

विशेष : 12 साल की उम्र में पारिवारिक व्यवसाय से जुड़ी, संगमरमर का किया कारोबार

– 377 के खिलाफ आवाज नहीं उठाऊंगी तो मैं शिकायत करने की अधिकारी भी नहीं रह जाऊंगी.

गौतम यादव (27)

काउंसलर : हमसफर ट्रस्ट, दिल्ली

विशेष : बचपन में ही विषम यौनिकता के कारण भेदभाव का सामना, 15 साल में स्कूल से बाहर

– मैं नहीं चाहता था कि समलैंगिकता के कारण जिस भेदभाव का सामना मैंने किया, वह और लोग भी सहें.

अक्कई पद्मशाली (32)

कार्यकर्ता : ट्रांसजेंडर राइट्स

विशेष : दो महिलाओं के साथ 2016 में धारा 377 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

– क्या अप्राकृतिक है, बताने वाली पुलिस कौन है. समाज हमारे शारीरिक रिश्तों पर पाबंदी नहीं लगा सकता.

आरिफ जफर (47)

कार्यकर्ता : एनजीओ ‘भरोसा’, लखनऊ

विशेष : जुलाई 2001 में धारा 377 के तहत गिरफ्तार, 47 दिनों तक जेल में बुरी तरह प्रताड़ित

– 17 साल बाद मैंने मामले को उठाया, बताया कि मैं एक गे हूं. किसी को नहीं प्रताड़ना का सामना नहीं करना पड़े.

उरवी शाह (24)

फाउंडर : अरेंज्ड मैरिज गे ब्यूरो, मुंबई

विशेष : एलजीबीटीक्यू मैरिज को देश में अरेंज मैरिज के रूप में बदलने के लिए ब्यूरो का संचालन

– धारा 377 किसी भी इंसान को उसकी फीलिंग्स को रोकने के लिए दबाव नहीं डाल सकती है.

17 वर्षों तक कोर्ट में चला मामला

2001

नाज फाउंडेशन ने दिल्ली हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका की दाखिल

2004

सितंबर : हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की

दिसंबर: मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

2006

03 अप्रैल : सुप्रीम कोर्ट ने मामला दिल्ली हाइकोर्ट को वापस भेजा

2008

18 सितंबर : केंद्र ने हाइकोर्ट से वक्त मांगा, याचिका नामंजूर, अंतिम बहस शुरू

07 नवंबर : कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

2009

02 जुलाई : हाइकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया

09 जुलाई : फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी गयी चुनौती

2012

15 फरवरी : सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दिन प्रतिदिन के हिसाब से सुनवाई शुरू की

2013

11 दिसंबर : सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाइकोर्ट के 2009 के फैसले को रद्द किया

20 दिसंबर : केंद्र ने फैसले की समीक्षा के लिए याचिका दाखिल की

2014

28 जनवरी : सुप्रीम कोर्ट का फैसले की समीक्षा से इनकार

2016

02 फरवरी : सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता मामले को पांच जजों वाली पीठ के पास भेजा

2017

24 अगस्त : निजता का अधिकार, संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित

2018

08 जनवरी : सुप्रीम कोर्ट दोबारा विचार करने पर सहमत

10 जुलाई : संविधान पीठ ने सुनवाई शुरू की

11 जुलाई : केंद्र ने निर्णय सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर छोड़ा

17 जुलाई : सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

06 सितंबर : धारा 377 के एक वर्ग को अपराध के दायरे से बाहर रखने का फैसला

जानकर अत्यंत प्रसन्न हूं कि कोर्ट ने यौन गतिविधियों को अपराध मानने के खिलाफ फैसला दिया है. निर्णय धारा 377 और निजता, गरिमा तथा संवैधानिक स्वतंत्रता पर मेरे रुख का समर्थन करता है. शशि थरूर, कांग्रेस नेता

विशिष्ट रुझान वाले व्यक्ति के लिए आप इसे अपराध कैसे बना सकते हैं, समान लिंग के लोगों के बीच यौन संबंध होते हैं तो यह वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से घर के भीतर निजता से होने चाहिए.

सोली सोराबजी

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