पुरुषों की शादी के लिए कानूनी उम्र 21 से घटा कर 18 वर्ष करने की सिफारिश

-समाप्त हुआ 21वें विधि आयोग का कार्यकाल, सरकार को जारी किया परामर्श पत्रनयी दिल्ली : अपने कार्यकाल के आखिरी दिन 21वें विधि आयोग ने पारिवारिक कानून में सुधार की जरूरत पर बल देते हुए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को खारिज कर दिया. विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर अपनी समग्र रिपोर्ट देने से […]
-समाप्त हुआ 21वें विधि आयोग का कार्यकाल, सरकार को जारी किया परामर्श पत्र
नयी दिल्ली : अपने कार्यकाल के आखिरी दिन 21वें विधि आयोग ने पारिवारिक कानून में सुधार की जरूरत पर बल देते हुए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता को खारिज कर दिया. विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर अपनी समग्र रिपोर्ट देने से बचते हुए पारिवारिक कानून में सुधार का परामर्श पत्र जारी किया है. विधि आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि महिलाओं और पुरुषों के लिए शादी की न्यूनतम कानूनी उम्र समान होनी चाहिए.
आयोग ने कहा कि वयस्कों के बीच शादी की अलग अलग उम्र की व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए. दरअसल, विभिन्न कानूनों के तहत, शादी के लिए महिलाओं और पुरुषों की शादी की कानूनी उम्र क्रमश: 18 वर्ष और 21 वर्ष है. ‘परिवार कानून में सुधार’ पर अपने परामर्श पत्र में आयोग ने कहा कि अगर बालिग होने की सार्वभौमिक उम्र को मान्यता है जो सभी नागरिकों को अपनी सरकारें चुनने का अधिकार देती है तो निश्चित रूप से, उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने में सक्षम समझा जाना चाहिए.
बालिग होने की उम्र (18 साल) को भारतीय बालिग अधिनियम 1875 के तहत महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए शादी की कानूनी उम्र के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए. पत्र में कहा गया है कि पति और पत्नी के लिए उम्र में अंतर का कोई कानूनी आधार नहीं है क्योंकि शादी कर रहे दोनों लोग हर तरह से बराबर हैं और उनकी साझेदारी बराबर वालों के बीच वाली होनी चाहिए.
समान नागरिक संहिता का जिम्मा अगले विधि आयोग पर
आयोग ने कहा है कि समान नागरिक संहिता एक व्यापक विषय है. इसे अभी परखा नहीं गया है, इसलिए आयोग अपने दो वर्ष के गहन शोध, परामर्श और परिचर्चा के आधार पर पारिवारिक कानून में सुधार की जरूरत पर बल देता है. समान नागरिक संहिता की अंतिम रिपोर्ट का जिम्मा अगले (22वें) विधि आयोग पर डालते हुए आयोग ने कहा कि अभी न तो इसकी (समान नागरिक संहिता) आवश्यकता है और न ही यह वांछनीय है. विधि मंत्रालय ने 17 जून 2016 को आयोग से कहा था कि वह कि समान नागरिक संहिता के मामले को देखे. परामर्श पत्र में कहा गया कि समान नागरिक संहिता का मुद्दा व्यापक है और उसके संभावित नतीजे अभी भारत में परखे नहीं गये हैं.
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