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राजस्थान की पुस्तक में तिलक को बताया गया आतंकवाद का जनक

Updated at : 12 May 2018 4:52 PM (IST)
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राजस्थान की पुस्तक में तिलक को बताया गया आतंकवाद का जनक

जयपुर : स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक को राजस्थान के आठवीं क्लास की पुस्तक में आतंक का जनक बताया गया है. इस पुस्तक में लिखे शब्दों को लेकर अब बवाल मचा है. राजस्थान बोर्ड से मान्यता प्राप्त अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में यह पुस्तक पढ़ाई जा रही है. इस मामले पर विवाद बढ़ने के बाद […]

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जयपुर : स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक को राजस्थान के आठवीं क्लास की पुस्तक में आतंक का जनक बताया गया है. इस पुस्तक में लिखे शब्दों को लेकर अब बवाल मचा है. राजस्थान बोर्ड से मान्यता प्राप्त अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में यह पुस्तक पढ़ाई जा रही है. इस मामले पर विवाद बढ़ने के बाद प्रकाशक ने अपने हाथ पीछे खींचते हुए इसे अनुवाद की गलती बताकर सुधार की बात कही है.

लेकिन इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है. कांग्रेस ने इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज करते हुए इसे पाठ्यक्रम से हटाने की मांग की है. राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट ने इसे देश का अपमान करार देते हुए कहा, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है इससे स्वतंत्रता सेनानियों की गरिमा को ठेस पहुंच रही है. कांग्रेस ने सरकार से मांग की है कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के संदर्भ में जिस पुस्तक में गलत तथ्य लिखे गये हैं उसे पाठ्यक्रम से हटाया जाये और पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया जाये.

भाजपा ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कार्रवाई की बात कही है. राजस्थान राज्य पाठ्यक्रम बोर्ड हिंदी में किताबें प्रकाशित करता है. राजस्थान बोर्ड के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के लिए मथुरा के एक प्रकाशक द्वारा प्रकाशित पुस्तक को इस्तेमाल में लाया जाता है. इस पुस्तक के पेज संख्या 267 अध्याय 22 में बाल गंगाधर तिलक का जिक्र है. इसमें जिक्र है कि उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन का रास्ता दिखाया था, इसलिए उन्हें ‘आतंकवाद का जनक’ (फादर ऑफ टेररिज्म) कहा जाता है.

इस पुस्तक में 18वीं और 19वीं शताब्दी के राष्ट्रीय आंदोलन की चर्चा है जिसमें तिलक के हवाले से कहा गया है- ‘ब्रिटिश अधिकारियों से प्रार्थना करने मात्र से कुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता.’ इस मामले पर प्रकाशक की तरफ से भी सफाई आयी है. प्रकाशक ने कहा, गलती हुई है जिसे पकड़ लिया गया है. इसे संशोधित कर प्रकाशन में सुधार कर लिया गया है. गलती अनुवादक के तरफ से हुई है. पिछले माह के अंक में ही इसे सुधार लिया गया है. किताब का पहला अंक पिछले वर्ष प्रकाशित किया गया था. इतिहासकारों ने इसे बड़ी गलती बताते हुए कड़ी निंदा की है.

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