-प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव 2026 का समापन
-दिशोम गुरु शिबू सोरेन को जयंती पर किया गया याद, तस्वीर पर माल्यार्पण कर दी गयी श्रद्धांजलि
-शिक्षक अरविंद तिवारी की पुस्तक स्कूल में जेंडर का विमोचन साहित्यकार रणेंद्र एवं महादेव टोप्पो ने किया
Jamshedpur News :
प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव 2026 के तीसरे और अंतिम दिन के सत्र की शुरुआत दिशोम गुरु शिबू सोरेन को उनकी जयंती पर याद कर किया गया. रविवार को जिले के उपायुक्त समेत साहित्यकारों ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर नमन किया. प्रथम सत्र में अनुकृति उपाध्याय से यदुवंश प्रणय की ””””टू लैंग्वेजेज वन इनर वर्ल्ड”””” विषय के बहाने अनुकृति के जीवन संदर्भों और रचना प्रक्रिया पर बातचीत से सभागार का माहौल ऊर्जा से भर गया. इसी क्रम में वैश्विक साहित्य को जन सुलभ बनाने के लिए अनुवादकों की भूमिका पर बात करते हुए अनुकृति ने कहा कि भाषा को साधा जाना चाहिए, देश, काल और समय के दायरे में बांधा नहीं जाना चाहिए और यह काम अनुवादक कर रहे हैं. कहानियों की भाषा परिवेश और काल भिन्न हो सकते हैं, परंतु मानवीय सरोकार सार्वदेशिक और सर्वकालिक हैं. दूसरे सत्र में ग्लोबल गांव के देवता एवं गूंगी रुलाई के कोरस पुस्तक के लेखक एवं मशहूर साहित्यकार रणेंद्र ने आदिवासी समाज एवं बिरसा मुंडा को लेकर उनके लिखे उपन्यासों एवं पात्रों की चर्चा करते हुए कहा कि महाश्वेता देवी के अलावा विरले ही कोई लेखक मिलते हैं, जो सड़क पर भी उतरे हों और लेखन से भी जुड़े हों. महाश्वेता देवी की पुस्तक जंगल के दावेदार एवं चोट्टी मुंडा के तीर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक किताब किसी शहीद की यात्रा को कितना आगे ले जाती है, यह सबसे बड़ा उदाहरण है. उन्होंने बताया कि इन पुस्तकों के बाद ही बिरसा मुंडा एवं आदिवासी समुदाय के संघर्षों का मूल्यांकन राष्ट्रीय स्तर पर सही तरीके से हो सका. कई प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासियों के आंदोलन का तरीका व्यक्तिवादी नहीं होता, सामुदायिक होता है. उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि यदि आदिवासी समाज को समझना है, तो महाश्वेता देवी की रचनाओं को जरूर पढ़ें.झारखंड में इको टूरिज्म को बढ़ावा देना जरूरी
तीसरा सत्र पक्षी विज्ञानी बिक्रम ग्रेवाल और युवा रचनाकार, विशेषज्ञ रजा काजमी की बातचीत का रहा. बिक्रम ग्रेवाल की चिंताएं देश में घटते जंगल, लुप्त होते पक्षी, विलुप्त होते पशु से लेकर उन्हें बचाने के उपाय तक एक लंबी चर्चा के रूप में आयी. उन्होंने कहा लोगों को जंगलों और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील करना ही एकमात्र विकल्प है. कहा कि झारखंड में बर्ड वाचिंग जैसे इको टूरिज्म को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि पशु, पक्षी, जंगल से जुड़ सकें.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

