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102 वर्षो से हो रही देवी दुर्गा की पूजासिंदूर खेला है आकर्षण का केंद्र.

Updated at : 24 Sep 2025 5:46 PM (IST)
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102 वर्षो से हो रही देवी दुर्गा की पूजासिंदूर खेला है आकर्षण का केंद्र.

कोयलांचल में कई जगहों पर दुर्गोत्सव का आयोजन भव्य तरीके से किया जाता है.

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रोहित कुमार, मैक्लुस्कीगंज.

कोयलांचल में कई जगहों पर दुर्गोत्सव का आयोजन भव्य तरीके से किया जाता है. ऐसे में मैक्लुस्कीगंज में खास होती है दुर्गा पूजा. सिंदूरखेला मुख्य आकर्षण होता है. सन 1920 के दशक में जब मैक्लुस्कीगंज में सिंगल रेलवे लाइन का निर्माण अंग्रेज करा रहे थे. उक्त निर्माण कार्य में बड़े पैमाने पर मजदूरों की आवश्यकता थी. उसी समय पश्चिम बंगाल से मजदूरों के एक समूह को काम के लिए मैक्लुस्कीगंज लाया गया. मजदूर लंबे समय तक रेलवे लाइन निर्माण कार्य में जुटे रहे. उन्हीं मजदूरों ने लगभग 1923-24 में अमावस्या के दिन महालया के साथ बंग विधि से शारदीय नवरात्र पूजा का शुभारंभ किया. देखते-ही-देखते मैक्लुस्कीगंज सहित आसपास के प्रबुद्धजनों ने आपसी सहयोग से दुर्गोत्सव को भव्य रूप दिया. चूंकि बंगाली समाज के लिए दुर्गा पूजा सबसे बड़ा त्योहार है, उक्त समाज की महिलाओं सहित श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा के सभी स्वरूपों की आराधना को एक अलग अंदाज दिया. विजयादशमी को उनका सिंदूरखेला अलौकिक था. विजयादशमी पर एक दूसरे को आशीर्वाद व शुभकामनाएं देने का रीति आज भी देखने को मिलता है. नवरात्र के अवसर पर पर्याप्त संसाधनों का अभाव होते हुए भी नाटक व ड्रामा जैसे आयोजन हुआ करते थे. जो आज सांस्कृतिक व भक्ति जागरण का रूप ले चुका है. पतरातू, रामगढ़, हजारीबाग, रांची, डालटनगंज, लातेहार, नावाडीह, लपरा, हेसालौंग, निंद्रा, काली, दुल्ली, चंदवा आदि कई जगहों से भक्तों का तांता अद्भुत भक्तिमय दृश्य देखने आया करती थी. मैक्लुस्कीगंज स्थित लपरा शिव मंदिर परिसर में आयोजित दुर्गोत्सव में देखने को मिलता है.

वरिष्ठ पुरोहित बलराम पाठक के अनुसार बंगाली विधि से पूजन कार्य के लिए बंगाल से पुजारी आया करते थे, उन्हीं में से एक थे सूची पंडित. बाद में लक्ष्मी नारायण पाठक व उनके वंशजों ने आज भी विधि-विधान से पूजन कार्य संपन्न कराते आ रहे हैं.

1936 में मंदिर निर्माण के बाद यहीं होने लगी पूजा :

बंगाली समुदाय के मजदूरों ने मैक्लुस्कीगंज स्टेशन परिसर में तिरपाल से टेंट बनाकर पूजा शुरू की थी. बाद में दीपचंद अग्रवाल ने पूजा का खर्च उठाया और फिर लपरा शिव मंदिर के निर्माण के बाद स्थानीय प्रबुद्धजनों ने आपसी सहयोग से भव्य रूप में पूजा आयोजित की जाने लगी. उसके बाद से मां दुर्गा की पूजा में अन्य प्रमुख माता लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय की भी प्रतिमा स्थापित होने लगी. आज भी बंगाल व अन्य राज्यों से श्रद्धालु मैक्लुस्कीगंज दुर्गा पूजा मनाने आते हैं. लोग पूरे नवरात्र यहीं बिताते हैं.

बंग विधि से पूजा करते हैं मंदिर समिति के सदस्य :

मंदिर के पुरोहित प्रदीप पाठक (लल्लू पाठक) जयप्रकाश पांडेय व समिति के जितेन्द्रनाथ पांडेय, गीता देवी, विजय गुप्ता, मनोज गिरि, रूपेश चौरसिया, कृष्णा लोहरा, सुनील गिरि, अमित गुप्ता, सुबोध रजक, रौशन, प्रदीप यादव, आशीष, रमेश गुप्ता, सहित स्व शिवपूजन सिन्हा का पूरा परिवार बंग परंपरा को विधिवत निभाते आ रहे हैं.

फ़ोटो 1 – निर्माणाधीन पंडाल.

फ़ोटो 2- पुतुल देवी, संरक्षक.

फ़ोटो 3 – जितेन्द्रनाथ पांडेय, अध्यक्ष.

फ़ोटो 4 – विजय गुप्ता, सचिव.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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ROHIT KUMAR MAHT

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By ROHIT KUMAR MAHT

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