वायरल इन्फेक्शन है हर्पिज जेनिटलिस

हर्पिज जेनिटलिस यौन संक्रामक रोग है, जो वायरस के कारण फैलता है. कुछ लोगों में संक्रमण के बाद भी इसका पता नहीं चलता है, तो कुछ लोगों में यह गंभीर रूप धारण कर सकता है. समय पर इलाज करा लेने से इससे होनेवाली परेशानियों से बचा जा सकता है. डॉ प्रीति राय स्त्री रोग विशेषज्ञ […]
हर्पिज जेनिटलिस यौन संक्रामक रोग है, जो वायरस के कारण फैलता है. कुछ लोगों में संक्रमण के बाद भी इसका पता नहीं चलता है, तो कुछ लोगों में यह गंभीर रूप धारण कर सकता है. समय पर इलाज करा लेने से इससे होनेवाली परेशानियों से बचा जा सकता है.
डॉ प्रीति राय
स्त्री रोग विशेषज्ञ इनसाइट केयर क्लिनिक बूटी मोड़, रांची
35 वर्ष की एक महिला इलाज कराने आयी. उसके गुप्तांग में तेज जलन और दर्द की शिकायत थी. इसके साथ ही चिपचिपा पदार्थ आने की भी शिकायत थी. पेशाब के दौरान भी काफी तेज जलन और दर्द की समस्या थी. उक्त समस्या उसे तीन-चार दिनों से हो रही थी. उसकी तकलीफ इतनी ज्यादा थी कि वह चलने में भी असमर्थ थी. जांच के दौरान पाया गया कि उसके गुप्तांग में ढेर सारे छोटे-छोटे घाव हो गये थे. उस महिला के अनुसार दो दिन पहले तक पानी से भरे हुए फफोले थे और वे खुद ही फट गये थे. उनमें से पीले व सफेद रंग का स्राव भी हो रहा था. क्लिनिकली इस रोग को पहचानना आसान था. उसे हर्पिज जेनिटलिस का इन्फेक्शन हुआ था.
फिर भी महिला की कुछ जांच की भी करायी गयी. रूई की मदद से लिये गये घाव के पानी का स्मीयर और कल्चर कराया गया. आरबीएस, टीसी, डीसी, डब्ल्यूबीसी, पेशाब का आर/इ और सी/एस जांच करायी गयी. मरीज को रोग के लक्षण के आधार पर एसाइक्लोविर गोली तथा मलहम एवं दर्द के लिए दवा तथा मलहम दिया गया. सेकेंडरी इन्फेक्शन रोकने के लिए एंटीबायोटिक दी गयी. दो दिन में घाव में तथा मरीज की तकलीफ में कोई खास सुधार नहीं हुआ. कल्चर की रिपोट आने पर एमिकेसिन इन्जेक्शन शुरू किया गया. पहले दो दिन में ही मरीज को काफी राहत महसूस हो गयी. दो-तीन दिनों में घाव भी सूख गये. अत: दवाओं के कोर्स के बाद दवाएं बंद कर दी गयीं. पति को भी प्रोफाइलेक्सी के लिए एसाइक्लोविर का एक कोर्स दिया गया.
क्या है यह रोग
हर्पिज जेनिटलिस सेक्सुअली ट्रांसमिटेड रोग है. यह हर्पिज सिंपलैक्स वायरस से होता है. अधिकतर लोगों को रोग के होने का पता नहीं चलता है, क्योंकि अधिकतर लोगों में लक्षण कम नजर आते हैं. यह वायरस बिना कोई लक्षण पैदा किये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में जा सकता है. एक बार त्वचा में प्रवेश कर जाता है, तो नर्व के माध्यम से शरीर में एक जगह से दूसरी जगह जा सकता है और लंबे समय तक अक्रिय रह सकता है. अनुकूल परिस्थितियों में यह सक्रिय हो जाता है. फफोले से निकलनेवाले द्रव से दूसरे अंग में भी रोग फैल सकता है.
क्या होते हैं खतरे
रोग होने के बाद अन्य यौन संक्रामक रोग होने का खतरा बढ़ जाता है. यदि रोग गर्भावस्था में हुआ है, तो जन्म के समय वायरस के संपर्क में आने से नवजात के दिमाग या आंखों को नुकसान पहुंच सकता है. मृत्यु भी हो सकती है. कभी-कभी मूत्रनली में इन्फ्लेमेशन होने से यह अवरुद्ध हो सकती है. इसके कारण पेशाब नहीं हो पाता है और तब कैथेटर की मदद से पेशाब को शरीर से बाहर निकालना पड़ता है.
इलाज : इलाज मरीज की परिस्थिति के अनुसार किया जाता है. आमतौर पर एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं. सेकेंडरी इन्फेक्शन को रोकने के लिए एंटीबायोटिक दी जाती है. जरूरत पड़ने पर पति का भी इलाज साथ में ही किया जाता है. अन्यथा यह रोग दोबारा होने का खतरा होता है.
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