हड्डियों को कमजार बनाते है कुछ रोग, व्यायाम से होता है फायदा

हड्डी का टूटना काफी कष्टप्रद होता है. कभी-कभी हड्डी का टूटना संयोग नहीं होता है, बल्कि इसका कारण आॅस्टियोपोरोसिस भी हो सकता है. बिना कारण हड्डियों में दर्द होना इसका लक्षण है. कुछ रोगों के कारण यह कम उम्र में भी हो सकता है. इससे पहले कि समस्या बढ़े, इसका उपचार करा लेना चाहिए. हड्डियों […]
हड्डी का टूटना काफी कष्टप्रद होता है. कभी-कभी हड्डी का टूटना संयोग नहीं होता है, बल्कि इसका कारण आॅस्टियोपोरोसिस भी हो सकता है. बिना कारण हड्डियों में दर्द होना इसका लक्षण है. कुछ रोगों के कारण यह कम उम्र में भी हो सकता है. इससे पहले कि समस्या बढ़े, इसका उपचार करा लेना चाहिए. हड्डियों के इस साइलेंट किलर के बारे में जानकारी दे रहे हैं विशेषज्ञ.
हड्डियों के कमजोर होकर आसानी से टूटने की समस्या को ओस्टियोपोरोसिस कहते हैं. ऐसी स्थिति में रोग के उपचार से और हड्डियों की मजबूती के लिए किये गये उपाय अपनाने से समस्या दूर हो सकती है. कुछ प्रमुख रोग जिनमें हड्डियां होती हैं कमजोर-
थायरॉयड रोग
गरदन के निचले हिस्से में थायरॉयड ग्रंथि होती है. इसमें कई प्रकार के हार्मोंस बनते हैं. थायरॉयड हार्मोंस हमारे शरीर में मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं. ये शरीर के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इन हार्मोंस के निर्माण में बाधा आने पर पूरे शरीर पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है. व्यक्ति का वजन बढ़ सकता है. इसके अलावा थकान, अधिक नींद आना, सिरदर्द, पेट दर्द, भूख कम लगना, चेहरे और आंखों पर सूजन रहना आदि थायरॉयड के ही लक्षण हैं. ब्लड कोलेस्ट्रॉल लेवल भी कम हो जाता है. इस दौरान गुस्सा भी अधिक आता है. इससे हड्डी बनने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है, जिससे कम उम्र में भी आॅस्टियोपोरोसिस हो सकता है.
थायरॉयड को रखें कंट्रोल
इलाज में अधिक खर्च नहीं आता है, लेकिन कुछ टेस्ट कराने में अधिक खर्च आ सकता है. रोग को दूर करने के लिए दिनचर्या को भी बदलना जरूरी है.
थायरॉयड को कंट्रोल में रखने के लिए नियमित दवाई का सेवन करते रहें और खान-पान में भी सुधार लाएं और हेल्दी डायट लें. नियमित योग व एक्सरसाइज से भी इस रोग को रोका जा सकता है.
क्रॉनिक किडनी डिजीज
किडनी का कार्य शरीर में मौजूद अनावश्यक पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना है. आजकल पानी कम पीने और मिलावटी चीजों के सेवन से क्रॉनिक किडनी डिजीज बढ़ रहा है. क्रॉनिक किडनी फेल्योर इसी श्रेणी में आता है. इस रोग में मिनरल्स के मेटाबॉलिज्म में कमी आती है.
इसकी वजह से कैल्शियम, फॉस्फोरस, विटामिन डी की कमी होने लगती है. इससे आॅस्टियोपोरोसिस होने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है क्योंकि मिनरल्स और विटामिंस की कमी की वजह से शरीर में नयी हड्डियों के निर्माण की गति धीमी हो जाती है और धीरे-धीरे बोन डेंसिटी कम होने लगती है. अत: इससे संबंधित उपचार में कोई भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. किडनी रोग में भरपूर पानी पीना चाहिए.
हड्डियों को कमजोर बनाते हैं कुछ रोग
डॉ एल तोमर
वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ, मैक्स हॉस्पिटल, दिल्ली
हड्डियां कई कारणों
से कमजोर हो सकती हैं. यह समस्या अधिक उम्र के लोगों को तो परेशान करती ही है, लेकिन कई बार कुछ रोगों के कारण कम उम्र में भी परेशान करती है. ऐसे में रोगों को दूर करके हड्डियों को बचाया जा सकता है.
क्या हैं लक्षण
– जोड़ों, जैसे-कलाई और हाथ की हड्डी आदि में आसानी से फ्रैक्चर हो जाना
– हड्डियों और मांसपेशियों में हमेशा हल्का दर्द होते रहना
– हल्की-सी चोट लगने पर भी फ्रैक्चर होना
– गरदन और पीठ के निचले हिस्से में हल्का-सा दबाव पड़ने पर भी तेज दर्द उठना
कब बढ़ता है खतरा
– विटामिन डी, प्रोटीन, कैल्शियम की कमी से
– निष्क्रिय जीवनशैली की वजह से
– धूम्रपान और अल्कोहल का सेवन करने से
– महिलाओं में मेनोपॉज के बाद
– स्टेरॉयड दवाओं के सेवन से
– व्यायाम नहीं करने से
कुछ लोगों में यह भ्रम होता है कि एक बार रोग हो गया, तो दूर नहीं होगा, जबकि ऐसा नहीं है. समय पर इसका पता चल जाये, तो इस रोग को दवाइयों से ठीक किया जा सकता है. यदि यह बढ़ती उम्र के कारण होता है, तो भी उसे दवाइयों से उसी स्तर पर रोका जा सकता है, जहां तक वह पंहुच चुकी है. इससे हड्डियां ओर अधिक कमजोर नहीं होती हैं. आॅस्टियोपोरोसिस को शरीर पर हावी न होने दें इसके लिए नियमित एक्सरसाइज करें और दवाइयों का सेवन करें.
नियमित करें व्यायाम
वेट बियरिंग एक्सरसाइज : इसके अंतर्गत वाकिंग, स्किपिंग, जॉगिंग आदि एक्सरसाइज आते है. इससे शरीर के विभिन्न अंगों में मूवमेंट रहती है, साथ ही जोड़ों में भी मूवमेंट होता है, जिससे हड्डियों के पास मौजूद मशल्स एक्टिव होते हैं और पोषक तत्व प्राप्त करते हैं, जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं.
वेट लिफ्टिंग : मशल्स में खिंचाव के लिए की जानेवाली वेट लिफ्टिंग की एक्सरसाइज भी हड्डियों के लिए काफी महत्वपूर्ण है. इससे हड्डियों में मजबूती आती है. आप घर पर ही वेट लिफ्टिंग मशीन मंगा कर यह एक्सरसाइज कर सकते हैं.
रोग होने के बाद व्यायाम
यदि आॅस्टियोपोरोसिस हो चुका हो, तो एक्सरसाइज भी बड़ी सावधानी से करना चाहिए. कई बार मरीजों के लिए एक्सरसाइज भी कष्टकारी बन जाता है. ऐसे में एक्सरसाइज के दौरान हल्के ठोकर से फ्रैक्चर होने का खतरा होता है. अत: सावधानी बरतनी चाहिए और कठिन व्यायाम नहीं करना चाहिए. आॅस्टियोपोरोसिस होने के बाद डॉक्टर से रोग की अवस्था अवश्य जान लें और उसी के अनुसार एक्सरसाइज करें, ताकि किसी अन्य परेशानी का सामना न करना पड़े.
कर सकते हैं ये एक्सरसाइज
एरोबिक्स है बेस्ट
आॅस्टियोपोरोसिस होने के बाद एरोबिक्स एक्सरसाइज बेस्ट है. इसमें फ्रैक्चर होने का खतरा कम होता है साथ ही शरीर के अंगों में मूवमेंट भी बनी रहती है.
लो इंपैक्ट वेट मशीन
यदि आप बॉडी वेट मेंटेन करने के लिए हेवी मशीन से एक्सरसाइज करते हैं, तो इसमें फ्रैक्चर का खतरा ज्यादा होता है. ऐसे में आपके लिए लो इंपैक्ट वेट मशीन बेस्ट आॅप्शन है. बाजार में कई लो इंपैक्ट वेट मशीन मौजूद हैं, जैसे-स्टेयर स्टेप मशीन आदि, जिनकी मदद से आप आसानी से वेट कंट्रोल कर सकते हैं और हड्डियों को भी मजबूत बना सकते हैं.
एक्सरसाइज के फायदे
– शरीर में मशल्स की स्ट्रेंथ बढ़ती है
– दर्द से राहत दिलाती है
– बॉडी पोश्चर को मेंटेन रखती है
– हड्डियों में मूवमेंट बना रहता है
बुजुर्ग बरतें ये सावधानियां
– नियमित एक्सरसाइज करते रहें
– ज्यादा फैटवाला भोजन न लें, संतुलित और पौष्टिक आहार लें.
– दर्द होने पर खुद से पेनकिलर का इस्तेमाल न करें.
– जीवनशैली में बदलाव लाएं.
– सुबह देर से न उठें.
– यदि दर्द हो, तो चिकित्सक से
सलाह लें.
– हल्की एक्सरसाइज और जॉगिंग करें.
कराएं बोन मिनरल
डेंसिटी टेस्ट
आॅस्टियोपोरोसिस न भी हो, फिर भी नियमित रूप से बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट कराना चाहिए. इससे हड्डियों के घनत्व का पता चलता है. इसी टेस्ट की रिपोर्ट के आधार पर आॅस्टियोपोरोसिस की पुष्टि होती है. डॉक्टरों के अनुसार 40 साल की आयु के बाद नियमित रूप से बोन डेंसिटी टेस्ट कराना चाहिए.
एक्सपर्ट व्यू
जानें क्या है आॅस्टियोपोरोसिस
शरीर निरंतर नयी हड्डियां बनाता रहता है और पुरानी हड्डियां खत्म होती रहती हैं. यदि निर्माण की प्रक्रिया धीमी हो जाये और क्षरण तेज हो जाये, तो हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. यही ऑस्टियोपोरोसिस है. इसके कारण फ्रैक्चर आसानी से होता है. यदि लगातार किसी हड्डी में दर्द रहता है, तो इसके टूटने का खतरा अधिक होता है. व्यक्ति में लगभग 35 वर्ष तक कैल्शियम जमा होता है. इसे ही पीक बोन मास कहते हैं. उसके बाद उम्र भर उसी से खर्च होता है. महिलाओं में 40 के बाद और पुरुषों में 50 के बाद इसका खतरा बढ़ता है. कमर दर्द रोग का प्रमुख लक्षण है.
यदि कमर में दर्द 40 के बाद हो, तो बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट जरूर कराएं. यदि महिला दो साल से अधिक समय तक बच्चे को दूध पिलाती है, तो उसे भी कमर दर्द हो सकता है. कैल्शियम और विटामिन डी के सेवन से दर्द दूर हो जाता है. पेन किलर की जरूरत नहीं पड़ती है. बुजुर्गों को खास ख्याल रखने की जरूरत है. कूल्हे की हड्डी का फ्रैक्चर खतरनाक और कष्टकारी है. बुढ़ापे में हड्डियों के नहीं जुड़ पाने पर हड्डी को निकाल कर स्टील लगा दिया जाता है.
क्या है सबसिडेंस आॅस्टियोपोरोसिस
आजकल मोटापे की शिकायत बढ़ गयी है. इससे घुटनों पर दबाव बढ़ता है और घुटनों के जोड़ घिस जाते हैं. इससे भी आर्थराइटिस के मरीज बढ़े हैं. इसे सबसिडेंस ऑस्टियोपोरोसिस कहते हैं. इस अवस्था में यदि इलाज शुरू हो जाये, तो हड्डियों को बचाया जा सकता है. अत: रोग शुरू होने से पहले हड्डियों को सभी पोषक तत्व दे देने से राेग रुक जाता है. आधे घंटे कपड़े पहन कर, सिर्फ चेहरा खुला रख कर धूप में रहने से भी विटामिन डी की पूर्ति हो जाती है. क्षरण रोकने वाली व निर्माण बढ़ानेवाली दवाएं दी जाती हैं. दोनों का प्रयोग एक साथ नहीं किया जाता.
बातचीत : अजय कुमार
रोज दूध पीना है जरूरी
बढ़ते बच्चों को रोज एक ग्राम, वयस्क को एक ग्राम और दूध पिलानेवाली व प्रेग्नेंट महिलाओं को 1.5 ग्राम कैल्शियम की जरूरत होती है. बच्चों को रोज एक गिलास दूध पीना जरूरी है. 250 एमएल दूध में 275 मिलीग्राम कैल्शियम होता है.
दूध और दूध से बनी चीजों (दही, पनीर, खोया आदि) के अलावा हरी सब्जियों (पालक, बीन्स, ब्रोकली, चुकंदर, कमलककड़ी आदि), फल (केला, संतरा, शहतूत, सिंघाड़ा, मखाना आदि), ड्राइ-फ्रूट्स (खजूर, अंजीर, अखरोट आदि) और अंडे में कैल्शियम होता है. ज्यादा कैल्शियम से कोई नुकसान नहीं होता. अगर शरीर को ज्यादा कैल्शियम मिल रहा है, तो वह पेशाब और मल के जरिये बाहर निकल जाता है. हालांकि कभी-कभी किडनी के कुछ खास तरह के स्टोन्स (पथरी) के बनने की वजह कैल्शियम होता है लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता है.
अधिक महिलाएं होती हैं शिकार
ऑस्टियोपोरोसिस पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में अधिक होता है. महिला और पुरुष में इसके होने का अनुपात 2:1 है. यह रोग मोटापा के कारण भी हो सकता है. अत: जिन महिलाओं का वजन अधिक है, उन्हें सावधान रहना चाहिए.
महिलाओं में मेनोपॉज के बाद हड्डियों का घनत्व बनाये रखनेवाले हॉर्मोन एस्ट्रोजन के स्तर में भी कमी आ जाती है, जिससे उनमें मेनोपॉज के बाद इस रोग का खतरा बढ़ जाता है. महिलाओं में 55 से 60 वर्ष की उम्र तक हड्डियों का घनत्व 30 प्रतिशत तक कम हो जाता है. इसके अलावा ध्रूमपान और अल्कोहल का सेवन करनेवाली महिलाओं में तो मेनोपॉज से पहले ही अर्थात पेरीमेनोपॉजल ऑस्टियोपोरोसिस के होने का खतरा होता है.
महिलाओं के लिए खास टिप्स : घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अकसर महिलाएं खुद के प्रति लापरवाह हो जाती हैं. वहीं वर्किंग वीमेन भी समय के अभाव में खुद की सेहत का ध्यान नहीं रख पाती हैं.
यदि नियमित रूप से मात्र आधा घंटा प्रतिदिन अपनी सेहत के लिए खर्च करती हैं, तो निश्चित रूप से आप आॅस्टियोपोरोसिस से बच सकती हैं. एक्सरसाइज से बोन्स हेल्दी रहते हैं. रेगुलर एक्सरसाइज से हड्डियों का निर्माण तेजी से होता है. अत: रेगुलर एक्सरसाइज की जाये, तो काफी हद तक आॅस्टियोपोरोसिस को रोका जा सकता है.
बातचीत व आलेख : कुलदीप तोमर
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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