मूर्छा प्राणायाम से होता है आनंद का अनुभव
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :19 Oct 2016 11:48 AM (IST)
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धर्मेंद्र सिंह एमए योग मनोविज्ञान बिहार योग विद्यालय, मुंगेर मूर्छा का अर्थ ‘मूर्छित होना है’. इस प्राणायाम द्वारा साधक विषय-जगत की चेतना से मूर्छित हो जाता है. इसके अभ्यास से सिर हल्का हो जाता है और बेहोशी के समान स्थिति होती है. साधक की दृश्य जगत के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है. देहाभास मिटने […]
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धर्मेंद्र सिंह
एमए योग मनोविज्ञान
बिहार योग विद्यालय, मुंगेर
मूर्छा का अर्थ ‘मूर्छित होना है’. इस प्राणायाम द्वारा साधक विषय-जगत की चेतना से मूर्छित हो जाता है. इसके अभ्यास से सिर हल्का हो जाता है और बेहोशी के समान स्थिति होती है. साधक की दृश्य जगत के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है. देहाभास मिटने लगता है और मन में शांति आती है और तनाव दूर होता है. जिन लोगों को तनाव की समस्या अधिक होती है, उनके लिए यह लाभकारी है.
अभ्यास की विधि : ध्यान के किसी भी आरामदायक आसन में बैठ जाएं. सिर, मेरुदंड और गरदन सीधी लाइन में व दोनों हाथ घुटनों के ऊपर होने चाहिए. शरीर को शांत व शिथिल बनाये रखें. अब आप अपने हरेक आते-जाते श्वास-प्रश्वास के प्रति सजग बनें और उसे धीमा तथा गहरा होने दें.
अब खेचरी मुद्रा लगाते हुए सिर को थोड़ा पीछे की ओर झुकाते हुए उज्जायी प्राणायाम के साथ दोनों नासिका छिद्रों से धीरे-धीरे श्वास लें और आंखों को दोनों भंवों के बीच देखते हुए शांभवी मुद्रा लगाएं.
अब दोनों हाथों को घुटनों के ऊपर दबाते हुए कोहनियों को सीधा करते हुए हाथों को पूरा सीधा करें. शांभवी मुद्रा में क्षमता के अनुसार सांस रोकें. अब हाथों को ढीला करते हुए सांस छोड़ें. अब आंखों को बंद कर लें, तथा धीरे-धीरे सिर को पुन: सीधा करें. आंखों को बंद रखते हुए पूरे शरीर को कुछ क्षणों के लिए शिथिल करें तथा शरीर और मन में हल्केपन तथा शांति का अनुभव करें. यह अभ्यास का एक चक्र है.
अवधि : मूर्छा प्राणायाम से अधिक लाभ पाने हेतु इसका अभ्यास एक घंटे तक किया जा सकता है. किंतु नये अभ्यासी को शुरू में 10 मिनट करना पर्याप्त होगा. अपने दैनिक अभ्यास के साथ-साथ उसकी अवधि भी आप धीरे-धीरे बढ़ाएं. लेकिन तनाव और दबाव न आने दें. जब मूर्छा या बेहोशी का अनुभव होने लगे, तो अभ्यास बंद कर दें.
सजगता : इस अभ्यास के दौरान आपकी सजगता शारीरिक स्तर पर सांस, सिर की गति और भवों के मध्य पर होनी चाहिए. आध्यात्मिक स्तर पर चिदाकाश या भवों के मध्य में शून्य पर रहेगी.
क्रम : मूर्छा प्राणायाम का उत्तम समय आसनों के पश्चात और ध्यानाभ्यास के पहले माना गया है. सोने के पहले भी यह अभ्यास लाभदायक है.
सावधानियां : यह अभ्यास सिर में हल्केपन या बेहोशी की अवस्था लाता है. इसलिए इसका अभ्यास किसी विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए.
चेतावनी : इस प्राणायाम का अभ्यास इतना नहीं करना चाहिए कि बेहोश हो जाएं. अत: अभ्यास के दौरान जैसे ही कुछ मूर्छा का अनुभव होने लगे, तो तुरंत अभ्यास बंद कर देना ज्यादा उचित होगा. अन्यथा इससे कुछ समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं.
सीमा : इसका अभ्यास उच्च रक्तचाप, चक्कर आने या मस्तिष्क में चोट लगने और हृदय या फेफड़े के रोगों से पीड़ित लोगों को नहीं करना चाहिए. इसके अलावा जिन्हें मिरगी, मस्तिष्क रोगियों को इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए. जब बेहोशी की अवस्था का अनुभव होने लगे, तब अभ्यास बंद कर दें. इस अभ्यास की मदद से अर्ध-मूर्छा की अवस्था को प्राप्त करना है, न कि पूर्ण मूर्छा में जाना.
नोट : योग या प्राणायाम के किसी भी अभ्यास को टीवी देख कर या किताब पढ़ कर न करें. किसी कुशल प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में ही करना लाभदायक हाेता है.
तनाव होता है दूर
मूर्छा प्राणायाम एक शक्तिशाली अभ्यास है. इसमें जैसे-जैसे कुंभक की अवधि बढ़ती है वैसे-वैसे आनंद में वृद्धि होती है. इसके अभ्यास से संपूर्ण शरीर और मस्तिष्क को अपार विश्राम मिलता है. व्यक्ति का बहिमुर्खी मन स्वत: अंतमुर्खी होने लगता है. अत: धीरे-धीरे वह बाह्य जगत के अनुभवों, जैसे-गंध, स्पर्श, शब्द इत्यादि की संवेदनाओं से अपना संबंध विच्छेद करता जाता है. धीरे-धीरे मस्तिष्क विचार रहित हो जाता है.
इसके पश्चात स्वत: ध्यान और परमानंद की प्राप्ति होती है. यह ध्यान की तैयारी के लिए उत्तम अभ्यास है, क्योंकि यह अंतमुर्खी बना कर अतींद्रिय स्थिति का अनुभव दिलाने में सहायक है. यह तनाव, चिंता, क्रोध, स्नायु रोगों एवं अन्य मानसिक समस्याओं से मुक्ति दिलाता है तथा प्राण ऊर्जा में वृद्धि करता है. तनाव का अनुभव करनेवाले लोगों के लिए यह अभ्यास लाभकारी है.
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