बिना सर्जरी भी ठीक हो सकते हैं कुछ हृदय रोग

Updated at : 30 Sep 2016 8:08 AM (IST)
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बिना सर्जरी भी ठीक हो सकते हैं कुछ हृदय रोग

डॉ सुभाष मनचंदा सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट, सर गंगाराम अस्पताल, दिल्ली तकनीक के उन्नत होने के साथ ही इलाज को लगातार आसान बनाने का प्रयास किया जा रहा है. पहले अधिकतर हृदय रोगों के उपचार के लिए सर्जरी को पहला और आखिरी हथियार माना जाता था. पर समय के साथ चिकित्सा जगत ने आज इतनी तरक्की कर […]

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डॉ सुभाष मनचंदा
सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट, सर गंगाराम अस्पताल, दिल्ली
तकनीक के उन्नत होने के साथ ही इलाज को लगातार आसान बनाने का प्रयास किया जा रहा है. पहले अधिकतर हृदय रोगों के उपचार के लिए सर्जरी को पहला और आखिरी हथियार माना जाता था. पर समय के साथ चिकित्सा जगत ने आज इतनी तरक्की कर ली है कि अब सर्जरी अंतिम स्टेज में ही की जाती है. पहले जिन रोगों का इलाज सर्जरी से किया जाता था, उन्हें अब दवाइयों व नयी तकनीकों से किया जा रहा है. सर्जरी की जरूरत पड़ती भी है, तो माइनर सर्जरी करके रोग का समाधान ढूंढा जा रहा है. वर्तमान में कई ऐसे नये उपचार शुरू हुए हैं, जिनकी मदद से बिना सर्जरी के कुछ हृदय रोगों का उपचार संभव है.
बटन डिवाइस
पहले दिल में छेद हो जाने पर इलाज में काफी परेशानी होती थी. क्योंकि यह दिल के अंदर लोअर चैंबर की वाल पर होता है. छेद बड़ा हो, तो दिल सही तरीके से आॅक्सीजन युक्त ब्लड की सप्लाइ शरीर तक नहीं कर पाता. कई बार तो यह आॅक्सीजन युक्त ब्लड को वापस फेफड़ों में पहुंचा देता है. इसे साइंटिफिक भाषा में वेंट्रीक्यूलर सेप्टल डिफेक्ट कहते हैं. इस रोग में व्यक्ति ठीक से सांस नहीं ले पाता है और धड़कन भी अचानक बढ़ जाती है. यह समस्या नवजात में ज्यादा होती है. इसके लिए सर्जरी एकमात्र विकल्प था. अब इसका इलाज बिना सर्जरी भी संभव है. इस नयी तकनीक में शर्ट के बटन जितनी डिवाइस को पैर की नस में कैथेटर ट्यूब डाल कर दिल तक पहुंचाया जाता है और छेद को बंद कर दिया जाता है.
फायदे : इस प्रक्रिया में मात्र एक घंटे का ही समय लगता है. रिकवरी भी सप्ताह भर में हो जाती है. आॅपरेशन के बाद मरीज को 48 घंटे चिकित्सकों की निगरानी में रख कर अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है. तीन माह तक मरीज को ब्लड थिनर दवाइयों का सेवन जरूर कराया जाता है, ताकि दिल पर ज्यादा भार न पड़े. इस प्रक्रिया के बाद दर्द भी महसूस नहीं होता. प्राइवेट अस्पताल में एक लाख रुपये तक खर्च आ जाता है, जबकि सरकारी में कम खर्च में होता है.
क्रॉनिक टोटल ओकुलुशन
हृदय की नलियों में रुकावट आने से हृदय ठीक से कार्य नहीं कर पाता. इसके लिए बाइपास सर्जरी की जाती है. इसमें छाती में दस इंच का कट लगा कर ब्लॉक हुई नसों के लिए ग्राफ्ट की मदद से बाइपास बनाया जाता है. अब क्रॉनिक टोटल ओकुलुशन तकनीक के आ जाने से इस जटिल प्रक्रिया से बचा जा सकता है. इस तकनीक में कलाई के पास छोटा कट लगा कर रक्त नलियों के माध्यम से एक तार हृदय के ब्लॉकेज तक पहुंचाया जाता है. तार के अंतिम छोर पर एक बैलून होता है. इससे ब्लॉकेज खोल दिया जाता है. इसके बाद उस स्थान पर स्टेंट डाल दिया जाता है. स्टेंट धातु का बना छल्ला होता है, जो दोबारा ब्लॉकेज होने से रोकता है.
फायदे : ओपन सर्जरी नहीं करनी पड़ती है. उपचार होने पर रिकवरी दो-तीन सप्ताह में हो जाती है. मरीज को अस्पताल से छुट्टी दो-तीन दिन में मिल जाती है. इलाज में दो लाख तक खर्च आता है.
नयी तकनीक से आसान हुआ उपचार
पहले हृदय रोग के उपचार को काफी जटिल
माना जाता था. नयी तकनीक ने हृदय रोग के उपचार को पहले से आसान बना दिया है. हाल में आयी कई तकनीकों के प्रयोग से उपचार तो
कम समय में होता ही है, रिकवरी भी जल्दी
हो जाती है. ओपन सर्जरी के मुकाबले खर्च
भी कम आता है.
छाती का हर दर्द हृदय रोग नहीं
यह सही है कि समय पर हृदय रोग का उपचार हो जाने से मरीज का जीवन बचाया जा सकता है. पर हृदय रोग को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां हैं. थोड़ा-सा छाती में दर्द हुआ नहीं की लोग इसे हृदय रोग समझ कर हॉस्पिटल का चक्कर लगाने लगते हैं. डॉक्टर बता भी दें कि यह हृदय रोग नहीं है, तब भी वे कई डॉक्टरों के पास जाते हैं और इसे कंफर्म करने के लिए तरह-तरह की जांच कराते हैं. इससे समय और पैसा दोनों बरबाद होता है.
क्या हैं इसके अन्य कारण
छाती दर्द का सबसे बड़ा कारण छाती की अंदरूनी दीवारों में सूजन होना है. फेफड़े की ऊपरी सतह पर स्थित झिल्ली में सूजन आने से छाती की अंदरूनी दीवार में स्थित सूजी हुई सतह में सांस लेते वक्त रगड़ खाती है, तो असहनीय दर्द होता है. मेडिकल भाषा में इसे प्ल्यूराइटिस कहते हैं. यह छाती में पानी इकट्ठा होने का शुरुआती संकेत है. प्ल्यूराइटिस ज्यादातर टीबी के इन्फेक्शन से होता है. लोग दर्द के लिए दर्द निवारक गोलियों का सेवन करते रहते हैं और सही जांच व इलाज के अभाव में रोग गंभीर हो जाता है. टीबी के अलावा निमोनिया से भी यह हो सकता है. ऐसे में थोरेसिक या चेस्ट सर्जन से परामर्श लें.
छाती में मवाद
निमोनिया या अन्य फेफड़े के इन्फेक्शन के अनियंत्रित होने पर फेफड़े के चारों ओर पानी या मवाद इकट्ठा हो जाता है. इसके उपचार के लिए महीनों तक एंटीबायोटिक दी जाती है, पर असर नहीं हो पाता है. थोरेसिक सर्जन आॅपरेशन के जरिये सफाई करते हैं, तब समस्या दूर होती है.
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस
आजकल फिजिकल एक्टिविटी कम होती जा रही है. लोग पैदल चलना भी पसंद नहीं करते हैं. टेलीविजन व कंप्यूटर के सामने अधिक समय तक बैठते हैं.
इससे गरदन व छाती के ऊपरी हिस्से की हड्डियों पर कुप्रभाव पड़ता है. इससे इस हिस्से में जानेवाली नसों पर दबाव पड़ने लगता है, जिसके फलस्वरूप छाती, गरदन और हाथ में दर्द होने लगता है. इसके लिए किसी थोरेसिक या चेस्ट सर्जन से सलाह लें.
पसलियों की कमजोरी
आजकल अकसर नवयुवक व नवयुवतियोंं को छाती दर्द की शिकायत करती है. यह दर्द सामने की ओर ज्यादा होता है. यह दर्द पसलियों का होता है जो छींक या खांसी आने पर और बढ़ जाता है. पसलियों के ऊपर झटका लगने पर तेज दर्द होता है. यह ‘कोस्टो कौंड्रायटिस’ रोग है. जो लोग दूध नहीं पीते हैं, उन्हें यह रोग होता है. विटामिन डी की कमी से भी पसलियों की बीमारी व छाती दर्द होता है.
अगर आप प्रोटीन युक्त संतुलित भोजन व विटामिन से भरपूर सलाद (न्यूनतम तीन सौ ग्राम प्रतिदिन) व फल (300 ग्राम रोजाना) और आधा लीटर बिना मलाई वाला दूध का सेवन प्रतिदिन करते हैं, तो पसलियों की इस बीमारी व छाती दर्द से कोसों दूर रहेंगे. कुछ लोगों को ठंडे खाद्य पदार्थों, जैसे- कढ़ी, रायता, आइसक्रीम व दही-बड़े के सेवन करने से छाती दर्द उभर आता है. इसका कारण छाती की मांसपेशियों की ठंडी चीजों के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता है. ऐसे लोगों को चाहिए कि लगातार कई दिनों तक अत्यधिक ठंडे भोजन के सेवन से बचें.
कैसे समझें कि हार्ट अटैक है, कब होता है हार्ट अटैक
अगर आप 40 साल के हैं और वजन अधिक है, डायबिटीज, बीपी के शिकार हैं, धूम्रपान या तंबाकू का सेवन करते हैं, तेज चलते या सीढ़ी चढ़ते या उतरते समय छाती में बायीं तरफ दर्द या हल्का भारीपन होता हो, थोड़ा व्यायाम करने पर सांस फूलने लगती हो, हृदय रोग होने से इनकार नहीं किया जा सकता है. खास बात यह है कि आराम करने पर दर्द गायब हो जाता है. दिल का दर्द चलते वक्त बायें हाथ, बायीं गरदन व बायें जबड़े में भी उभरता है. इन लक्षणों के दिखने पर हृदय रोग विशेषज्ञ से मिल कर उचित जांच कराएं.
कब नहीं होता है हार्ट अटैक
अगर आपकी उम्र 40 से कम है व वजन सीमा के अंदर है, डायबिटीज और बीपी नहीं है, धू्म्रपान, मदिरापन व तंबाकू का सेवन नहीं करते, तो छाती दर्द का हृदय रोग से संबंध होने की आशंका कम होती है. अगर छाती का दर्द विशेष कर दायीं तरफ है और सांस लेने या छींकने-खांसने पर छाती दर्द उभरता है, तो हृदय रोग की आशंका सौ में पांच फीसदी होती है. अगर गरिष्ठ, मिर्चयुक्त मसालेदार खाने के बाद ही छाती में दर्द उभरता है, तो हृदय रोग की आशंका कम होती है. डॉक्टर से सलाह लेकर संबंधित समस्या का उपचार कराएं.
हृदय के अंदर चार वाल्व होते हैं, जिन्हें मिटरल, ट्रीक्यूस्पिड, एओर्टिक और प्लमोनरी वाल्व कहते हैं. ये खून के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं. सबसे ज्यादा समस्या एओर्टिक वाल्व में आती है क्योंकि यह वाल्व रक्त को एक दिशा में प्रवाहित करता है. कई बार समस्या जन्मजात होती है, तो कई बार वाल्व में कैल्शियम जम जाने से वाल्व सिकुड़ने लगते हैं. परिणामस्वरूप वाल्व ठीक से कार्य नहीं कर पाते हैं. इस बीमारी को एओर्टिक स्टेनोसिस कहते हैं. इसके ट्रीटमेंट के लिए ओपन हार्ट सर्जरी की जाती थी, जिसमें मरीज को बाइपास पंप पर रखा जाता था और तब सर्जरी की जाती थी. यह काफी तकलीफदेह थी. रिकवरी में भी तीन से चार माह का समय लगता था. इन्फेक्शन का खतरा ज्यादा रहता था. लेकिन नयी तकनीक से वाल्व बदलने में मात्र दो घंटे का समय लगता है. यह तकनीक है ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व रिप्लेसमेंट.
प्रक्रिया : सबसे पहले मरीज की जांच कर यह पता लगाते हैं कि हृदय में मौजूद वाल्व काम कर सकती है या फिर आॅर्टिफिसियल वाल्व लगानी पड़ेगी. ईलाज के दौरान मरीज को एक हल्का-सा कट लगाया जाता है. यह कट पैर या छाती में लगाया जा सकता है. यदि वाल्व को रिपेयर करना है, तो सक्शन ट्यूब की मदद से बैलून को वाल्व तक पैर में कट लगाकर भेजा जाता है. वाल्व में बैलून को खोल दिया जाता है, जिससे वाल्व में जमा कैल्शियम हट जाता है. यदि वाल्व पूरा खराब होता है, तो छाती में हल्का कट लगा कर आर्टिफिसियल वाल्व प्रत्यारोपित किया जाता है. इस तकनीक से ट्रीटमेंट करने में मात्र दो घंटे का समय लगता है. मरीज को 48 घंटे के बाद घर भेज दिया जाता है. एक माह के अंदर मरीज पूरी तरह से नॉर्मल हो जाता है. इस तकनीक से ट्रीटमेंट फिलहाल प्राइवेट अस्पतालों में ही किया जा रहा है जहां खर्च सात-नौ लाख आता है.
आजकल बायो स्टेंट को चिकित्सक काफी तरजीह दे रहे हैं. दरअसल, धमनियों में कोलेस्ट्रॉल जमने से वह ब्लॉक हो जाती हैं. कई बार धमनियां सिकुड़ जाती हैं, जिससे रक्त संचार ठीक से नहीं हो पाता. समस्या के बढ़ने पर मरीज को दिल का दौरा पड़ना, धड़कन बढ़ने जैसी समस्याएं भी बढ़ने लगती हैं. धमनियों को खोलने के लिए इनमें स्टेंट डाला जाता है. आजकल बॉयोएब्जॉर्बेबल स्टेंट सबसे इस्तेमाल किये जा रहे हैं. ये आम स्टेंट के मुकाबले बेहतर हैं.
नॉर्मल स्टेंट स्टेनलेस स्टील के होते हैं और ये ताउम्र धमनियों में ही रहते हैं. कई बार इसके साइड इफेक्ट भी होते हैं. स्टेंट लगाने के बाद मरीज को ब्लड थिनर दवाइयों का सेवन करना पड़ता है. लेकिन बॉयोएब्जॉर्बेबल स्टेंट प्लास्टिक धातु के बने होते हैं और यह दो से ढाई साल के अंदर अपने आप घुल कर समाप्त हो जाते हैं. शुरुआत में मरीज को ब्लड थिनर दवाइयों का सेवन जरूर करना पड़ता है. लेकिन दो साल के बाद दवाइयां छोड़ दी जाती हैं. स्टेंट की कीमत ढाई से चार लाख रुपये के बीच है.
दवाइयां भी हो गयी हैं एडवांस
अभी मार्केट में कई दवाइयां इतनी एडवांस हैं कि इनके रेगुलर इस्तेमाल से हृदय रोग का उपचार आसानी से किया जा सकता है. हालांकि इसके लिए समय पर रोग का पता चलना जरूरी है. दूसरा, जीवनशैली और खान-पान ठीक रख कर भी दिल को तंदुरुस्त रखा जा सकता है. बदलती जीवनशैली और गलत खान-पान 60 फीसदी हृदय रोगों की जड़ है. रोज योग करने से भी काफी लाभ होता है.
बातचीत व आलेख : कुलदीप तोमर
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