एक खत

Updated at : 30 Sep 2016 7:42 AM (IST)
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एक खत

मां, मेरा यह खत पाकर शायद आपको अजीब लगे कि जो डेली फ़ोन पर बातें करती है, व्हाट्सएप्प पर मैसेज भेजती है, वह बेटी आज खत लिख रही है.मां! मुझे भी अजीब लग रहा है, परंतु मुझे लगा कि अपनी जकड़ी भावनाओं को, अपनी आत्मा को, अपनी ज़िन्दगी को खोलने के लिए, दूर रहकर भी […]

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मां, मेरा यह खत पाकर शायद आपको अजीब लगे कि जो डेली फ़ोन पर बातें करती है, व्हाट्सएप्प पर मैसेज भेजती है, वह बेटी आज खत लिख रही है.मां! मुझे भी अजीब लग रहा है, परंतु मुझे लगा कि अपनी जकड़ी भावनाओं को, अपनी आत्मा को, अपनी ज़िन्दगी को खोलने के लिए, दूर रहकर भी आपके और करीब आने के लिए मेरी अंतरात्मा को कुछ गुफ्तगूं करने की ज़रूरत है. और मेरे लिए एक कलम और कागज़ से बड़ा सहारा और भला क्या हो सकता है.

सादे पन्ने पर मुझे अपनी भावनाओं को उतारने में जो सुकून मिल रहा है, वह चौबीसों घंटे हाथ में मोबाइल रहने पर या व्हाट्सएप्प और फेसबुक से नहीं मिलता. ज़िन्दगी और पराधीन-सी लगने लगती है.

मां, मैं अपनी दुनिया में, अपने घर-परिवार में बहुत व्यस्त हूं, खुश हूं. संतुष्ट हूं. पर आप बहुत याद आती हैं. मुझे घर के छोटे-बड़े बच्चों के बचपन में मेरा बचपन, मेरे नखरे, मेरा किचकिचाना, मेरा रूठना सब याद आता है. बड़ी थाली में खाना, आपसे छिपाकर अपना खाना दूसरी थाली में डालना, डाइनिंग टेबुल पर साग और हरी सब्जियों को देखकर भौंह सिकोड़ना सब याद आता है. मां, मैं बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हूं, बहुत सलीके से घर रखती हूं …शायद. पर पापा की हर बार तारीफ़ करने की आदत ने मुझे बिगाड़ दिया है. मैं यहां भी हर पल उम्मीद करती हूं, शायद इस बार कोई तारीफ़ करे. डाइनिंग टेबुल पर वेराइटी बना कर रखती हूं. सभी अच्छे से खाते हैं. खाते वक़्त बहुत सारी बातें होती हैं, पर खाना कैसा बना है, यह बताना कोई ज़रूरी नहीं समझता. शायद जिह्वा से होते हुए स्वाद और उसकी याद दोनों पेट में चली जाती है.

हां, मनपसंद खाना न रहने पर बच्चे-बड़े सब शिकायत ज़रूर करते हैं. हर समय बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, पर उन बातों में मेरी छोटी-सी जगह भी नहीं होती. सभी गुस्सा कर सकते हैं, चिड़चिड़ा सकते हैं और काम करने के बाद थक भी जाते हैं. पर मां आपकी परवरिश ने तो मुझे थकना सिखाया ही नहीं. मुझे भी गुस्सा आता है, पर जब आपने कभी गुस्सा करके कोई काम करना नहीं छोड़ा तो मैं कैसे? मेरे अकेलेपन में, मेरे रूठने पर, मेरे खामोश रहने पर, मेरे पास कोई नहीं होता. हां गैजेट्स बहुत हैं, मगर अपने नहीं लगते. तब मां आप बहुत याद आती हैं. पहले आपका हर समय टोकना या लगातार प्रश्न करना जितना खटकता था, आज तरस जाती हूं कि कोई मुझसे, मेरे बारे में प्रश्न करे.

मां, मुझे पता है आपके आंसू इस खत में लिखे मेरे अक्षरों को नरम कर रहे हैं, मगर मेरी इच्छा आपको रुलाना नहीं है.

बस कुछ पल आपसे अपनी बातें करनी है, जिसे मैं और किसी से नहीं कर सकती. क्योंकि मुझसे “मैं” सुनने के लिए घर में किसी के पास वक़्त नहीं होता, न ही कोई कभी इसकी ज़रूरत समझता है. वक़्त तो सिर्फ एक मां के पास होता है, अपने बच्चों के लिए और उसकी भावनाओं को समझने के लिए और उसके लिखे एक खत को पढ़ने के लिए. और वह भी एक बार नहीं… बार-बार.

आपकी प्यारी बेटी,

सारिका

इ-मेल : bhushan.sarika@yahoo.com

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