स्कारलेट फीवर तो नहीं

Updated at : 11 Aug 2016 8:41 AM (IST)
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स्कारलेट फीवर तो नहीं

तेज गरमी और उसके बाद बारिश से मौसम में बदलाव आया है. इससे संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ गया है. इम्युनिटी कमजोर होने से इनकी चपेट में सबसे अधिक बच्चे आते हैं. मिजिल्स और स्कारलेट फीवर ऐसे ही रोग हैं, जिनके कई लक्षण भी एक जैसे हैं. हमारे एक्सपर्ट दे रहे हैं खास जानकारी, ताकि […]

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तेज गरमी और उसके बाद बारिश से मौसम में बदलाव आया है. इससे संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ गया है. इम्युनिटी कमजोर होने से इनकी चपेट में सबसे अधिक बच्चे आते हैं. मिजिल्स और स्कारलेट फीवर ऐसे ही रोग हैं, जिनके कई लक्षण भी एक जैसे हैं. हमारे एक्सपर्ट दे रहे हैं खास जानकारी, ताकि आप रखें अपने बच्चों का ख्याल.
बदलते मौसम में बच्चों को बुखार के साथ शरीर में दाने निकलना या रैशेज होना काफी आम बात है. ये लक्षण स्कारलेट फीवर, मिजिल्स (खसरा), रुबेला, टायफाइड, स्टेफिलोकोकल इत्यादि के हो सकते हैं. वैसे तो इस मौसम में कई रोगों के होने का खतरा होता है, लेकिन मिजिल्स और स्कारलेट फीवर का खतरा अधिक है. दोनों के लक्षण लगभग समान होते हैं, जिससे इन्हें पहचानना मुश्किल होता है. ये अलग रोग हैं और इनका इलाज भी अलग होता है.
स्कारलेट फीवर : यह ग्रुप ए स्ट्रेप्टोकोकस बैक्टीरिया के रेस्पायरेट्री ट्रैक्ट के ऊपरी हिस्से में इन्फेक्शन के कारण होता है. यह इन्फेक्शन टॉक्सिन बनने के कारण होता है. आम तौर पर इसमें गले के इन्फेक्शन के बाद त्वचा में भी इन्फेक्शन होता है. इस रोग का संक्रमण प्राय: भीड़वाली जगहों रोगी के संपर्क में आने से होता है. संक्रमण स्पर्श से भी होस कता है. यह रोग मुख्य रूप से पांच से 15 वर्ष के बच्चों में होता है. दो वर्ष से कम और 15 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों में यह बीमारी नहीं होती है, क्योंकि इनमें रोग के खिलाफ एंटी बॉडीज बन जाती हैं.
इलाज और बचाव : इस रोग के होने पर तुरंत एंटीबायोटिक पेनिसिलीन या एमॉक्सीसिलीन और केव्यूलिनिक एसिड शुरू किया जाता है. इसका इलाज 10 दिनों तक चलता है. जहां पर डायग्नोसिस में परेशानी आती है, वहां स्ट्रेप्टोकोकस के लिए टेस्ट कराया जाता है. रोग से बचाव ही सबसे बेहतर उपाय है. अत: बच्चों को खाने से पहले साबुन या सेनिटाइजर से हाथ धोने की आदत डलवाएं. रोगी के प्रयोग किये तौलिये का प्रयोग नहीं करना चाहिए. इससे दूसरे बच्चों में भी इन्फेक्शन हो सकता है. रोगी को भीड़-भाड़वाली जगहों से दूर रखना चाहिए. 10 दिनों की एंटीबायोटिक ले चुके मरीज को बुखार उतरने के 24 घंटे के बाद ही घर से बाहर निकलना चाहिए.
मिजिल्स : यह मिजिल्स वायरस के इन्फेक्शन से होता है. इसमें तेज बुखार, सर्दी-खांसी, आंखें लाल होना
(कन्जंक्टिवाइटिस)आदि लक्षण दिख सकते हैं. इन्फेक्शन के चौथे दिन से दाने निकलने शुरू होते हैं. दानों के आने के बाद बुखार और बढ़ जाता है. पहले चार दिनों में मुंह के अंदर कॉप्लिक स्पॉट्स दिखते हैं, जो मिजिल्स की खासियत है. दाने फोरहेड एवं कान के पीछे से शुरू होते हैं और फिर गरदन पर फैलने शुरू हो जाते हैं. उसके बाद दो दिनों के अंदर ही ये दाने पूरे शरीर पर फैल जाते हैं. शुरू में दाने लाल और अलग-अलग निकलते हैं. जल्द ही ये आपस में मिल कर बड़े-बड़े लाल धब्बे जैसे दिखने लगते हैं. पांचवें दिन से बुखार कम होने लगता है. छह-सात दिन के बाद दाने गायब होने लगते हैं. इस रोग में खांसी 10-12 दिनों तक रह सकती है. लिंफ नोड भी बढ़ जाता है.
इंप्रॉपर मिजिल्स इन्फेक्शन : पैसिव एंटी बॉडी रिसीव करनेवालों में ऐसा इन्फेक्शन होता है. यह समस्या तब होती है, जब छह महीने से कम के शिशु को कभी रक्त चढ़ाया गया हो. हल्के बुखार के साथ एक या दो दिनों के लिए मिजिल्स के हल्के दाने निकलते हैं. खसरे का टीका लगने के बाद भी ऐसे लक्षण उत्पन्न होते हैं. इलाज सपोर्टिव और सिंप्टोमेटिक तरीके से होता है. यानी लक्षणों का इलाज किया जाता है. बचाव के लिए एमएमआर वैक्सीन दिया जाता है.
रोगों का है यह मौसम
वैक्सीन लेने के बाद भी हो सकता है इन्फेक्शन
मिजिल्स और स्कारलेट फीवर दोनों के लक्षण एक जैसे होने के कारण इन्हें पहचानना मुश्किल होता है. अलग रोग होने के कारण इनका उपचार भी अलग तरीके से होता है. हालांकि सबसे अच्छा उपाय बचाव ही है. स्कारलेट फीवर से बचने के लिए सफाई जरूरी है. मिजिल्स से बचने के लिए टीका लगवाना जरूरी है.
वैक्सीन लेने के बाद रोग नहीं होता है, लेकिन कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है. खास कर यह कोल्ड चेन टूटने से होता है. वैक्सीन में जीवित हानिरहित वायरस होते हैं. इन्हें जीवित रखने के लिए लगातार ठंडा रखना पड़ता है. इसे ही कोल्ड चेन मेंटेन करना कहते हैं. बिजली कटने या अन्य कारणों से कोल्ड चेन मेंटेन नहीं हो पाता है, तो वैक्सीन बेकार हो जाता है.
इसे देने या नहीं देने से कोई फर्क नहीं पड़ता है. इस हालत में बच्चे के संक्रमित होने पर उसे रोग हो सकता है. कभी-कभी वैक्सीन देने के तुरंत बाद भी रोग के कुछ लक्षण दिख सकते हैं क्योंकि वैक्सीन में मिजिल्स के ही हानिरहित वायरस होते हैं. मगर यह गंभीर नहीं होता है. इसके हल्के लक्षण ही दिखते हैं. इसे एटिपिकल मिजिल्स कहा जाता है.
दोबारा नहीं होता है मिजिल्स
मिजिल्स वायरस के कारण होता है. यदि यह एक बार होकर ठीक हो जाये, तो यह दोबारा नहीं होता है, क्योंकि शरीर इसके खिलाफ इम्युनिटी बना लेता है. अगर दोबारा वायरस शरीर में प्रवेश करता है, तो शरीर ही संक्रमण को रोक देता है. वैक्सीन भी इसी सिद्धांत पर काम करते हैं.
जिस रोग के लिए वैक्सीन बनाया जाता है, उस रोग के वायरस में परिवर्तन करके उसे हानिरहित बना दिया जाता है, ताकि उसके कारण रोग के लक्षण उत्पन्न न हों. इसे शरीर में डालते ही, शरीर इसके खिलाफ एंटीबॉडी तैयार कर लेता है. इस कारण जब बाद में रोग का असल वायरस शरीर को संक्रमित करता है, तो उसके खिलाफ एंटीबॉडी होने के कारण उसका कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है.
हो सकता है सेकेंड्री इन्फेक्शन
मिजिल्स होने के बाद रोगी की इम्युनिटी काफी कमजोर हो जाती है. इसके कारण सेकेंड्री इन्फेक्शन भी हो सकता है. इसके कारण लूज मोशन, निमोनिया और मेनिंजाइटिस का भी खतरा हो सकता है.
इन रोगों के होने पर इनका इलाज भी शुरू करना जरूरी होता है. निमोनिया होने पर मरीज को एंटीबायोटिक दिया जाता है. बुखार होने पर पारासिटामॉल का सिरप दिया जाता है. विटामिन ए की खुराक भी दी जाती है. यदि तेज खांसी हो, या बच्चे को दौरा पड़े, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.
होमियोपैथिक दवाओं से उपचार
स्कारलेट फीवर का उपचार
बेलाडोना : उच्च ज्वर रहे, शरीर का ऊपरी हिस्सा जैसे-सिर गरम एवं पैर बहुत ठंडे हों, प्यास बिल्कुल नहीं लग रही हो, शरीर पर हल्के दाने हों, जीभ एवं गला बिल्कुल स्ट्रॉबेरी जैसा लाल हो, तब 200 शक्ति की दवा चार बूंद चार-चार घंटे पर लें.
एलेंथस ग्लेंडुलोसा : शरीर पर अनियमित चकत्ते ज्वर के साथ हों, हल्का दबाव देने पर दाने गायब हो जाते हों और कुछ भी निगलने पर काफी कष्ट होता हो, तब 200 शक्ति की दवा चार बूंद सुबह एवं रात में लें.
रस टक्स : शरीर पर छोटे-छोटे लाल दाने खुजली के साथ हों. बेचैनी हो तथा हाथ-पैर हमेशा खींचते रहने का मन करे, शरीर पर पानी लगते ही काफी सिहरन महसूस हो, तब 200 शक्ति की दवा चार-चार बूंद छह-छह घंटे पर लें.
मिजिल्स में उपचार
जेलसेमियम : लाल छोटे-छोटे दाने हो गये हों, ऐसा लगे, जैसे मच्छरों ने काटा है. दाने पानीवाले नहीं होंगे, देखने पर ऐसा लगे कि बच्चा लगातार रो कर आया है. आंखें आंसुओं से डबडबायी हों, लेकिन पूछने पर पता चलता है कि बच्चा रोया नहीं है. ऐसी अवस्था में जेलसेमियम 200 शक्ति की दवा चार-चार घंटे के अंतराल पर दें.
कालीम्यूर : बुखार एवं सूखी खांसी हो, बहुत खांसने के बाद थोड़ा-सा खखार निकलता हो और उससे आराम महसूस हो, तो ऐसी अवस्था में कालीम्यूर 200 शक्ति की दवा बहुत कारगर है.
फेरमफॉस : बुखार, सर्दी एवं खांसी की प्रारंभिक अवस्था में यह दवा काफी प्रभावकारी है. शरीर को ठंडे पानी से पोछने पर आराम महसूस होता है, तब इस दवा को ग्रहण करना चाहिए.
पल्साटिला : वैसे मरीज, जो मिजिल्स से कुछ दिन से ग्रसित हों यानी रोग जब कुछ पुराना हो गया हो एवं गरम कमरे में भी जब ठंड लगे और प्यास बिल्कुल न लगती हो एवं गरमी एकदम से न बरदाश्त हो, तो ऐसी अवस्था में पल्साटिला की 200 शक्ति की दवा बहुत लाभदायक होती है.
(होमियोपैथी विशेषज्ञ डॉ एस चंद्रा से बातचीत)
इन रोगों का भी है खतरा
-रोजोला इन्फेंटम : यह रोग एचएचवीबी वायरस के कारण होता है और एक वर्ष तक के शिशु में होता है. इस रोग में इन्फेक्शन होने के तीन दिनों के बाद तेज बुखार के बाद खसरा के जैसे दाने निकलते हैं, जो गुलाबी और काफी छोटे-छोटे होते हैं. मुख्यत: शरीर पर दाने आने के साथ बुखार बिल्कुल खत्म हो जाता है. एक से तीन दिनों में दाने भी गायब हो जाते हैं. आंखें लाल हो सकती हैं और खांसी-सर्दी नहीं होती है. इसका इलाज भी लक्षणों के आधार पर किया जाता है.
-एरिद्मा इन्फेक्टियोसम : यह पीएआरवीओ वायरस बी19 के कारण होता है. यह मुख्यत: पांच-15 वर्ष के बच्चों में फरवरी-अप्रैल में हो सकता है. यह रोग हल्के बुखार, सर्दी एवं सिरदर्द के साथ शुरू होता है और दूसरे दिन चेहरा लाल हो जाता है. हाथ-पैर की तरफ लालीपन फैलता है और केंद्र में रंग हल्का होता जाता है. दाने जालीदार लगते हैं. हथेली व तलवे पर दाने नहीं निकलते. दाने दो-तीन दिनों में ठीक हो जाते हैं, पर तीन सप्ताह तक आते-जाते रह सकते हैं.
– रुबेला : यह रुबेला वायरस के कारण होता है. हल्का बुखार, गले में खराश, आंखों में लालीपन एवं दर्द, थकान एवं भूख मिट जाने के साथ शुरू होता है. एक-दो दिनों में चेहरे एवं गरदन पर छोटे-छोटे, गुलाबी दाने होते हैं, जो उभरे हुए नहीं होते हैं. बाद में ये आपस में मिल जाते हैं और फिर नीचे की ओर फैलते हैं. मुंह में छोटे-गुलाबी दाने निकलते हैं. तीन दिनों के अंदर चेहरे से ही दाने गायब होने लगते हैं और त्वचा के बिना छूटे ही समस्या खत्म हो जाती है.
कावासाकी डिजीज
यह एक इम्यून रिएक्शन है. कोई भी कीटाणु सीधे तौर पर इस बीमारी मे नहीं पाया गया है. इसमें पांच दिनों तक बुखार, आंखों एवं जीभ में लालीपन, शरीर एवं हाथों में हल्के लाल दाने, होंठ फटे हुए, हथेलियां लाल हो जाती हैं. दूसरे सप्ताह में नाखूनों के बगल में त्वचा छूटने से इसकी पहचान आसान हो जाती है. यह छोटे बच्चों (दो-पांच साल) में मुख्य रूप से होता है और दूसरे सप्ताह में प्लेटलेट काउंट काफी बढ़ जाता है.
स्कारलेट फीवर के लक्षण
इस रोग में गले में खराश, 101 डिग्री फॉरेनहाइट या ज्यादा बुखार हो सकता है. बुखार लगने के दिन या एक-दो दिन बाद दाने गरदन से शुरू होकर शरीर एवं हाथ-पैरों में फैलते हैं. ये दाने आपस में काफी ज्यादा मिले हुए होते हैं. लाल रंग के फैले हुए रैशेज भी उत्पन्न हो जाते हैं. त्वचा का रंग चमकीला लाल हो जाता है, जिसका रंग दबाने से साफ हो जाता है. इसमें दाने काफी महीन होते हैं और छूने पर सेंडपेपर की तरह खुरदरे लगते हैं.
इस रोग में चेहरे पर दाने नहीं आते हैं पर गाल लाल दिखते हैं. इसमें मुंह के चारों तरफ लालीपन नहीं आता है. मुंह के अंदर फैरिंक्स में भी दाने दिखते हैं और जीभ पर सफेद दाने आ जाते हैं, जो दो-तीन दिनों के बाद ऊपरी सतह के हटने के बाद लाल हो जाते हैं और स्ट्रॉबेरी की तरह दिखते हैं. मरीज को सिर में दर्द, उलटियां इत्यादि होती हैं.
तीन-चार दिनों के बाद दाने हल्के होने लगते हैं. चेहरे और नाखूनों के बगल की त्वचा छूटने लगती है. हथेलियों एवं तलवे में भी त्वचा छूटने लगती है. अत: उपरोक्त लक्षणों के कारण इस रोग को पहचानना मुश्किल नहीं है. हां मिजेल्स के लक्षणों से मेल खाने के कारण कभी-कभी इसे पहचानने में परेशानी हो सकती है. मगर इससे संबंधित अन्य जांचाें की मदद से इसे पहचाना जा सकता है.
मिजिल्स और स्कारलेट फीवर में अंतर
मिजिल्स
– छोटे-छोटे दाने निकलने की शुरुआत कान से होती है और तब पूरे शरीर पर फैलता है.
– दाने निकलने के बाद बुखार आता है.
– चार-पांच दिन में कान के पास से त्वचा ठीक होने लगती है और बुखार भी कम हो जाता है.
– यह वायरस के कारण होता है.
– लाल त्वचा दबाने पर असर नहीं होता.
स्कारलेट फीवर
– पहले बुखार आता है, िफर एक-दो िदनों में रैशेज पड़ जाते हैं. शरीर लाल हो जाता है.
– जबकि स्कारलेट फीवर उल्टा होता है.
– स्कारलेट फीवर में बुखार रोग छूटने तक लगातार बना रहता है.
– यह बैक्टीरियल इन्फेक्शन के कारण
होता है.
– लाल त्वचा दबाने पर त्वचा सफेद होजाती है.
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