झारखंड में ''लालखंड'' के लिए लड़ाई

Updated at : 02 Jul 2016 6:18 PM (IST)
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झारखंड में ''लालखंड'' के लिए लड़ाई

-हरिवंश- झारखंड आंदोलन को आपसी फूट और अविश्वास से जो तत्काल चोट पहुंची है, उससे लाभ उठाने के लिए नक्सलवादी एकजुट हो रहे हैं. मध्य बिहार में अपनी जड़ें जमाने के बाद राजनीतिक और भौगोलिक कारणों से अतिवादी छोटानागपुर के जंगलों में बसे आदिवासियों के गांवों को सबसे मुफीद जगह मानते हैं. इन गांवों में […]

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-हरिवंश-

झारखंड आंदोलन को आपसी फूट और अविश्वास से जो तत्काल चोट पहुंची है, उससे लाभ उठाने के लिए नक्सलवादी एकजुट हो रहे हैं. मध्य बिहार में अपनी जड़ें जमाने के बाद राजनीतिक और भौगोलिक कारणों से अतिवादी छोटानागपुर के जंगलों में बसे आदिवासियों के गांवों को सबसे मुफीद जगह मानते हैं. इन गांवों में झारखंड मुक्ति मोरचा के प्रभाव को कमजोर किये बिना, किसी संगठन के लिए जगह बना पाना कठिन है. इसलिए झामुमो के कार्यकर्ताओं पर निरंतर प्रहार हो रहे हैं. इन सुदूर इलाकों को घूमने के बाद नक्सलवादियों के नये पैंतरे के संबंध में हरिवंश की रिपोर्ट.

मध्य बिहार से नक्सलवाद की लपटें अब छोटानापुर (झारखंड)के गांवों में पहुंच रही हैं. जहानाबाद के एक सीपीआइ (एमएल) के कार्यकर्ता का तर्क था कि ‘मध्य बिहार फतह करने के बाद अब भौगोलिक और उपयुक्त राजनीतिक माहौल की दृष्टि से छोटानागपुर के जंगल और शोषित आदिवासी, फूस के ढेर की मानिंद हैं, जहां बस आग लगाने की जरूरत है.’ इस अवसर को पहचान कर ही नक्सलवादी तत्व छोटानागपुर में सुनियोजित ढंग से कार्य कर रहे हैं.

फिलहाल मध्य बिहार में जहानाबाद, गया, औरंगाबाद और पटना के गंवई क्षेत्रों में नक्सलवादियों का जोर और राज है. कुछ महीनों पूर्व यह बात केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय से बिहार आयी अधिकारियों की टुकड़ी भी कबूल कर गयी. इन इलाकों के बड़े सामंत और किसान अब अपनी सुरक्षा के लिए नक्सलवादी संगठनों की शरण में जा रहे हैं. जातिवादी सेनाओं के संरक्षण में असुरक्षित भविष्य देख कर इस क्षेत्र के बड़े किसान विभिन्न नक्सली संगठनों को महसूल अदा करने लगे हैं. कुछ नक्सलवादी संगठन अपराधियों के गिरोह में तब्दील हो गये हैं. पुलिस-प्रशासन और बड़े सामंत इनसे खौफ खाते हैं. सूरज ढलते ही इस इलाके में लोग घरों से बाहर पांव रखने से अमूमन कतराते हैं. बिहार सरकार के शोर और इस इलाके की समस्याओं के कथित समाधानों के बाद भी नक्सलवादियों की तादाद बहुत बढ़ी है. केंद्र सरकार से बिहार आयी टीम ने भी नक्सलवादियों के बढ़ते वर्चस्व पर गौर किया है. नक्सली तत्व मध्य बिहार में अपना वर्चस्व कायम करने के बाद अब पुन: पूरी तैयारी के साथ दक्षिण बिहार की ओर उन्मुख हुए हैं और ‘लालखंड’ बनाने के लिए नारे लगा रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि दक्षिण बिहार में नक्सलवादी आंदोलन के शुरुआती दौर में भी बंगाल से नक्सलियों का आना-जाना था. मेरी टेलर की गिरफ्तारी सिंहभूम में ही हुई थी. मशहूर नक्सली नेता सत्यनारायण सिंह का कार्यक्षेत्र यही अंचल था. हजारीबाग और पलामू जिलों में प्रमोद मिश्र और संजय दुसाध के नेतृत्व में नक्सली आंदोलन की नींव पुख्ता हुई थी. संजय दुसाध तो इस इलाके में किंवदंती बन गया. लेकिन प्रशासन और शोषक सामंतों ने जुल्म और आतंक के बल नक्सली आंदोलन के पहले उफान को दबा दिया. इस आंदोलन की आग ठंडा होते ही छोटानागपुर के आदिवासी गांवों में मशहूर नेता शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोरचा का जोर बढ़ा. श्री सोरेन आदिवासियों के एकमात्र जननेता बन गये.

हाल में नये सिरे से झारखंड राज्य की स्थापना के लिए पुन: आंदोलन आरंभ हुआ. इस आंदोलन को चलाने के लिए गठित झारखंड समन्वय समिति और झारखंड मुक्ति मोरचा (झामुमो) के बीच बुनियादी कारणों से दूरी बढ़ती गयी. झारखंड समन्वय समिति में सीपीआइ (एमएल) के नेता संतोष राणा काफी उत्साह से शिरकत कर रहे हैं. बंगाल के झाड़ग्राम (झारखंड सीमा से जुड़े) में श्री राणा का गुट काफी ताकतवर और उग्र है. उधर विनोद मिश्र गुट (माकपा एमएल) और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) भी हजारीबाग और छोटानागपुर के जंगलों में अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं. इन जंगलों में इनकी उपस्थिति का एहसास प्रशासन को कुछ महीनों पूर्व तब हुआ, जब हजारीबाग के चतरा जंगल में एक पुलिस टुकड़ी पर ही नक्सलवादियों ने धावा बोल दिया. इस मुठभेड़ में कुछ पुलिसवाले मारे गये, कुछ हताहत हुए, बाकी भाग निकले. हजारीबाग के जंगल के ठेकेदारों से नक्सली माहवारी राशि वसूल रहे हैं और अपना आधार पुख्ता बना रहे हैं.

एक विश्वसनीय सूत्र के अनुसार अतिवादी तत्वों ने झारखंड आंदोलन के बिखरने के मसले पर नये सिरे से विचार-विमर्श किया है. संतोष राणा के गुट ने भी अलग बैठक कर झारखंड आंदोलन की कमियों पर गौर किया. नक्सवादियों की हाल में हुई बैठकों में विचार मंथन के बाद ही इस क्षेत्र में आतंक कायम करने और सत्ता से जूझने की नयी रणनीति तय की गयी. चूंकि झारखंड मुक्ति मोरचा का इस इलाके में अभी भी वर्चस्व है, अत: अपना वजूद सिद्ध करने के प्रयास में उनसे मुठभेड़ भी नकारी नहीं गयी. खासतौर से धनबाद-गिरिडीह हजारीबाग और संथाल परगना में झामुमो की जड़ें बड़ी गहरी हैं. झामुमो के एक नेता का कहना है कि इस क्षेत्र के गांवों में नक्सली 100-150 के जत्थे में एकजुट हो कर हथियारों से लैस हो कर आते हैं. मुंह बांधे हुए, ठीक उसी तरह, जैसे मध्य बिहार के जिलों में सामूहिक नरसंहार के समय लोग चेहरे ढंक कर हमला करते रहे हैं.

इन तत्वों ने अब झारखंड को ‘लालखंड’ बनाने की घोषणा की है. झामुमो के प्रवक्ताओं का कहना है कि फिलहाल ये नक्सली संगठन झारखंड मुक्ति मोरचा के कार्यकर्ताओं को बीन-बीन कर मार रहे हैं. पुलिस और प्रशासन इन हत्याओं के मूक दर्शक बने हुए हैं. इन तत्वों की दीर्घकालीन योजना है कि छोटानागपुर से खनिज पदार्थों का बाहर जाना ठप्प कर दिया जाये. अगर ये लोग इस उद्देश्य में आंशिक रूप से भी सफल होते हैं, तो देश की चरमराती अर्थव्यवस्था पर इसके घातक प्रभाव पड़ेंगे.

वर्ष ‘87 के अंत में मनियाडीह (धनबाद) के कट्टर झामुमो कार्यकर्ता जीतन बेसरा को घनी आबादीवाले गांव से उग्रवादी पकड़ ले गये. काफी दिनों तक खोजबीन के बाद भी श्री बेसरा की कोई सूचना नहीं मिली. झारखंड मुक्ति मोरचा के शिबू सोरेन और सूरज मंडल ने मनियाडीह में आम सभा आयोजित कर उग्रवादियों के खिलाफ एक व्यापक जन आंदोलन शुरू करने की बात की. काफी खोज-खबर के बाद भी झामुमो कार्यकर्ता जीतन बेसरा का पता नहीं लगा पाये. पुलिस ने अपनी कार्यशैली के तहत 12 अभियुक्तों के खिलाफ प्राथमिक दर्ज की. उन्हें गिरफ्तार भी किया. लेकिन 90 दिनों के अंदर पुलिस द्वारा आरोप पत्र न दे पाने के कारण अभियुक्तों को अदालत ने जमानत पर हाल ही में छोड़ दिया. हाल में एक सड़ी लाश की कुछ हड्डियां एक गठरी में पायी गयीं, लोगों को आशंका है कि जीतन बेसरा के शव का ही यह अवशेष है. इसकी जांच हो रही है.

जीतन बेसरा की तरह ही मोचरो गांव के गोपाल कपरदार का हश्र हुआ. इस वर्ष जनवरी में झारखंड मुक्ति मोरचा के सक्रिय कार्यकर्ता गोपाल को कुछ लोग घर से बुला कर ले गये. 3 जनवरी को उसकी लाश गांव के एक तालाब में पायी गयी. वस्तुत: मोचरो हरिजन-आदिवासी बहुल गांव है. यहां के भोले-भाले अशिक्षित आदिवासियों-हरिजनों का शोषण प्रशासन द्वारा समर्थित तत्व करते रहे हैं. कुछ ताकतवर लोगों ने तो इनकी जमीन भी हथिया ली है. गोपाल कपरदार झामुमो के मंच से इन गरीब मजलूमों की लड़ाई लड़ते थे. झामुमो के लोगों की आशंका है कि गोपाल कपरदार की हत्या इसीलिए की गयी, ताकि इस इलाके में झामुमो की जड़ पर प्रहार किया जा सके. गोपाल कपरदार पहले शिक्षक थे. अनपढ़ आदिवासियों को जाग्रत करने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी थी. उनको रास्ते से हटाये बिना इस गांव के आसपास कोई वैकल्पिक नेतृत्व विकसित होने में कठिनाई थी. अत: उन्हें अड़चन मान कर साफ कर दिया गया.

धनबाद के टुंडी और पीरटांड के इलाके में काफी पहले से ही ‘लालखंड’ की आवाज गूंजती रही है. ‘लालखंड’ के लिए अब नये सिरे से जो आंदोलन आरंभ हुआ है, उसे कुछ लोग एके राय और विनोद बिहारी महतो गुट से भी जोड़ते हैं. श्री राय के साथ इस आंदोलन को जोड़ने का यह आधार है कि अविभाजित झारखंड मुक्ति मोरचा के स्वर्णिम दिनों में ही उन्होंने ‘लालखंड’ नामक पुस्तक लिखी थी, जिसमें उन्होंने शोषण मुक्त झारखंड की कल्पना की है.

लेकिन हकीकत तो यह है कि झामुमो के विभाजन के पूर्व से ही नक्सलवादी इन गांवों में पैठ चुके थे. दीवालों को नारों से रंगने और अति वामपंथी-प्रतिबंधित साहित्य बांटने का काम पहले भी बंगाल से आये नक्सली आदिवासी गांवों में करते थे. सुदूर गांवों में प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये गये और शोषण व सामंती व्यवस्था से लड़ने के लिए हथियार बंद वर्ग संघर्ष का आवाहन किया गया. यह नक्सलवादी आंदोलन का आरंभिक दौर था.

उसके बाद नक्सली संगठनों की टूट और सामयिक निराशा ने इन्हें कमजोर बना दिया. प्रशासन द्वारा उपेक्षा, शोषकों का बढ़ता दबदबा देख का फिर निराश आदिवासियों को जाग्रत करने के लिए विभिन्न नक्सली संगठन पिछले कुछ वर्षों के दौरान पूरे जोर-शोर से इधर फैल गये. धनबाद के ही पारसबनी गांव में इंद्रनारायण चौधरी और मनियाडीह में झारखंड मुक्ति मोरचा के जीतन बेसरा की हत्या, वर्ष ‘88 के आरंभ में कोलाहीर गांव में झामुमो नेता मोतीलाल टुडू पर जानलेवा हमला जैसी घटनाओं के पीछे उग्रवादियों के ही हाथ बताये जाते हैं. नेभारी जंगल में केंदु पत्तों से लदे ट्रक को जलाने और ठेकेदारों से पैसे वसूलने की वारदात के पीछे भी नक्सली ही हैं.

इसी क्रम में 26 फरवरी ‘88 को शिबू सोरेन के ऊपर बम फेंके गये. चूंकि शिबू सोरेन अपने लड़ाकू व्यक्तित्व के कारण इस इलाके में जोर-जुल्म के खिलाफ बगावत के प्रतीक और महाजनों के शोषण के खिलाफ हुए सफल आंदोलन के अगुआ बन गये, अत: उन पर हुए बम प्रहार से धनबाद-हजारीबाग-गिरिडीह और संथाल परगना के आदिवासी गांवों में सनसनी फैल गयी थी. श्री सोरेन ने इन घटनाओं के लिए सार्वजनिक रूप से एके राय और विनोद बिहारी महतो के लोगों पर आरोप लगाया. उनका कहना है कि ‘इन लोगों के इशारे पर ही लालखंड स्थापित करने के लिए आतंकवादी कार्रवाइयां चल रही हैं. भोले-भाले झारखंडी आदिवासी युवकों को आतंकित किया जा रहा है.’

एके राय व विनोद बिहारी महतो गुट के लोग इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं और स्वीकार करते है कि हिंसा की राजनीति में उनके संगठन की कोई दिलचस्पी नहीं है. फिर भी दोनों गुट के लोग यह कबूलते हैं कि टूंडी और पीरटांड में नक्सली सक्रिय हैं. आखिर ये तत्व झामुमो के कार्यकर्ताओं को ही क्यों निशाना बना रहे हैं? इस संबंध में शिबू सोरेन का कहना है कि ‘झारखंड मुक्ति मोरचा’ की जड़ें काफी फैली हैं. हमारा रिश्ता अपने लोगों से परंपरागत-सांस्कृतिक आधारों पर विकसित हुआ है. परंपरागत आदिवासी संस्कृति को बनाये रखते हुए अपनी अस्मिता की लंबी लड़ाई हम लड़ना चाहते हैं, लेकिन कथित नक्सली हमारी परंपरा और संस्कृति के घोर विरोधी हैं. ये लोग विदेशी आदर्शों को ही इधर प्रतिष्ठित करना चाहते हैं और जनता पर विदेशी मूल्य थोपने के लिए उतावले हैं, अत: अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति में हमें ही सबसे बड़ी अड़चन मानते हैं. इस कारण हमारे लोगों की चुन-चुन कर हत्याएं की जा रही हैं.’

झामुमो के जुझारू विधायक सूरज मंडल का कहना है कि ‘झारखंड में बाहरी तत्वों के आक्रमण से हम अपने ही घर में अनजाने बनते जा रहे हैं. अगर हमारी यही स्थिति रही, तो हम मॉरिशस की तरह बन जायेंगे. कांग्रेस सरकार आदिवासियों के कल्याण के लिए बात करती है, लेकिन केंद्र में आज तक एक भी कैबिनेट स्तर का मंत्री आदिवासी नहीं बनाया गया. बिहार के उच्च न्यायालय में आज तक एक भी आदिवासी न्यायाधीश नहीं है. हम कैसे मानें कि सरकार हमारे साथ भेदभाव नहीं कर रही है! हम अपनी संस्कृति गंवा कर और शोषित हो कर देश की मुख्यधारा से समरस होने को तैयार नहीं हैं.’ श्री मंडल के अनुसार पिछले छह माह से झामुमो के नेता नयी तैयारी के साथ आदिवासी गांवों में घूम-घूम कर इन मुद्दों पर आदिवासियों का मन टटोलते रहे हैं और उन्हें एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं. ‘हमारी स्थिति को पुख्ता होते देख हमारे शत्रु उग्र हो गये हैं और हमारे लोगों की हत्याएं की जा रही हैं. हमारे समर्थक गांवों में बाहरी तत्व आ कर धमकियां दे रहे हैं.’

इस इलाके में हो रही इन हत्याओं के बाद घटनास्थल पर नक्सलवाद के समर्थक साहित्य व परचे बिखरने की घटनाएं भी सामने आयी हैं. गौरतलब तथ्य यह है कि मध्य बिहार में हुए नरसंहारों के बाद भी मुंह छुपा कर आये आतंकवादियों के गिरोह ऐसे परचे घटनास्थल पर बिखरे गये. प्राप्त सूचनाओं के अनुसार इस इलाके में जो अतिवादी गुट हैं, उनमें एमसीसी, सीपीआइ (एमएल) के विनोद मिश्र और संतोष राणा गुट, क्रांतिकारी किसान समिति और झामुमो (मार्क्सवादी) हैं. हाल में ‘धन कटनी’ के समय यहां मजदूरों के बीच क्रांतिकारी किसान कमिटी की ओर से परचे बिखेरे गये. उनमें उल्लेख था कि सही आजादी, मुक्ति, इज्जत, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार पाने के लिए देश के कोने-कोने में चल रहे लाल प्रतिरोध संघर्ष तथा मुक्ति की लड़ाई के साथ हमें अपनी लड़ाई को जोड़ना होगा. इन परचों में यह भी उल्लेख था कि संगठित सशस्त्र शक्ति और हथियार बंद वर्ग संघर्ष ही मुक्ति का एकमात्र रास्ता और विकल्प है.

पीरटांड इलाके की बदरो पंचायत के मुखिया एवं उसके बेटे की हत्या का संबंध भी भूमिगत नक्सली आंदोलन से ही जोड़ा गया था. नक्सली तत्वों की रणनीति पर निगाह रखनेवाले एक अधिकारी के अनुसार पारसनाथ पहाड़, इससे जुड़े पश्चिमी टुंडी एवं पीरटांड के सघन पहाड़ एवं जंगल ही नक्सलियों के मुख्य आश्रयस्थल हैं. उधर चाईबासा-चक्रधरपुर, जमशेदपुर और घाटशिला के जंगल व पहाड़ी गांवों में ऐसे तत्व छुपते हैं. हजारीबाग का जंगल तो इनका मुख्य अड्डा ही बन गया है. झामुमो का आरोप है कि एसएन चौधरी भूमिगत हो कर आदिवासियों के बीच काम कर रहे हैं और मार्क्सवादी समन्वय समिति के लोगों से उनका संपर्क है. टुंडी-पोखरिया में शिबू सोरेन का आश्रम है. परमा में भी श्री सोरेन ने अपना केंद्र खोला है. इन आश्रमों के माध्यम से श्री सोरेन ने आदिवासियों के कायाकल्प के लिए अनेक कार्यक्रम आरंभ किये. वह सरकारी कामकाज के तौर-तरीके से सख्त खफा हैं.

विकास योजनाएं जिस मंद गति से चल रही हैं, उससे आदिवासियों को लाभ नहीं मिलता है. सरकार के उच्च अधिकारियों के पास आवेदन पहुंचने में एक माह, मंजूरी में दो माह और काम होने में चार माह लग जाते हैं. जब तक परियोजना पूरी होती है, तब तक उसका स्वरूप भ्रष्ट हो जाता है, यह कहना है श्री सोरेन का. सरकारी उपेक्षा से निरपेक्ष हो कर श्री सोरेन, तालाब खोदने के लिए खुद आदिवासियों को ले कर इस इलाके के गांवों में सक्रिय हो गये. खुद कुदाल उठा ली. और हजारों आदिवासियों के साथ मिल कर पानी ‘स्टोर’ करने के लिए अनेक तालाब बनवाये. सामूहिक रूप से हल-बैल का प्रबंध हुआ. गेहूं से पहले इस इलाके में लोग अपरिचित थे. अब गेहूं की अच्छी पैदावार होती है. ‘महाजनों को शिकस्त देने के बाद आर्थिक रूप से आदिवासियों को स्वावलंबी बनाने की कोशिश झामुमो की दूसरी बड़ी उपलब्धि थी’, यह मानना है शिबू सोरेन का. ‘अत: हमारे केंद्र आदिवासियों की आम गतिविधियों के केंद्र बन गये. लेकिन बाहरी तत्वों के शोषण और सीमित रोजगार के कारण हमारा आर्थिक उत्थान नहीं हो पा रहा है.‘शिबू सोरेन का आरोप है कि ‘लालखंड’ के समर्थक अब मेरे आश्रमों पर अंधेरे में पत्थर-रोड़े फेंकते हैं. ये लोग मानते हैं कि झामुमो के ये केंद्र जनहित के कार्यों के जीवंत केंद्र बन गये हैं, इसलिए बिना इन्हें कमजोर किये ‘लालखंड’ के लिए आधार तैयार नहीं हो सकता. इसी रणनीति के तहत झामुमो के कार्यकर्ताओं पर ‘लालखंड’ द्वारा हमले किये जा रहे हैं.’

इन आदिवासी गांवों में नक्सलवादी तत्वों के फैलाव और योजना से छोटानागपुर का प्रशासन और पटना के लोग बिलकुल अनजान हैं. स्वाभाविक है कि जब स्थानीय प्रशासन ही इन घटनाओं से वाकिफ नहीं है, तो पटना में बैठे लोग इनके प्रति क्यों चिंतित होंगे. मध्य बिहार में भी नक्सलवादियों ने जब पांव पसारना आरंभ किया था, तो पटना के शासक अंधेरे में ही रहे. जब बड़ी घटनाएं होने लगीं, तो शासक चौंकन्ने हुए. जब खुद पटना में नक्सवादियों के बढ़ते प्रभाव को सरकार रोक पाने में विफल है, तो छोटानागपुर में बिहार सरकार बहुत कारगर हो पायेगी, मुमकिन नहीं लगता.

प्रशासन और सामंती राजनेताओं के शोषक चरित्र से नक्सली तत्वों का काम इस इलाके में आसान हो गया है. प्रशासन इधर कैसे काम कर रहा है, इसका एक बड़ा मौजूं उदाहरण है. गिरिडीह में तेनुघाट ताप विद्युत परियोजना के निर्माण के लिए आदिवासियों को बहला-फुसला कर गांव खाली करा लिये गये. प्रत्येक विस्थापित परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने और घर देने का आश्वासन दिया गया. खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे वहां आये थे. सार्वजनिक समारोह में अपने हाथों से उन्होंने छह आदिवासी विस्थापित को नियुक्ति पत्र भी दिया. तत्कालीन ऊर्जा मंत्री रामाश्रय प्रसाद सिंह ने उस समारोह में घोषणा की कि आप लोग एक हाथ से घर खाली करें, दूसरे हाथ से नियुक्ति पत्र लें. लेकिन आज तक मुख्यमंत्री ने हाथों से जिन लोगों को नियुक्ति पत्र दिये हैं, उन्हें न तो नौकरी मिली है और न ही उजाड़े गये लोगों को घर. वहां जो भी ठेके के काम हैं, वे स्थानीय प्रशासन के बड़े अधिकारियों के रिश्तेदारों को मिल रहे हैं. अब घर से उजाड़े गये यहां के आदिवासियों को न तो प्रशासन पर भरोसा है और न ही दलाल नेताओं पर.

धनबाद के गांवों में अभी सबसे अधिक उग्रवादियों का जोर है, लेकिन यहां का प्रशासन उतना ही जनविरोधी है. इसकी सबसे ताजातरीन नजीर हैं, धनबाद के मैथन थाने में अवर निरीक्षक पद पर तैनात रत्नेश्वर ठाकुर. मैथन थाना बंगाल की सीमा से जुड़ा है. बंगाल के रूप नारायणपुर बाजार (बर्दवान जिला) में घुस कर नशे की हालत में फसाद करने का उन पर गंभीर आरोप है. श्री ठाकुर के नजदीकी लोग वहां ठेकेदारी भी करते हैं. श्री ठाकुर पर पलामू के एक थाने में भी एक 12 वर्ष के आदिवासी नौकर को पीट कर मार डालने का आरोप हैं. इनके अतिरक्ति उन पर दर्जनों गंभीर आरोप हैं. बिहार के डीजी द्वारा उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की अनुशंसा की गयी, स्थानांतरण का भी आदेश हुआ, लेकिन धनबाद के आरक्षी अधीक्षक जगतबंधु महापात्र ने श्री ठाकुर का स्थानांतरण न करने की सिफारिश की. प्रशासन द्वारा आतंक कायम करने के ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं. पटना के आला अफसर इन घटनाओं से अनजान हैं. शोषण और आतंक कायम करनेवाले अधिकारियों को संरक्षण देने से जन आक्रोश उबलता है. पूरे छोटानागपुर में कमोबेश प्रशासन में ऐसे ही संवेदनहीन और शोषक तत्व काबिज हैं, जिनके कारण सरकार और प्रशासन से आदिवासी लगातार दूर होते जा रहे हैं.

किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल की आदिवासियों के बीच पैठ नहीं हैं. कांग्रेस का आदिवासियों के प्रति सोच तो बल्किुल अस्पष्ट और भ्रामक है. कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व हमेशा छोटानागपुर के आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने और उनकी विशिष्ट संस्कृतिक-विकास का पक्षधर रहा, लेकिन राज्य स्तर का नेतृत्व आदिवासियों को कांग्रेस के करीब लानेवाले कांग्रेसी नेताओं की ही जड़ें खोदता रहा. जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तिगत हस्तक्षेप और रुचि के कारण आदिवासियों के ‘मारंग गोमके’ जयपाल सिंह कांग्रेस में शरीक हो गये. लेकिन राज्यस्तर के कांग्रेसी नेताओं के कारण कांग्रेस अपने किये गये वादों को ही भूल गयी. इससे आदिवासियों में कांग्रेस के प्रति अविश्वास पैदा हुआ और अपने नेतृत्व के विरोध में एक उग्र तबका उभरा. बाद में तो कांग्रेस स्थानीय स्तर पर शोषकों की पर्याय बन गयी. रांची-लोहरदगा में जो साहू-महतो शोषक लोग हैं, आज वे ही कांग्रेस के आधार हैं. सांसद शिवप्रसाद साहू छोटानागपुर में कांग्रेस के हित रक्षक हैं. वर्ग विभेद के कारण यह वर्ग आदिवासियों का हित रक्षक हो ही नहीं सकता. आदिवासियों के शोषण से ही इस वर्ग की थैली भरती है, तो भला ये लोग कैसे उन्हें अपने चंगुल से मुक्त करेंगे. वर्ग हित का यह परस्पर विरोधी तथ्य कांग्रेस नेतृत्व अनदेखा कर रहा है. इससे कांग्रेस से जुड़े आदिवासियों बिदक रहे हैं, इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है, कोलेबीरा के विलियम लुगुन मुंडा का. विलियम को ज्ञानरजंन कांग्रेस में लाये थे, अब वह हताश हो कर पिछले कुछ वर्षों से लाल झारखंड के लिए चल रहे आंदोलन में शरीक हो गये हैं. विलियम पहले सेना में थे.

जयपाल सिंह की तरह ही कृष्णबल्लभ सहाय का भी हश्र हुआ. सख्त प्रशासक और आदिवासियों के कल्याण के लिए उठाये गये कदमों के कारण आज भी वह बिहार में याद किये जाते हैं. श्री सहाय की बढ़ती लोकप्रियता और छवि को ध्वस्त करने का काम खुद कांग्रेसियों ने ही किया. आदिवासियों को दूसरी बार कांग्रेस से विरक्ति हुई.

आपातकाल के आसपास फिर आदिवासी गोलबंद और उग्र हुए. श्रीमती इंदिरा गांधी ने खुद पहल कर ज्ञारंजन के माध्यम से शिबू सोरेन से संपर्क किया. तब तक श्री सोरेन आदिवासियों के दूसरे ‘मारंग गोमके’ बन चुके थे. चुनाव में कांग्रेस एवं झामुमो के बीच तालमेल हुआ. आदिवासियों के कल्याण के लिए अलग योजनाएं बनायी गयीं. रांची, हजारीबाग में आदिवासियों के प्रशिक्षिण शिविर आयोजित किये गये, जिसमें श्रीमती गांधी, डी संजीवैया, के.आर. नारायण, डॉ. हेनरी आस्टिन आदि शामिल हुए. 1200 महिला आदिवासियों को रोजगार के लिए प्रशिक्षित किया गया. अब ये प्रशिक्षित महिलाएं दर-दर भटक रही हैं. सुदूर बहरागोड़ा जैसे गांवों में कांग्रेस के शिविर लगे. जिन हलकों में कांग्रेस का जोर नहीं था, वहां से भी कांग्रेस चुनाव जीती. इस एकता से आदिवासी मुख्यधारा में तेजी से शरीक हो रहे थे. लेकिन कांग्रेस के शोषक तत्वों को भला आदिवासियों से समरसता कहां सुहाती? षडयंत्र करके इस एकता के मुख्य सेतु ज्ञानरंजन का ही पत्ता कांग्रेसियों ने साफ करा दिया.

सदान आदिवासी या गैरआदिवासी जो भी आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बना कर राजनीति में उभरता है, उसे राज्य कांग्रेस नेतृत्व ही पंगु बना देता है. आदिवासियों के साथ यह तीसरा बड़ा धोखा था. इससे मध्यम सोच के आदिवासी भी निराश हो गये. अतिवादी और उग्रवादी तत्वों का बोलबाला बढ़ा. इससे न महज कांग्रेस की ही साख खत्म हुई, बल्कि राष्ट्रीय एकता के पक्षधर आदिवासी नेताओं के प्रति भी अनास्थ उपजी. इससे छोटानागपुर इलाके में उग्रवादी तत्वों को पसरने का अच्छा मौका मिला.

आदिवासियों के सांस्कृतिक प्रतीकों को राष्ट्रीय महत्व मिलना अभी बाकी है. ज्ञानरंजन और उनके सहयोगी आदिवासी नेताओं ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि ‘डोंबोरीबुरू पहाड़ी को तत्काल सांस्कृतिक व राष्ट्रीय स्वाधीनता की लड़ाई का स्मारक बनाया जाये. यहीं से बिरसा मुंडा ने अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह आरंभ किया था. यह जगह पहाड़ पर है. ‘रोप वे’ बना कर वहां आने-जाने का रास्ता आरंभ किया जाये. इससे आदिवासियों के गौरव को प्रतिष्ठा मिलेगी और वे राष्ट्रीय भावनाओं से जुड़ेंगे. इससे उग्रवादी तबकों की पकड़ कमजोर बनेगी. साथ-साथ ही छोटानागपुर में आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक शोषण करनेवाले सामंती नेताओं का सफाया किया जाये, तभी कांग्रेस यहां फले-फूलेगी और उग्रवादी तत्व कमजोर होंगे.

छोटानागपुर में नक्सलवादियों की बढ़ती गतिविधियों का सबसे ताजा सबूत है, बिहार सशस्त्र पुलिस पर 4 अप्रैल को नक्सलवादियों द्वारा किया गया सशस्त्र हमला. पलामू में पंकी गांव के नजदीक भवराडाह में नक्सलवादियों ने बिहार सशस्त्र पुलिस की एक टुकड़ी पर हमला बोल दिया. दोनों तरफ से गोलियां चलीं, जिसमें तकरीबन 13 पुलिसकर्मी घायल हुए और एक पुलिस का जवान मारा गया. इस हमले में नक्सलवादी सशस्त्र को पछाड़ कर एक स्टेनगन, पांच राइफल और भारी मात्रा में कारतूस ले भागे. तत्काल बिहार के पुलिस महानिदेशक जे.एम. कुरैशी घटनास्थल पर गये. उल्लेखनीय है कि कुछ महीनों पूर्व मध्य बिहार के विष्णुगंज में भी नक्सलवादियों ने पुलिस थाने पर गंभीर आक्रमण किया था.

पुलिस को आशंका है कि माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर के लोगों ने यह हमला किया है. खबर है कि पलामू के ही हुटई गांव में भी बिहार सशस्त्र पुलिस पर नक्सलवादियों ने हमला कर 12 राइफल छीन लिये हैं. हाल ही में यह खबर आयी थी कि आंध्रप्रदेश के पीपुल्स वार ग्रुप और बिहार के माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर के बीच विलय हो गया है. इस विलय के बाद नक्सलवादियों की गतिविधियों के संबंध में 27 मार्च को बिहार सरकार के गृह आयुक्त आर.एन. दास ने संवाददाताओं से कहा कि नक्लवादी इलाकों में स्थिति नियंत्रण में है.

वस्तुत: बिहार आरंभ से ही नक्सलवादी आंदोलन का गढ़ रहा है. उत्तर बिहार में मुसहरी, चंपारण, भोजपुर और कैमूर पहाड़ी की तलहटी में बसे गांवों में पहले से ही नक्सलवादी और अतिवादी तत्व सक्रिय रहे हैं. अब मध्य बिहार में इनकी जड़ें जम चुकी हैं. अदूरदर्शी नौकरशाहों-राजनेताओं के कारण ही ये दक्षिण बिहार में भी फैल रहे हैं. झारखंड को ‘लालखंड’ में बदलने के लिए नक्सवादियों द्वारा शुरू किया गया आंदोलन झारखंडियों में अतिवादियों के बढ़ते प्रभुत्व का ही द्योतक है.

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