बधाई ज्ञानी जैल सिंह को

Updated at : 01 Jul 2016 5:17 PM (IST)
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बधाई ज्ञानी जैल सिंह को

-हरिवंश- जिस समाज को बदलना है, वहां से मानसिक गरीबी पहले मिटानी होगी. लोगों का खोया आत्मविश्वास लौटाना होगा और यह कार्य जनता से सीधे संवाद बना कर ही संभव है. संवाद जनता से, जनता की भाषा में राजनेताओं के उबाऊ भाषणों में नयी चीज नहीं होती. पिछले कुछ वर्षों से देश में जो माहौल […]

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-हरिवंश-

जिस समाज को बदलना है, वहां से मानसिक गरीबी पहले मिटानी होगी. लोगों का खोया आत्मविश्वास लौटाना होगा और यह कार्य जनता से सीधे संवाद बना कर ही संभव है. संवाद जनता से, जनता की भाषा में राजनेताओं के उबाऊ भाषणों में नयी चीज नहीं होती. पिछले कुछ वर्षों से देश में जो माहौल है, उसमें सत्ता व विरोध पक्ष सबके नेता बासी हो गये हैं. लोग भी उनकी बातों-भाषणों से तटस्थ. बुनियादी प्रश्नों से अब उनका कोई वास्ता नहीं. ऐसे माहौल में पंजाब विश्वविद्यालय के 37वें दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति ने हिंदी के संबंध में जो बुनियादी बातें कही, उनसे 21वीं शताब्दी के भारत की एक नयी-अलग व विशिष्ट पहचान बन सकती है.

राष्ट्रपति ने लीक से हट कर, लिखा-लिखाया भाषण छोड़ कर, जो कुछ कहा, वह इस बात का प्रमाण है कि देश के सर्वोच्च शिखर पर आज भी आम जनता का आदमी आसीन है. 2 फीसदी अंगरेजी जाननेवालों का नुमाइंदा नहीं. अब तो बड़ी-बड़ी कंपनियों के अधिकारी मंत्री हैं, विशिष्ट पब्लिक स्कूलों में शिक्षित लोग नीति-निर्माता हैं, उन्हें इन बुनियादी सवालों से क्या लेना-देना. अंगरेजीदां लोग सिर्फ हिंदी पर ही टीका-टिप्पणी नहीं करते, वस्तुत: सभी भाषाएं सगी बहने हैं और अंगरेजी उनकी सौत. महाराष्ट्र में दादा को अंगरेजी नहीं आती, उस पर अंगरेजीदां मराठी टिप्पणी करता है, उसी तरह बिहार, उत्तरप्रदेश में किसी को अंगरेजी नहीं आती, तो स्थानीय अंगरेजीदां लोग उन पर फब्तियां कसते हैं. आंध्र में अंजैया को अंगरेजी नहीं आती थी, तो अंगरेजी भक्त तेलुगुवासी हंसी उड़ाते थे.

गृह मंत्री के रूप में ज्ञानी जैल सिंह के कार्यों पर अंगरेजी प्रेस चुप रहता था, लेकिन उनकी पंजाबी भाषा व हिंदी का मजाक बनाया जाता था.आत्मगौरव, चेतना एवं परिवर्तन की भूख अपनी ही भाषा से जगायी जा सकती है. भाषा के महत्व को भाषाविदों ने तो काफी पूर्व बताया था. अब समाज-विज्ञानी, अर्थशास्त्री भी इसके महत्व को आंकने लगे हैं. विकास व भाषा के बीच सीधा रिश्ता है. प्रो. गुन्नार मर्डिल (नोबेल पुरस्कार विजेता व विश्वविख्यात अर्थशास्त्री) ने अपनी मशहूर कृति ‘एशियन ड्रामा’ में कहा है कि भारत का विकास तब तक नहीं हो सकता, जब तक संसद की भाषा अंगरेजी बनी रहेगी. यानी शासक व जनता की भाषा एक हो. आर्थिक विकास की यह बुनियादी शर्त है.

यह उद्धरण किसी हिंदी पक्षधर का नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति का है, जिसने आजीवन आर्थिक विकास पर ही कार्य किया. गुन्नार मर्डिल एक नाम है, ऐसे अनेक समाज विज्ञानी हैं, जो अब इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि विकास के लिए मात्र उत्पादन के कारण ही आवश्यक नहीं हैं. जिस समाज को बदलना है, वहां से मानसिक गरीबी पहले मिटानी होगी. लोगों का खोया आत्मवश्विास लौटाना होगा और यह कार्य जनता से सीधे संवाद बना कर ही संभव है. संवाद जनता से, जनता की भाषा में.


राष्ट्रपति ने समारोह में बैठे लोगों से इस तरह की गुलामी से देश को आजाद कराने की अपील की. उन्होंने दुख प्रकट किया कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी इंजीनियरिंग व डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए अंगरेजी की पुस्तकों पर निर्भर रहना पड़ता है. राष्ट्रपति ने उन मुल्कों की चर्चा की, जो गुलामी से मुक्ति पाने के बाद भाषा के मामले में पूरी तरह आजाद हैं. वस्तुत: सच्चाई यह है कि चीन, रूस, जापान, पश्चिमी जर्मनी, यूगोस्लाविया, उत्तर कोरिया आज इसी कारण हमसे काफी आगे निकल गये हैं, क्योंकि उन्होंने भाषा का सवाल आरंभ में ही हल कर लिया था. राष्ट्रपति ने इन मुल्कों की भी तफसील से चर्चा की. वस्तुत: बीज बोने के पहले जैसे खेत को तैयार रखा जाता है, उसी मानिंद समाज में लोगों के अंदर परिवर्तन की भूख जगानी होती है. उनका दबा-कुचला स्वाभिमान जगाना होता है.

जब चेतना-जागरूकता होती है, तो वे स्वयं समता के लिए संघर्ष करते हैं. हीन भावना दूर होती है, जीवन में बेहतरी के लिए उद्यम करते हैं. भाग्य के भरोसे चीजों को नहीं छोड़ते. ऐसे माहौल में ही परिवर्तन-बदलाव होते हैं.सरकार नयी शिक्षा नीति बना रही है. हर जिले में एक ‘दून स्कूल’ खोलने का कार्यक्रम है. शिक्षा मंत्री अंगरेजी के गिरते स्तर से चिंतित हैं, उन्होंने गुहार लगायी है कि हर जिले में अंगरेजी में सही प्रशक्षिण देने के लिए संस्थान होने चाहिए. दूसरी ओर राष्ट्रपति चिंतित हैं कि भगवान राम को अंगरेजी में ‘रामा’, बुद्ध को ‘बुद्धा’ कहने की परंपरा कब तक चलेगी, क्योंकि यह सवाल महज अंगरेजी का नहीं, उससे जो कृत्रिम संस्कृति यहां पनप रही है, चिंता उसकी है. आज भारत में क्षेत्रीयता, दुराग्रह व संवेदनहीनता का वातावरण बढ़ाव पर है.

अगर भाषा की समस्या आरंभ में हल हो गयी होती, तो शायद स्थिति भिन्न होती. लोगों में संस्कृति से अविच्छिन्न संबंध है. समतावादी व धर्म निरपेक्ष भारत का जन्म भारतीय भाषाओं के विकास में ही निहित है. वस्तुत: अंगरेजों ने यहां के लोगों को अपने अधीन कर उनकी चेतना-आत्मवश्विास को कमजोर किया. इस मानसिक गरीबी से लोगों को उबारने एवं राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का काम जनभाषा द्वारा ही संभव हो सकता है.


जहां हिंदी की प्रगति की चर्चा अंगरेजी में हो, गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग ‘हिंदी के प्रगामी प्रयोग व एकरूपता’ के संबंध में सचेत न हो, उस देश में ‘राष्ट्रभाषा’ पुख्ता होगी, संदेहास्पद है. नये हुक्मरानों को भाषा से कुछ लेना-देना नहीं. उन्हें साध्य अभीष्ट है, साधन नहीं. इससे देशी भाषाओं की प्रगति को धक्का पहुंचेगा. राष्ट्रपति इस बात से चिंतित हैं कि आजादी के 37 वर्षों बाद भी अंगरेजी का दाग हमारे माथे पर नजर आता है. वस्तुत: अगर यही माहौल रहा, तो यह दाग न जाने कब तक बना रहे? फिर भी बधाई राष्ट्रपति को, जिन्होंने अंधे राजनेताओं-सुविधाभोगी बौद्धिकों का ध्यान इधर खींचा है.
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