पुलिस चाहती है घूसखोरी की आजादी

Updated at : 30 Jun 2016 1:09 PM (IST)
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पुलिस चाहती है घूसखोरी की आजादी

-हरिवंश- गांधी के समय दो पैसे का हिसाब इधर-उधर करने पर सजा पानेवाले राजनेता उसी बिहार में जिंदा हैं, जहां पुलिस ने घूस लेने, अनैतिक काम करने में खुलेआम छूट होने के लिए अल्टीमेटम दिया है.बात छोटी है, पर गंभीर है. मुंगेर (बिहार) के पुलिस अधीक्षक डीएन गौतम के खिलाफ इंस्पेक्टरों, सब-इंस्पेक्टरों आदि ने विद्रोह […]

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-हरिवंश-

गांधी के समय दो पैसे का हिसाब इधर-उधर करने पर सजा पानेवाले राजनेता उसी बिहार में जिंदा हैं, जहां पुलिस ने घूस लेने, अनैतिक काम करने में खुलेआम छूट होने के लिए अल्टीमेटम दिया है.बात छोटी है, पर गंभीर है. मुंगेर (बिहार) के पुलिस अधीक्षक डीएन गौतम के खिलाफ इंस्पेक्टरों, सब-इंस्पेक्टरों आदि ने विद्रोह कर दिया है. इन लोगों ने बिहार सरकार को अल्टीमेटम दिया है. अल्टीमेटम के अनुसार, अगर इन सबका स्थानांतरण कहीं अन्यत्र नहीं होता, तो ये सामूहिक त्यागपत्र दे देंगे. इनका कहना है कि हम वहां नहीं रहेंगे, जहां गौतम हैं.
कारण, पीर बाजार थाना के सब-इंस्पेक्टर को रंगे हाथ दस हजार रुपये घूस लेते पकड़ा गया था. हेखपुर सराय पुलिस थाने के सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ भी वहीं के हवलदार ने लिखित रूप से पुलिस अधीक्षक से शिकायत की थी. शिकायत के अनुसार, हवलदार के कम उम्र के पुत्र के साथ सब-इंस्टपेक्टर ने बलात यौनाचार किया था. इन दोनों मामलों में गौतम ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की थी. बात इतनी ही है. लेकिन कानून और व्यवस्था के एकमात्र ‘स्वघोषित संरक्षक’ पुलिस अधिकारियों का तेवर बदल गया. वे विद्रोह पर उतारू हो गये.

यह महज अनुशासनहीनता का ही मामला नहीं है. वस्तुत: यह अल्टीमेटम गौतम के खिलाफ नहीं है. यह व्यवस्था कानून को खुलेआम चुनौती है. गलत ढंग से पैसा कमाने, वहशी हो कर अपने पद का दुरुपयोग करने के अधिकार पर पाबंदी लगानेवाली प्रवृत्ति के खिलाफ सुनियोजित अभियान है. अधिकारी निरंकुश होना चाहते हैं. बिना रोक-टोक पैसा कमाना चाहते हैं. पुलिस घूस लेने, अत्याचार करने पर कोई पाबंदी नहीं चाहती. यह सार्वजनिक रूप से इन गलत कार्यों को वैधानिक बनाने की पहल है.

दोष सिर्फ पुलिस को ही क्यों? बिहार में कोई सरकारी विभाग ऐसा नहीं है, जहां निष्पक्ष कार्य होता हो. यह सर्वविदित है. नया यह है कि बिहार से ही यह मांग उठी है कि घूस लेने, पद का दुरुपयोग करने को वैधानिक मान्यता मिले. कभी श्रीमती गांधी कहा करती थीं कि भ्रष्टाचार सारी दुनिया में है और हमारे यहां भी है, इसमें चौंकने की क्या बात है? अपरोक्ष रूप से भ्रष्टाचारियों को इससे शह मिली. अब आलम यह है कि पहले यह छिप-छिपा कर होता था, अब सरकारी महकमे के लोग इसका लाइसेंस चाहते हैं. गांधी के समय दो पैसे का हिसाब इधर-उधर करने पर सजा पानेवाले राजनेता उसी बिहार में जिंदा हैं, जहां की पुलिस ने घूस लेने, अनैतिक काम करने में खुलेआम छूट देने के लिए अल्टीमेटम दिया है.

यह किसे नहीं मालूम कि ये सब-इंस्पेक्टर, जो पैसा लेते हैं, वह नीचे से ऊपर की ओर जाता है, मंत्रियों तक पहुंचता है. लेकिन, डीएन गौतम बिहार में अपनी ईमानदार छवि के लिए मशहूर हैं. उनकी ख्याति है. पिछले दो वर्षों के अंदर उनका स्थानांतरण पांच जगहों पर हुआ. पहले रोहतास (बिहार) में वे एसपी थे. वहां उन्होंने नाजायज काम करने के आरोप में कांग्रेस जिला अध्यक्ष गिरीश मिश्र के खिलाफ कार्रवाई की थी. गौतम की इन हरकतों से तंग आकर बिहार सरकार ने उन्हें केंद्र में वापस भेज दिया था. उक्त अधिकारी का स्थानांतरण कानून सम्मत व्यवस्था की बुनियाद पर चोट होगी, उसका महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि सरकार घूसखोरों को वैधानिक मान्यता प्रदान कर देगी.

फिलहाल, मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे ने गौतम को स्थानांतरित न करने की घोषणा की है. इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं. वैसे गौतम का मामला भी इसी कारण प्रकाश में आया, क्योंकि अभी तक उनका वहां से स्थानांतरण नहीं हुआ. अन्यथा बिहार का प्रबुद्ध वर्ग तो बेईमानों के सामने पहले ही घुटने टेक चुका है. इसी गौतम का स्थानातरण पांच दफे हुआ और अंतत: सरकार ने उन्हें केंद्र को वापस कर दिया था. सक्सेना, रणधीर वर्मा, राजकुमार सिंह जैसे लोग न जाने कितनी बार इधर-उधर किये गये.

प्रधानमंत्री ने हाल ही में एक अमरीकी पत्रिका से भेंट में कहा है कि हमारे यहां भ्रष्टाचार नीचे के तबके में है. हम प्रधानमंत्री की बात पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते, क्योंकि जिस माहौल-संस्कृति की वे उपज हैं, वहां लोग यही मान कर चलते हैं. अपनी मिट्टी की उन्हें जानकारी नहीं, देश के हालात से वे पूरी तरह परिचित भी नहीं हैं. भ्रष्टाचार की गंगोत्री हमेशा ऊपर से चलती है. प्रधानमंत्री को अवश्य पता होगा कि कांग्रेस (ई) के चुनाव में 200 करोड़ रुपये का प्रबंध कहां से हुआ. ये राजनेता चुनाव आयोग को, जो चुनावी खर्च बताते हैं, वह झूठ के सिवाय और है क्या.

पार्टी अधिवेशन में, साधारण आयोजनों में पानी की तरह पैसा कहां से बहता है? यह किसके श्रम की उपज है? तालुका से ले कर केंद्र तक के लाखों लोग राजनीति कर रहे हैं, ये दलाल हैं, ये कहीं श्रम नहीं करते, पर रहते हैं फाइव स्टार होटलों में. विमान से यात्राएं करते हैं, कार से नीचे कदम नहीं रखते, यह सब कैसे हो रहा है? प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारे यहां के सार्वजनिक क्षेत्र खैरात बांटनेवाले संस्थान हैं. सांसदों-मंत्रियों को खुश रखने के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों में राजनीतिक पिछलग्गुओं को अध्यक्ष, सर्वेसर्वा बनाने की परंपरा किसने डाली?

राज्यों के सार्वजनिक उपक्रमों में विधायकों के लिए रोज नये पदों का सृजन, सुविधाएं, गाडि़यों का काफिला, जितने विधायक उतने पद, इन सब का खर्च कौन वहन करेगा? खैरात बांटने की शुरुआत, तो उस पार्टी ने ही की है, जिसके वे स्वयं अध्यक्ष हैं. मुख्यमंत्रियों पर पार्टी फंड एकत्र करने की जिम्मेदारी किसने डाली? तस्करों-बेईमानों, अपराधियों को पार्टी में महत्वपूर्ण ओहदे कैसे मिले? हथियारों की खरीद-फरोख्त से ले कर आयात-निर्यात व जिले स्तर तक के ठेकों में कमीशन लेनेवाले लोगों का परिवार एक है. इनकी जड़ें गहरी फैली हैं. जिस दिन इस देश में ऊपर भ्रष्टाचार का स्रोत बंद होगा, उस दिन ही गौतम जैसे अधिकारियों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत मामूली अधिकारी नहीं करेंगे.

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