जमीन से जुड़ा चतुर राजनीतिज्ञ

Updated at : 30 Jun 2016 10:50 AM (IST)
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जमीन से जुड़ा चतुर राजनीतिज्ञ

-हरिवंश- अर्थशास्त्रियों लिए बड़ी प्रचिलत उक्ति है कि ‘सफल अर्थशास्त्री विफल अर्थ मंत्री व प्रशासक’ होते हैं, पर डॉ जगन्नाथ मिश्र के प्रसंग में यह कहावत सटीक नहीं है. अपनी चतुराई और सोची-समझी रणनीति के कारण आज भी वह बिहार की राजनीति में सबसे सशक्त नेता हैं. कर्पूरी ठाकुर के बाद विरोध पक्ष या सत्ता […]

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-हरिवंश-

अर्थशास्त्रियों लिए बड़ी प्रचिलत उक्ति है कि ‘सफल अर्थशास्त्री विफल अर्थ मंत्री व प्रशासक’ होते हैं, पर डॉ जगन्नाथ मिश्र के प्रसंग में यह कहावत सटीक नहीं है. अपनी चतुराई और सोची-समझी रणनीति के कारण आज भी वह बिहार की राजनीति में सबसे सशक्त नेता हैं. कर्पूरी ठाकुर के बाद विरोध पक्ष या सत्ता दल में वह एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिनका जनाधार व्यापक और ठोस है. इस कारण वह धैर्य से अपनी जगह टिके हुए हैं. वह अपनी शर्तों पर राजनीति करना चाहते है, उन्हें इस कारण सत्ता पाने की हड़बड़ी नहीं है.
कांग्रेस में रह कर भी वे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की विफलता और प्रशासनिक कमजोरी के मुद्दे उठा कर सरकार को खरी-खोटी सुनाते रहे हैं, कर्पूरी ठाकुर को विरोध पक्ष के नेता पद से हटाये जाने पर उन्होंने अपने ही दल के विधानसभा अध्यक्ष को भी लताड़ा. करीब पांच वर्षों तक सत्ता से बाहर रहने, आलाकमान द्वारा बिहार से बाहर भेजने की कोशिश और विरोधी कांग्रेसियों की साजिश के बावजूद डॉ जगन्नाथ मिश्र बिहार की राजनीति में हाशिये पर नहीं हैं. कांग्रेस के किसी नेता का जनाधार इतना व्यापक नहीं है कि कोई उन्हें चुनौती दे सके. बिंदेश्वरी दुबे ने कोशिश की, तो डॉ मिश्र ने पलट कर उनकी मजदूर राजनीति में ही सेंध लगा दी.

1960 में बिहार विश्वविद्यालय से एमए (अर्थशास्त्र) करने के बाद डॉ मिश्र वहीं प्रवक्ता हो गये. विश्वविद्यालय की राजनीति में उनकी रुचि थी, लेकिन वह किसी जातीय गिरोह में नहीं फंसे. उन दिनों बिहार विश्वविद्यालय उत्तर बिहार की राजनीति का मुख्य अखाड़ा था. अक्सर वहां दो जातियों के बीच उठापटक चलती रहती थी. डॉ मिश्र की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी यही है कि घोर जातिवादी राजनीति में भी, जातीय समीकरणों-खेमों से वह अलग हैं. हर जाति-वर्ग में डॉ मिश्र ने अपना पुख्ता आधार बना लिया है. 1968 में डॉ मिश्र ‘मुजफ्फरपुर कम सारण कम चंपारण ग्रेजुएट’ क्षेत्र से विधान परिषद के लिए चुने गये. तब उनकी रुचि सर्वोदय में थी. डॉ मिश्र के खिलाफ कम्युनिस्ट पार्टी के पशुपतिनाथ मेहता खड़े थे. श्री मेहता मुजफ्फरपुर के सबसे धनाढ्य जमींदार थे. डॉ मिश्र यह चुनाव जीत गये.

1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद ललितनारायण मिश्र और डॉ जगन्नाथ मिश्र दोनों इंदिरा गांधी के साथ चले गये. 1972 में पहली बार डॉ मिश्र विधायक बने. केदार पांडेय और अब्दुल गफूर के मंत्रिमंडल में डॉ मिश्र ने सहकारिता और बिजली मंत्री तथा सिंचाई मंत्री के रूप में काम किया. लोकप्रियता और मौजूदा राजनीति में सफलता के हर गुर उनमें मौजूद हैं. 1975 में डॉ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री बन गये, डॉ मिश्र की एक और खासियत है कि वह अपने समर्थकों-मददगारों के कठिन दिनों में उनकी मदद के लिए खड़े रहते हैं.

यह सही है कि बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री के रूप में डॉ मिश्र ऊपर से थोपे गये, लेकिन अपनी प्रशासनिक निपुणता के बल पर उन्होंने अपना स्वतंत्र वजूद बना लिया. जब तक ऊपर से मिलनेवाली ऊर्जा बंद होती, तब तक चतुर जगन्नाथ अपना खुद पुख्ता आधार बना चुके थे. मुख्यमंत्री के रूप में जगन्नाथ मिश्र ने अपने दोनों कार्यकालों (1975-77 और 1980-1983) का भरपूर राजनीतिक इस्तेमाल किया. संगठित, असंगठित और पिछड़े वर्गों के लोगों को लुभाने-राहत देने के अनेक काम किये व नयी योजनाएं आरंभ की. पहली बार उन्हें ‘सेलेक्शन ग्रेड’ दिया गया. डॉ मिश्र की सरकार ने चौकीदार-दफादार आयोग बनाया. 50 हजार ऐसे लोगों को आयोग की अनुशंसा के तहत ‘ग्रेड’ दिये गये ‘सेवामुक्त लाभ’ का प्रावधान तय किया गया.

सामाजिक सुरक्षा पेंशन के तहत 60 साल से ऊपर के लोगों, विधवाओं और अपंगों को पेंशन भुगतान करने की योजना आरंभ हुई. इससे साढ़े तेईस लाख लोग लाभान्वित हुए. बेरोजगारों को 50 रुपये भत्ता मिलने लगा. इससे दो लाख युवक लाभान्वित हुए. सरकारी नौकरियों और बिहार लोक सेवा आयोग में शुल्क लेने की परंपरा खत्म कर दी गयी. बेरोजगार युवकों को काम-धंधा आरंभ करने के लिए ऋण देना आरंभ किया. गरीब किसानों को 85 फीसदी तक ‘सब्सिडी’ मुहैया करायी. परिणामस्वरूप 1952-72 के बीच बिहार में अगर डेढ़ लाख ट्यूबवेल लगाये गये, तो 1974-77 के बीच 2 लाख ट्यूबवेल लगे. सरकारी कर्मचारियों के लिए 10 साल में एक प्रोन्नति और पूरे कार्यकाल में तीन प्रोन्नति अनिवार्य कर दी गयी.

तीन हजार हाईस्कूलों का सरकारीकरण किया गया. मदरसा व संस्कृत विद्यालयों के लोगों को सरकारी मुलाजिमों की तरह सुविधाएं दी. करीब 235 कॉलेजों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा स्वीकृत वेतनमान दिया. पहली बार बिहार के विश्वविद्यालय में ‘प्रोन्नति’ के नियम तय किये गये. डॉ मिश्र की सरकार ने बिहार के पांच बड़े धनाढ्य परिवारों (साहू परवता, कुरसैला स्टेट, विष्णुपुर के मोल बाबु, चंपारण के शाही परिवार, रांची के शाहदेव परिवार) की कुल संपत्ति भूमि की जांच के लिए पांच बड़े अधिकारियों का नियुक्त किया. राजस्व विभाग से बिहार के 500 लोगों की ऐसी सूची बनवायी, जिनके पास 100 से 500 एकड़ के बीच भूमि है. अब यह सूची राजस्व विभाग से गायब कर दी गयी है. इन कार्यक्रमों से डॉ मिश्र ने अपना एक व्यापक समर्थन आधार तैयार कर लिया, जो आज उनकी महत्वपूर्ण राजनीतिक थाती है.


डॉ जगन्नाथ मिश्र न कोई मौलिक चिंतक हैं और न सुधारक, लेकिन बिहार के भद्देस राजनेताओं के बीच उनकी पहचान अलग है. पूर्ववर्ती और बाद के मुख्यमंत्रियों मसलन दारोगा राय, केदार पांडेय, अब्दुल गफूर, रामसुंदर दास और बिंदेश्वरी दुबे की तुलना में डॉ मिश्र की दृष्टि और व्यवस्थागत समझ साफ है. यही उनका सफलता का मुख्य कारण है. उन्होंने आर्थिक समस्याओं पर कई चर्चित पुस्तकें भी लिखी हैं. विरोधी नेता (1977-80) के रूप में भी वह सफल रहे. सरकार के हर गोपनीय दस्तावेज उन तक पहले पहुंचते थे. तब नौकरशाही उनके शिकंजे में थी, आज भी उसे डॉ. मिश्र से खैाफ है.

बिहार में एकमात्र कर्पूरी ठाकुर ही थे, जिनके सामने जगन्नाथ मिश्र उन्नीस थे. डॉ मिश्र संघर्ष की राजनीति की देन नहीं हैं. इस कारण वह मौजूदा राजनीति का तीन-तिकड़म भी बखूबी जानते-समझते हैं. उन पर आरोप है कि तंत्र-मंत्र ज्योतिष पर उनका अखंड विश्वास है. अपने परिवार के सदस्यों को वह राजनीति से दूर ही रखते हैं, लेकिन हर काम सुनियोजित ढंग से करते हैं. उनके व्यक्तित्व पर मिथिला संस्कृति की स्पष्ट छाप है. अपने विरोधियों से भी वह फूहड़ ढंग से पेश नहीं आते.

मौजूदा राजनीति के पाखंड से डॉ मिश्र परे नहीं हैं. लेकिन बिहार में टूटते समाज से वह चिंतित हैं. मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बिहार के साथ केंद्र द्वारा किये जा रहे भेदभाव पर एक विस्फोटक भाषण भी विधानसभा में दिया था. सत्ता से डॉ मिश्र के हटाये जाने का तात्कालिक कारण वह भाषण ही बना, लेकिन इस प्रक्रिया में डॉ मिश्र ने बिहार के हमदर्द होने की छवि बना ली.
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