विश्वास प्राप्त करेंगे हेगड़े

Updated at : 24 Jun 2016 5:00 PM (IST)
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विश्वास प्राप्त करेंगे हेगड़े

-हरिवंश- कर्णाटक जनता पार्टी में राजनीतिक संकट निरंतर गहरा रहा है. अब हेगड़े भी ताल ठोंक कर मैदान में उतर आये हैं. उन्होंने 19 अप्रैल को दिल्ली में घोषणा की कि तीन मई को वह कर्णाटक जनता विधायक दल की बैठक बेंगलूर में बुलायेंगे और उस बैठक में पुन: सदस्यों का विश्वास प्राप्त करेंगे. शासक […]

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-हरिवंश-

कर्णाटक जनता पार्टी में राजनीतिक संकट निरंतर गहरा रहा है. अब हेगड़े भी ताल ठोंक कर मैदान में उतर आये हैं. उन्होंने 19 अप्रैल को दिल्ली में घोषणा की कि तीन मई को वह कर्णाटक जनता विधायक दल की बैठक बेंगलूर में बुलायेंगे और उस बैठक में पुन: सदस्यों का विश्वास प्राप्त करेंगे. शासक जनता पार्टी के विक्षुब्ध और हेगड़े समर्थक दोनों खेमे अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं. अप्रैल के तीसरे सप्ताह के दौरान बंगलूर में जपा अध्यक्ष चंद्रशेखर की त्रिदिवसीय यात्रा के अवसर पर भी इस समस्या को सुलझाने की हरसंभव कोशिश हुई, लेकिन कोई स्वीकार्य हल नहीं निकल सका.

विक्षुब्धों के नायक एच डी देवगौड़ा भी निर्णायक मुद्रा में दीखते हैं. हेगड़े विरोधी खेमे में तकरीबन 32 विधायक माने जाते हैं. हालांकि कुछ लोग विक्षुब्धों की संख्या 77 बताते है. लेकिन हेगड़े के बयान के अनुसार, ‘‘यह कहना बिल्कुल गलत है कि विधायक दल में 77 विक्षुब्ध है. देवगौड़ा समेत इनकी संख्या 31 से अधिक नहीं है.’’ कर्णाटक विधानसभा के कुल 224 सदस्य हैं, जिनमें से 139 सदस्य जनता पार्टी के हैं. हेगड़े विरोधी यदि सरकार से अपना हाथ खींच लेते हैं, तो कर्णाटक में जनता पार्टी का सत्ता में टिके रहना नामुनमकिन हो जायेगा.

कर्णाटक के मुख्यमंत्री हेगड़े ने इस पूरी लड़ाई को सत्ता का घिनौना खेल कहा है. इस पूरी अंदरूनी लड़ाई से उकताये हेगड़े ने फिर दोहराया है कि मुख्यमंत्री पद अब आनंददायक नहीं रहा. अतीत में ऐसे अनेक अवसर आये हैं, जब हेगड़े ने पदत्याग की पेशकश बिना हिचक की है. लेकिन इस बार कर्णाटक में हो रही राजनीतिक उठापटक की तुलना उन्होंने नौ वर्ष पूर्व केंद्र में हुए मोरारजी की सरकार गिरने से की है. हेगड़े का कहना है कि विक्षुब्ध वही प्रकरण में दोहराने के लिए कटिबद्ध दीखते हैं. लेकिन 20 अप्रैल को बंगलूर में उन्होंने कर्णाटक में जनता पार्टी के अंदर हो रही उठापटक के लिए केंद्र की कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार बताया.

इसके पूर्व मध्यस्थों की सक्रियता से लगने लगा था कि दोनों पक्षों के लिए कोई मान्य समाधान निकल आयेगा. मध्यस्थों ने जो एकता फार्मूला तैयार किया था, उसके तहत देवगौड़ा को कर्णाटक राज्य जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाना था. सार्वजनिक निर्माण विभाग के पूर्व मंत्री श्री देवगौड़ा के खिलाफ पुलिस जांच हो रही है. उन पर अपने सगे-संबंधियों के साथ पक्षपात करने का आरोप लगाया गया है. प्राप्त सूचना के अनुसार घर बनाने के लिए मैसूर में महत्वपूर्ण भू-खंड आवंटित कराने में उन्होंने अपने लोगों की मदद की. लेकिन उन्हें राज्य जपा अध्यक्ष बनाने के प्रस्ताव से हेगड़े सहमत नहीं हुए.

उन्होंने कहा कि मौजूदा राज्य जनता पार्टी के अध्यक्ष एमपी प्रकाश को संगठन का प्रमुख बने, अभी कुछ ही दिन हुए है. उन्हें हटाना तर्कसंगत और सही नहीं है. यह भी प्रस्ताव आया कि दोबारा देवगौड़ा को राज्य मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया जाये. इस पर हेगड़े ने अपनी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की है. दोनों खेमे शक्ति परीक्षण के लिए तैयार हैं. विक्षुब्धों की मांग है कि गोपनीय मतदान के द्वारा चुनाव किया जाये, लेकिन हेगड़े ने गोपनीय मतदान का प्रस्ताव ठुकरा दिया है. इस अंदरूनी खेमेबंदी के आरंभ में हेगड़े पशोपेश में दीख रहे थे, लेकिन 19 अप्रैल को नयी दिल्ली में उन्होंने जो रुख अख्तियार किया, उससे स्पष्ट हो गया कि वह विक्षुब्धों के अनुचित दबाव के आगे समर्पण नहीं करेंगे.

हेगड़े ने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘‘मैं पहले पदत्याग करने के संबंध में सोच रहा था, लेकिन अब मैं ऐसा नहीं करने जा रहा हूं. क्योंकि यह एक चुनौती है. दल में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना मरा फर्ज है. नहीं तो, लोग मुझे कायर और मैदान से भागनेवाला कहेंगे.’’

विरोधियों की मांग थी कि हेगड़े पुन: विश्वास प्राप्त करने के पूर्व त्यागपत्र दे दें. लेकिन हेगड़े ने विरोधियों के इस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया. हालांकि बार-बार सरकार न गिरने के संबंध में अपने समर्थकों को आश्वस्त करते रहे हैं. ‘‘कुछ लोग, खासकर कांग्रेसी, अगर यह सोचते है कि हमारी सरकार गिर जायेगी, तो यह महज ख्वाब व दिवास्वप्न ही सिद्ध होगा.’’ लेकिन इस बयान के अगले दिन ही उन्होंने कहा कि ‘‘कांग्रेस के अंदर जो मेरे व्यक्तिगत मित्र हैं, उन्होंने पहले ही मुझे ताकीद की थी कि मेरे खिलाफ बड़े पैमाने पर षडयंत्र हो रहा है, जिसमें जनता पार्टी के भी कुछ वरिष्ठ लोग शामिल हैं.’’

हेगड़े के इस बयान के बाद ही पांच विक्षुब्ध विधायकों ने एक अलग बयान जारी किया और हेगड़े के इस बयान को बेबुनियाद बताया. विक्षुब्धों के अनुसार हेगड़े का यह बयान उनकी असहाय स्थिति दरसाता है. इस राजनीतिक संकट के लिए हेगड़े समर्थकों ने जनता पार्टी के उन विधायकों पर भी आरोप लगाया, जो 28 मार्च को राज्यसभा चुनाव के दिन राजभवन में जा कर बूटा सिंह से मिले थे. हेगड़े के अनुसार कांग्रेस के उकसाने पर ही जनता पार्टी के कुछ शरारती तत्व उन्हें परेशान करना चाहते हैं.

हेगड़े ने विरोधियों को शिकस्त देने के लिए नयी चाल भी चल दी है. 20 अप्रैल से 29 अप्रैल तक वह राज्य के विभिन्न जिलों का दौरा करेंगे और सार्वजनिक सभाएं संबोधित करेंगे. विक्षुब्धों ने हेगड़े की मंशा ताड़ कर इस यात्रा के पूर्व उन्हें चेतावनी दी कि ‘‘अगर श्री हेगड़े अपनी जन सभाओं में पार्टी विक्षुब्धों की चर्चा छेड़ेंगे, तो हम भी जन सभाओं के माध्यम से उन्हें करारा जवाब देंगे.’’ हेगड़े ने इस धमकी का जवाब दिया कि ‘‘मैं विक्षुब्धों से अनुरोध करूंगा कि वे जनता के बीच जाये, इसके लिए उन्हें मेरी अनुमति आवश्यक नहीं है. यदि वे जनता के बीच जाते हैं, तो उन्हें यह समझने में आसानी होगी कि इस सरकार के संबंध में जनता क्या सोचती है.’’ हेगड़े और विक्षुब्धों की इस नयी चाल से पूरी संभावना बन गयी है कि जपा की यह अंदरूनी लड़ाई राज्य के विभिन्न हिस्सों में सार्वजनिक जन सभाओं के माध्यम से लड़ी जायेगी.

हेगड़े ने इस आशंका को भी निराधार बताया कि चंद्रशेखर की शह पा कर विक्षुब्ध कूद-फांद रहे हैं. मुख्यमंत्री के अनुसार, जब कर्णाटक जनता पार्टी गंभीर संकट से गुजर रही थी, तो चंद्रशेखर ने विक्षुब्धों को समझाया-बुझाया और पार्टी की एकता बनाये रखने में मदद की. इस संकट के लिए हेगड़े अपनी उदारता को ही दोष देते हैं. अब वह अफसोस करते हैं कि आरंभ से ही उन्होंने पार्टी में अनुशासनहीनता के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की. उनके अनुसार विक्षुब्ध उसी क्षण से गोलबंद होना शुरू हुए, जब उन्होंने अपने ही एक सहयोगी के खिलाफ लगाये गये गंभीर आरोपों की जांच का आदेश दिया. हेगड़े का इशारा देवगौड़ा की ओर था.

इस राजनीतिक संकट को सुलझाने में चंद्रशेखर भी जब कारगर नहीं हुए, तो पार्टी सूत्रों के अनुसार हेगड़े ने चंद्रशेखर को एक लंबा खत लिखा और अपनी इच्छा प्रकट की कि जपा विधायक दल अपना दूसरा नेता चुन ले. क्योंकि वह इस घृणास्पद राजनीतिक खेल में शरीक नहीं होना चाहते. लेकिन चंद्रशेखर इस तथ्य को समझते हैं कि कर्णाटक में जनता पार्टी हेगड़े के व्यक्तित्व के ईर्दगिर्द ही घूमती है, अत: वह इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुए. बाद में खुद हेगड़े ने अपना तेवर बदल कर आक्रामक मुद्दा अपना ली. मौजूदा संकट अगर निबट भी जाये, तो पार्टी में जो पहले एकता, विश्वास और सौहार्द्र था, पुन: उसे प्राप्त करना कठिन होगा. इस तथ्य से हेगड़े वाकिफ है और खुद इसे स्वीकारते भी हैं.

मूलत: यह संकट राज्यसभा चुनाव के दौरान ही ज्यादा मुखर हुआ. हेगड़े ने सरकार और दल में अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए राम जेठमलानी को राज्यसभा के लिए कर्णाटक से जपा प्रत्याशी बना दिया. लेकिन 28 मार्च को चुनाव के ऐन मौके पर ही 68 जपा विधायकों ने हेगड़े के इस निर्णय का विरोध किया और मुखर होकर ये विक्षुब्ध देवगौड़ा के साथ जा मिले. हेगड़े के लिए यह अप्रत्याशित स्थिति थी, इन विक्षुब्धों ने पार्टी के प्रत्याशी को वोट देने से भी इनकार कर दिया. 28 मार्च को विधानसभा में डेढ़ बजे यह चुनाव खत्म होना था. एक बजे तक, जब ये विक्षुब्ध विधायक वोट देने नहीं पहुंचे, तो तनाव बढ़ता गया.

यह भी आशंका थी कि ये विधायक, विक्षुब्ध पार्टी उम्मीदवार आइ सी नाथन को वोट देंगे. उस दिन राज्य जपा में विभाजन की स्थिति पैदा हो गयी थी. लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के हस्तक्षेप से इस संकट को किसी तरह उस समय निबटाया जा सका. उस दिन यह बात स्पष्ट हो गयी कि हेगड़े जपा विधायक दल के अब एकछत्र नेता नहीं रहे. पार्टी के विधायक राम जेठमलानी के साथ-साथ जे पी जावाली, अब्दुल समद सिद्दकी को राज्यसभा का जपा उम्मीदवार बनाये जाने से नाखुश थे. हेगड़े के खिलाफ पार्टी में अंदरूनी आक्रोश पहले से ही था, लेकिन उस दिन इस अवसर का लाभ उठाया 20 जपा विधायकों के एक गुट ने. यह गुट पिछले दो वर्षों से हेगड़े को अपने मंत्रिमंडल से गलत लोगों को हटाने की मांग करता रहा है.

वस्तुत: विक्षुब्धों के पास आरंभ से ही कोई स्पष्ट मुद्दा नहीं था. समय-समय पर हेगड़े सरकार की कमियों को उजागर करने तक ही उनकी भूमिका सीमित थी. लेकिन देवगौड़ा का संरक्षण पाने के बाद विरोधी ताकतवर और मुखर हो गये. देवगौड़ा के खिलाफ जांच के संदर्भ में यह भी चर्चा हुई कि हेगड़े कर्णाटक की राजनीति में ताकतवर समूह वोक्कालिगा की शक्ति को कमजोर करना चाहते हैं. इसीलिए वोक्कालिगा समूह के सबसे ताकतवर नेता देवगौड़ा के खिलाफ उन्होंने प्रहार किया है.

पिछले एक वर्ष से देवगौड़ा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. हाल में भाजपा के बी. बी. शिवय्या ने देवगौड़ा के खिलाफ पुन: गंभीर आरोप लगाये. मुख्यमंत्री ने इस पर जांच का आदेश दिया. देवगौड़ा के खिलाफ मुख्यमंत्री की इस कार्रवाई से विक्षुब्धों को एक कारगर हथियार मिल गया. देवगौड़ा ने भी चालाकी की. वह एक राजनीतिक मुद्दा उठा कर अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री को सौंप आये. उनके इस्तीफे के बाद हेगड़े समर्थकों के कान खड़े हो गये. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस समस्या को निबटाने के लिए हस्तक्षेप किया. लेकिन बात नहीं बनी. देवगौड़ा ने 28 मार्च को अपना इस्तीफा देते हुए यह कबूल किया कि पार्टी के अंदर वर्षों से आग सुलग रही थी. सरकार की कार्यप्रणाली से लोग नाखुश थे. अब यह आक्रोश सतह पर आ गया है. उस दिन से ही विक्षुब्ध हेगड़े के खिलाफ रोजाना नयी चालें चल रहे हैं.

कर्णाटक में चल रहे इस विवाद का संबंध कुछ राजनीतिक विश्लेषक राष्ट्रीय स्तर पर जपा और लोक दल (अ) के प्रस्तावित विलय के संदर्भ में उपजे संकट से भी जोड़ते हैं. इन लोगों का कहना है कि चूंकि हेगड़े चंद्रशेखर की कार्यशैली से नाखुश थे और विलय के भी खिलाफ थे, इस कारण जपा राष्ट्रीय नेतृत्व की शह पर हेगड़े के खिलाफ पार्टी के अंदर विक्षुब्ध विधायक बखेड़ा खड़ा करने लगे. हेगड़े को सबक सिखाने के लिए ही उनके खिलाफ कर्णाटक में मोरचाबंदी आरंभ की गयी.

बहरहाल इस विवाद की जड़ में जो भी तथ्य हों, कर्णाटक में अगर जपा सरकार विफल होती है, तो देश की जनता इसे विपक्ष की असफलता के रूप में स्वीकार करेगी. इस तथ्य को भी बल मिलेगा कि मध्यमार्गी पार्टियां अपने नेताओं के अहं की लड़ाई से मुक्त हो कर शासन नहीं कर सकतीं. इनकी क्षमता और योग्यता पर सवाल उठेंगे और राष्ट्रीय स्तर पर भले ही विपक्षी एकता की चर्चा रोजाना हो, लेकिन जनता के बीच इनकी विश्वसनीयता पर गंभीर आंच आयेगी.

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