विरोधी नेताओं की सीमाएं

Updated at : 24 Jun 2016 4:24 PM (IST)
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विरोधी नेताओं की सीमाएं

-हरिवंश- इस देश के विरोधी दल एवं उनके नेता चुके लोग हैं. या तो वे राजनीति का ‘क ख ग’ नहीं जानते या बहुसंख्यक जनता से उनका कोई संपर्क नहीं है. महज समस्याएं खड़ी कर देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका समाधान निकालना आवश्यक है. लगता है, समस्याओं की नब्ज पर उनकी पकड़ नहीं […]

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-हरिवंश-

इस देश के विरोधी दल एवं उनके नेता चुके लोग हैं. या तो वे राजनीति का ‘क ख ग’ नहीं जानते या बहुसंख्यक जनता से उनका कोई संपर्क नहीं है. महज समस्याएं खड़ी कर देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका समाधान निकालना आवश्यक है. लगता है, समस्याओं की नब्ज पर उनकी पकड़ नहीं है या वे कठिन समय में राजनीति करने के काबिल नहीं है.

पंजाब समस्या सुलझाने की दिशा में प्रधानमंत्री और संत लोगोंवाल के बीच हुआ समझौता एक सुखद घटना है. कल तक वे विरोधी नेता सरकार पर तोहमत लगाते थे कि वह पंजाब समस्या का समाधान नहीं चाहती, लटकाये रखना चाहती है. 1983 में विरोधी दल के दिग्गजों चरण सिंह, जगजीवन राम, बहुगुणा, फारूख अब्दुल्ला, रामराव, चंद्रजीत यादव, चंद्रशेखर आदि ने पंजाब समझौते के लिए एक फार्मूला तैयार किया था. शायद इन लोगों को अब याद भी न हो, पर आज सरकार व अकालियों के बीच, जो समझौता हुआ है, कमोबेश उसी मसविदे पर यह आधारित है.

बुद्धिमानी यह होती कि विरोधी दल, जनता के बीच आज यह सवाल रखते कि जब हमने समझौता का प्रारूप तैयार किया, तो उसे देश हित में नहीं बताया गया, हमारी राष्ट्रीयता पर संदेह व्यक्त किया गया, हमें देशतोड़क कहा गया, आज अंतत: उसी प्रारूप पर समझौता हुआ, तो जनता स्वयं तय करे कि देश हित के संबंध में कौन-कैसे सोचता है. बलिया संसदीय चुनाव में कांग्रेस (ई) का नारा था कि बलिया के ‘भिंडरावाले चंद्रशेखर’ को परास्त करो. तब चंद्रशेखर अकालियों से सुलह की बात करते थे, तो देशद्रोही करार किये गये. आज उन्हीं मुद्दों पर अकालियों से समझौता कर प्रधानमंत्री सबसे बड़े ‘हीरो’ हो गये हैं. विरोधी दलों के पास इस दोमुंही राजनीति को उजागर करने का सबसे बड़ा उपयुक्त समय है.

वक्ती राजनीति का यह तकाजा था कि विरोधी दल के नेता देश भर में घूमते, समझौते का स्वागत करते और जनता की अदालत में यह सवाल रखते कि वर्षों पूर्व हमने यह समझौता-फार्मूला रखा था, तो हमें देशद्रोही करार किया गया. उलटे कुछ लोगों को अब इस समझौते से आपत्ति है. कुछ राष्ट्रपति के पास भी हो आये. देवीलाल जैसे चुके व संकीर्ण विचारवाले नेताओं को लग रहा है कि यही वक्त है, जब रामराव की तरह क्षेत्रीयता-आत्मसम्मान की बात उठा कर कर वे सत्ता गलियारे में घुस सकते हैं. ये लोग आंदोलन की तैयारी में लगे हैं.

शायद ये लोग वाकिफ नहीं हैं कि राज्य तभी साबूत रहेगा, मजबूत व विकसित होगा, जब देश में एकता होगी. आत्मा को निर्जीव बना कर शरीर की कोई उपयोगिता नहीं रहती. अगर भारत देश पर संकट है, तो राज्यों को उससे अपने को अलहदा महसूस नहीं करना चाहिए. उनका अस्तित्व तभी तक है, जब तक यह देश अखंड है.

देश के सामने नाजुक मोड़ आते हैं. उससे उबरने के लिए बौने लोग अक्षम होते हैं. समय का तकाजा होता है कि ऐसे अवसरों पर दलगत राजनीति, आपसी स्वार्थ, संकीर्ण मनोवृत्ति से लोग ऊपर उठे, राष्ट्रीय सहमति हो, लेकिन इसके लिए पहल सत्तारूढ़ दल से होनी चाहिए, जो आज नहीं हो रहा है.

संभवतया लोगों को याद हो, भारत-पाक का विभाजन जब अनिवार्य दीखने लगा, तो गांधीजी ने जिन्ना को प्रधानमंत्री पद देकर इस देश को अखंड रखने की ईमानदार व अंतिम पहल की थी. आज क्या हश्र है? पाक व भारत एक-दूसरे को भयभीत करने के लिए परमाणु बम की तलाश में हैं. जिया व राजीव गांधी दोनों को उन करोड़ों-करोड़ लोगों की परवाह नहीं, जिन्हें एक जून की रोटी मयस्सर नहीं, पर आणविक ताकत जुटाने, फ्रांस व अमरीका को धन लुटा कर अस्त्र-शस्त्र खरीदने को ये उतावले हैं.

अलग-अलग रागों में सभी विरोधी नेता पंजाब समस्या पर अपना ‘ऐतिहासिक सिद्धांत’ प्रतिपादित करने में जुटे हैं, बल्कि होड़ लग गयी है. कुछ लोगों को दुख है. उन्हें बिना बताये यह समझौता कैसे हो गया! प्रधानमंत्री को ही श्रेय क्यों मिला?‍ इसे गुप्त क्यों रखा गया! यह जल्दी में किया गया, इससे औचित्य भंग हुआ है. लेकिन इस देश की जनता का इन बातों से लेना-देना नहीं, वह राहत की सांस ले रही है. पंजाब में लोग खुश हैं, अन्य राज्यों के मेहनती सिख दीवाली मना रहे हैं. विदेशों में भी कुछ मुट्ठी भर सिखों को छोड़ कर बाकी खुश हैं.

जब भिंडरावाले जीवित थे, तो अकसर विरोधी नेता इस समस्या को सलटाने के लिए सुलभ दर्शन समझाते थे, ‘‘नरमपंथियों से समझौता पर उग्रपंथियों को अलग-थलग कर दो.’’ आज यही काम हो गया, तो उन्हें नागवार गुजर रहा है, क्योंकि इससे उनका सम्मान नहीं बढ़ा. उन्हें अहमियत नहीं मिली. देश का सम्मान, व्यक्तिगत अहं व संकीर्ण राजनीति से ऊपर की चीज है, यह बुनियादी पाठ इन नेताओं को पुन: पढ़ाना होगा. वैसे जनता इन्हें अकसर पढ़ाती रहती है, फिर भी इन पर कोई असर नहीं.

पानी के बंटवारे का मसला है. लगता है, यह भारत-बांगलादेश का मामला बन गया है. हरेक राज्य एक-दूसरे से इस सवाल पर भिड़ा है. उधर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान है, तो दक्षिण में कर्णाटक, आंध्र व तमिलनाडु. उत्तर-पूर्व में असम व अन्य प्रदेश. मध्य भारत के प्रदेशों का भी मामला अधर में है. अनेक आयोग बने, पर समस्या जहां की तहां. पानी के सवाल पर एक राज्य दूसरे को ऐसे देखता है, जैसे वह पड़ोसी राज्य न होकर पड़ोसी देश हो. लोग यह भूलते हैं कि कुल मिला कर भारत के विकास का सवाल है. उचित यह होगा कि पानी को तत्काल केंद्रीय सरकार अपने अधिकार की परिधि में ले व जल बंटवारे के अंतहीन विवाद को ‘पंचाट’ (ट्रिब्यूनल) बन कर निबटारा करे.

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