साहस की प्रतिमूर्ति योगेंद्र शुक्ल

Updated at : 24 Jun 2016 1:27 PM (IST)
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साहस की प्रतिमूर्ति योगेंद्र शुक्ल

-हरिवंश- योगेंद्र शुक्ल, जिन्हें स्वाधीनता आंदोलन के क्रांतिकारी ‘बिहार का शेर’ कहते थे, जेपी के साथ भागनेवाले योगेंद्र जी को गांधी जी ‘योगी’ कहा करते थे. अद्भुत जिजीविषा और शौर्य के धनी शुक्ल जी ही जेल में भागने की योजना क्रियान्वित करनेवाले थे. अद्भुत व्यक्तित्व, प्रशस्त ललाट और अपूर्व बलिष्ठ. एक बार पुलिस के घेरे […]

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-हरिवंश-

योगेंद्र शुक्ल, जिन्हें स्वाधीनता आंदोलन के क्रांतिकारी ‘बिहार का शेर’ कहते थे, जेपी के साथ भागनेवाले योगेंद्र जी को गांधी जी ‘योगी’ कहा करते थे. अद्भुत जिजीविषा और शौर्य के धनी शुक्ल जी ही जेल में भागने की योजना क्रियान्वित करनेवाले थे. अद्भुत व्यक्तित्व, प्रशस्त ललाट और अपूर्व बलिष्ठ. एक बार पुलिस के घेरे में आने पर वह सोनपुर पुल पर से ही बीच नदी में साइकिल समेत कूद कर कर निकल भागे. एक बार वह मलखाचक गांव में गिरफ्तार कर लिये गये, तो उन्हें स्पेशल ट्रेन से छपरा ले जाया गया. छपरा जेल से भी उन्हें छुड़ाने की योजना बनी, पर हथकड़ी-बेड़ी में उन्हें जकड़ दिया गया था. इस कारण यह योजना सफल न हो सकी. आचार्य कृपलानी शुक्ल जी के राजनीतिक गुरु थे.
साबरमती आश्रम में कुछ लोगों ने बापू से शिकायत की कि बिहार के योगेंद्र शुक्ल प्रार्थना में हिस्सा नहीं लेते, तो बापू ने कहा, ‘जिस चीज की मुक्ति के लिए तुम लोग प्रार्थना में शामिल होते हो, वह योगी को प्राप्त हो चुका है.’ योगेंद्र जी मानते थे कि सच्चाई से काम करना ही भजन है. लोक प्रार्थना करते थे, वह गांधी आश्रम में सफाई का काम करते थे, वह अद्भुत साहसी थे. आरंभ से ही घोड़े पर सवारी, जंगल में सूअर मारना, शिकार करना, उनके मनपसंद काम थे. एक बार सोनपुर में गांधीजी की सभा हुई. सभास्थल पर पंडाल की कोई यथोचित व्यवस्था नहीं कर पा रहा था. शुक्ल जी ने अकेले सब किया, फिर तो वह राजनीति को ही समर्पित हो गये. बंबई गये. बंबई बंदरगाह पर काम किया. होटल ब्वाय का काम किया. फिर कृपलानी जी उन्हें सिंध ले गये. वहां से वह गांधी जी के पास लौटे.

फिर बनारस पहुंचे. गोकुलदास-चंद्रशेखर आजाद से संगति हुई. 1929 में चंद्रशेखर आजाद-भगत सिंह बिहार आये. बेतिया के जंगलों में ये लोग निशाना लगाते थे. उनकी देहयष्टि देख कर पुलिसवाले घबड़ाते थे. जब अंडमान में उन्हें सजा हुई, तो उन्होंने एक बार अनशन कर दिया. 31 दिनों तक अनशन के बाद एक सिपाही ने कुछ जोर-जबरदस्ती की, तो उसे एक घूंसा जमा दिया. उसके दो दांत टूट गये. विभिन्न कुख्यात जेलों में दशकों तक उन्हें अत्यंत खतरनाक कैदी मान कर हथकड़ी-बेड़ी में जकड़ कर रखा गया.

वैसे व्यक्ति को स्वतंत्र भारत में घोर आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ा. सरदार पटेल ने उनसे कहा था कि ‘कांग्रेस में आ जाओ, संसद में भेज दूंगा.’ पर स्वाभिमानी समाजवादी योगेंद्र जी ने इनकार कर दिया. वह जितने जोरदार और क्रांतिकारी थे, उतने ही नरम और सहज भी.

फरारी के दिनों में वह अपने एक परिचित विश्वनाथ जी के यहां ठहरा करते थे. सोनपुर पुल से जब वह कूद कर भागे, तो मोकामा, पटोरी होते हुए, विश्वनाथ के यहां गये. वहां भोजन किया. फिर अखाड़ा घाट पार करने लगे, तो विश्वनाथ ने लोभवश पुलिस को सूचना दे दी. उनकी गिरफ्तारी पर 10,000 रुपये का इनाम था. पकड़े लिये गये. कुछ वर्षों बाद हाजीपुर स्टेशन पर विश्वनाथ से अचानक उनकी मुलाकात हुई, तो उसे पकड़ कर एक हाथ जमा दिया. फिर रोने लगे. कहा, ‘अपने भाई को मारा. हमारा काम तो देश को आजाद कराना है, भाई से लड़ना नहीं. लोभवश इसने भूल की, तो मैं भी वैसा ही कर बैठा.’

आर्थिक तंगी के दौरान ही 1966 में उनकी मृत्यु हुई. जेपी उनके यहां बराबर आते थे. बड़ा अपनापन था. अस्वस्थ योगेंद्र जी को देखने एक बार जेपी आये. उनके पास कुरसी पर बैठे. किसी के हाथ से माला लेकर उन्होंने जेपी के गले में डाल दी. जेपी विह्वल होकर रोने लगे. ‘योगेंद्र जी! आप मुझे माला पहनायेंगे.’ वह भी विह्वल हो गये. जेपी ने कहा, ‘आप पटना चलिए, मैं आपकी सेवा करूंगा.’ उन्होंने कहा, ‘जेपी! तब देश की सेवा कौन करेगा?’

जब उनकी हालत बहुत खराब हुई, तो बिहार के तत्कालीन मंत्री दीपू बाबू और सत्येंद्र बाबू ने उन्हें पटना अस्पताल में भरती कराया. सत्येंद्र बाबू जब उनसे मिलने गये, तो उन्होंने शिकायत की, ‘तुम्हारी सरकार तो क्या ब्लॉक का डॉक्टर भी हमें देखने नहीं आता.’ पटना अस्पताल से एक बार उन्हें कॉटेज खाली करने का आदेश थमा दिया गया. शुक्ल जी के सहयोगियों ने इसकी शिकायत तत्कालीन केंद्रीय मंत्री गुलजारीलाल नंदा से की, तो उन्होंने पैसा भेजा और आदेश दिलवाया कि जब तक शुक्ल जी जिंदा रहेंगे, वहीं रहेंगे.

जब जेपी सोशलिस्ट पार्टी छोड़ कर जाने लगे, तो वह बहुत मर्माहत हुए. सीतामढ़ी सोशलिस्ट पार्टी अधिवेशन में उन्होंने जेपी से कहा कि ‘जेपी आप पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं. आप मास्टरी-ट्यूशन करके अपना खर्च चला लेंगे, लेकिन जिस धंधे (तब तक उनकी रोशनी छीज गयी थी) को आपने अपना साथी बनाया है, उसे किसके भरोसे छोड़ा है उत्तर देना है आपको.’ – जेपी कुछ बोल नहीं सके.

1952 में शुक्ल जी लालगंज से सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में ललितेश्वर प्रसाद शाही से चुनाव हार गये. राजनीति में अपने को झोंक देने के कारण वह परिवार पर ध्यान नहीं दे पाये. उनके एकमात्र पुत्र कम उम्र में गुजर गये. तब से उनकी पतोह शारदा देवी ने जिस कठिनाई और संघर्ष से परिवार की गाड़ी आगे बढ़ायी, वह अद्भुत है. आज योगेंद्र जी का पोता देवमित्र शुक्ल पढ़ रहा है, पर पता नहीं इस व्यवस्था में उसे भी जीवन-यापन के लिए प्रतिदान मिलेगा या नहीं.

जलालपुर के जिस शौर्य-साहस को बैकुंठ शुक्ल और योगेंद्र शुक्ल ने देश के कोने-कोने में किस्सा बना दिया, आज इस धरती पर इन दोनों सपूतों के न तो स्मारक हैं, न कोई चिह्न. हां, विधायकों-सांसदों-मंत्रियों के नाम पर कॉलेज-सड़कें और न जाने क्या-क्या चीजें सरकारी अनुदान पर बन रही हैं.
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