बंद करो यह स्वांग

-हरिवंश- किसी आयोजन-उत्सव के पीछे की भावना (आत्मा) जब मर जाये, तो उस समारोह को बंद कर देना ही बेहतर है. महज आरती उतारने और जय-जयकार के लिए आयोजित उत्सव सारहीन होते हैं. किसी हद तक प्रतिगामी भी. ऐसे औपचारिक आयोजनों से राष्ट्रीय जीवन में बेमतलब स्तुति और चाटुकारिता को बढ़ावा मिलता है. 26 जनवरी […]
-हरिवंश-
स्वागत समिति के सदस्य केशवभाई पटेल से सरदार पटेल ने ऐसा नाम पूछा, जो निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरता हो. उन्होंने तत्काल छीता पटेल का नाम बताया. बारडोली तालुका के बराड गांव के वासी 50 वर्षीय छीता पटेल मूलत: किसान थे. बारडोली सत्याग्रह में उन्होंने आगे बढ़ कर हिस्सा लिया था.
अपनी धरती-खेतीबारी और परिवार से मोह करनेवाले छीता भाई भी बारडोली के दूसरे किसानों की तरह हिजरत पर निकले. वह बराड से दूर जाना चाहते थे, ताकि गांव-घर, परिवार और खेतीबारी की सरहद से बहुत दूर निकल जायें. बारडोली सत्याग्रह के सिपाही कुंवरजी भाई से उन्होंने अपने मन की बात कही. उन्होंने समझाया, पर छीता का तर्क था कि दूसरे लोगों की तरह हिजरत करके मैं भी गांव के पास रहूं, तो माया-मोह से उबरना कठिन होगा. किसान के लिए खेती और घर छोड़ने से बड़ा दुख और क्या हो सकता है, अत: दूर के गांव में ही जाना ठीक है.
अंतत: अंगरेजी हुकूमत की सीमा लांघ कर बड़ौदा रियासत के परब गांव में छीता भाई गये.बारडोली के किसानों का संघर्ष और फिर हिजरत स्वतंत्रता संग्राम का स्वर्णिम अध्याय है. इन हिजरतियों की मदद के लिए बंबई में भुलाभाई देसाई की देखरेख में राहत कोष इकट्ठा किया गया. बड़ौदा रियासत की सीमा में हिजरत पर आये किसानों के सामने कठिन समस्या थी, पशुओं के चारे की. बंबई फंड से पशुओं के लिए हिजरती किसानों को मदद दी जाने लगी.
हिजरती अपने घरों-गांवों में लौट कर फिर अपनी दुनिया में रम गये थे. पर परब में छीता पटेल बटाईदार ही बने रहे. हां परब-चलथाण के बीच उनकी बैलगाड़ी दौड़ लगाती रही. आठ साल छीता पटेल यही करते रहे. हरिपुरा कांग्रेस के समय केशवभाई ने छीता से कहा. ‘सुभाषचंद्र बोस के स्वागत रथ को हांकने के लिए तुम्हें मेरे साथ हरिपुरा चलना है.’ छीता पटेल का जवाब था, ‘इस मर्यादा, मान-सम्मान के लिए मैं आप सबका आभारी हूं. लेकिन मैं हरिपुरा नहीं जा सकूंगा.’ केशवभाई के आग्रह पर छीता पटेल ने अपने संकल्प की बात दोहरा दी.
सरदार पटेल स्वयं छीता भाई को बुलाने गये. परब गांव में दिहाड़ी पर काम करनेवाले मजदूर छीता भाई के सम्मान में परब गांव के लोगों ने सभा की. सभा में उनके बारे में बहुत कुछ कहा गया. छीता भाई जब बोलने उठे, तो मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. साहस बटोर कर उन्होंने कहा कि ‘आप सबके बीच मुझे अपनी भूल स्वीकारनी है. दुर्दिन के लिए मैंने कुछ पैसे बचा रखे थे. उस रकम से मैं परब के प्रत्येक घर को पीतल का एक-एक डिब्बा भेंट करना चाहता हूं. आप मेरी यह भेंट स्वीकारें.’ बारडोली में विशाल जुलूस निकाल कर सुभाष के इस सारथि का स्वागत हुआ था. छीता पटेल जैसे लोगों को भुला कर कब तक हम 15 अगस्त, 26 जनवरी की अर्थी ढोने का स्वांग रचते रहेंगे?
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