आप्रवासी कृषि मजदूरों के दुख-दर्द

Updated at : 01 Jun 2016 12:05 PM (IST)
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आप्रवासी कृषि मजदूरों के दुख-दर्द

– हरिवंश- 28.09.94 सितंबर को पहली मुलाकात थी, ‘नेशनल प्रिजन प्रोजेक्ट’ के कार्यकारी निदेशक एल्विन जे ब्रोंस्टाइन से. स्वयंसेवी संस्था के कार्यकारी निदेशक हैं. जेलों के कैदियों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए पिछले 22 वर्षों से लगे हैं. गोरे हैं. धुन के पक्के. अमेरिका के बारे में दिलचस्प जानकारी देते हैं. कहते हैं कि […]

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– हरिवंश-

28.09.94 सितंबर को पहली मुलाकात थी, ‘नेशनल प्रिजन प्रोजेक्ट’ के कार्यकारी निदेशक एल्विन जे ब्रोंस्टाइन से. स्वयंसेवी संस्था के कार्यकारी निदेशक हैं. जेलों के कैदियों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए पिछले 22 वर्षों से लगे हैं. गोरे हैं. धुन के पक्के. अमेरिका के बारे में दिलचस्प जानकारी देते हैं. कहते हैं कि यहां भी न्याय, समर्थ लोगों के साथ है. 99 फीसदी अपराधी चूंकि गरीब हैं, इस कारण बचाव का बेहतर बंदोबस्त नहीं कर पाते. जेलों में पड़े रहते हैं. फिलहाल जेलों में बंद 70 फीसदी से अधिक कैदी कोकीन, हेरोइन मरीजुआना खाने-बेचने में लगे थे.

कहते हैं कि हमारा स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश विभाग) इराक, क्यूबा, हैती वगैरह के लिए चिंतित होता है. मानवाधिकार के सवाल उठता है, पर अपने कैदियों के बारे में नहीं सोचता. 22 वर्ष पहले जब जेलों के सुधार के लिए ब्रोंस्टाइन सक्रिय हुए, तब जलों की हालत खराब थी. 19वीं शताब्दी के जेल थे. अब काफी सुधर गये हैं. नये अंडरग्रांउड जेल बने हैं. उससे नया संकट पैदा हो गया है. भूमिगत जेलों में कैदी बिल्कुल अलग-थलग रखे जाते हैं. बिल्कुल एकांत के अलग संकट हैं.

कुछ राज्यों ने नये जेल बनाने शुरू किये, तो आर्किटेक्टों की समिति में ब्रोंस्टाइन को भी रखा. अमेरिका खूब है, यह. भारत में जो
व्यवस्था के खिलाफ लड़ेगा, उसे सरकारी सलाहकार समितियों में कभी ठौर नहीं मिलेगी. वह अवांछित बन जाता है. अपराधियों को सुधारने के लिए कठोर दंड के विरोधी हैं. कहते हैं, इससे अपराधी सुधरते तो नाजी कैंपों या रूस की जेलों में ठीक हो जाते. वहां अपराधमुक्त समाज होता, पर यह कहां? बेरोजगारी, निजी संकट जैसी चीजों के विकल्प ढूढ़ने से यह कम होगा. वह मानते हैं कि अमेरिकी अपराध का 80 फीसदी कारण पाइप गन का सहज ढंग से उपलब्ध होना हैं.

बंदूक आसानी से उपलब्ध है. बातचीत हुई. गुस्सा आया. बंदूक का इस्तेमाल हो गया. इसलिए वह बंदूक पर पाबंदी के पक्षधर हैं. इस पाइप गन के खिलाफ जनमत तैयार हो रहा है. पर पाइप गन उद्योग में लगे लोग भी सक्रिय हैं. वे नहीं चाहते कि इस पर पाबंदी लगे.

ब्रोंस्टाइन का कहना है कि हम नये देश हैं. हमारा अतीत महज 200 वर्षों पुराना है. इस कारण हम चीजों को ठीकठाक करने में लगे हैं. ब्रोंस्टाइन बैठे-बैठे सामने दिखाते हैं. भव्य होटल का गेट है. बमुश्किल 40-50 गज दूर. कुछ वर्षों पूर्व यहीं पर रीगन पर पाइप गन से हमला हुआ था. वह बाल-बाल बचे. उनका प्रेस सलाहकार घायल हुआ. गंभीर रूप से. उसकी पत्नी ब्रेदी, पाइप गन के खिलाफ देश में जनमत बना रही हैं. समर्थन मिल रहा है. निजी संकट-दुख को सामाजिक दुख-संकट से जोड़ लिया है.
वह आंकड़ों से बताते हैं. पिछले दस वर्षों से केलिफोर्निया राज्य में जेलों पर 1400 बिलियन डॉलर खर्च हुए हैं. शिक्षा पर इससे काफी कम . दूसरे राज्यों की भी यही स्थिति है. जेल पर खर्च बढ़ने का तात्पर्य है, अपराध बढ़ रहे हैं. अपराधी बढ़ रहे हैं. कहते हैं, जड़ मूल से इस प्रवृति को रोकने की कोशिश नहीं होगी, तो क्या होगा? अपराधी बढ़ेंगे शिक्षा पर निवेश कम होगा, तो और अपराधी बढ़ेंगे. विश्वविख्यात ब्रुकिंग्स संस्थान के अध्ययन का हवाला देते हैं, ब्रुकिंग्स ने 2025 में अमेरिका की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार की है.

उसका कहना है कि जनसंख्या वृद्धि दर यही रही और अपराध वृद्धि दर यही रही तो 2025 में आधा अमेरिका जेल में होगा. 25-50 वर्षें बाद अमेरिका कहां होगा, इसका शोध-निष्कर्ष हो रहा है. स्वैच्छिक संस्थाएं, जागरूक लोग सरकार पर उस अनुसार परिवर्तन के लिए दबाव (प्रेशर ग्रुप) के रूप में काम कर रहे हैं.

मूलरूप से ड्रग्स का धंधा बढ़ा है. कहते हैं कि चोरी या मामूली अपराधों पर तो पुलिस अब कार्रवाई नहीं करती. घर में चोरी हो गयी, कार की चोरी हो गयी. रिपोर्ट करें. पुलिस आयेगी. पूछेगी इंश्योरेंस से पैसा ले लें. पुलिस अपरोक्ष रूप से यही सलाह देती है.
इसका कारण ब्रोंस्टाइन मानते हैं कि ड्रग व दूसरे अपराध इतने बढ़ गये है कि पुलिस उनमें उलझी है. बढ़ते अपराधों के अनुरूप उसके पास न तैयारी है, न मानव साधन और न संसाधन. यह गंभीर लक्षण है. अमेरिकी समाज में अपराध बढ़ने से बेचैनी है. बहस है.
ब्रोंस्टाइन के अनुसार आठ लाख चालीस हजार से अधिक कैदी अमेरिकी जेलों में हैं. प्रत्येक एक लाख अमेरिकी में 426 जेल में हैं. कनाडा की तुलना में यह चार गुना अधिक है. पश्चिमी यूरोपीय देशों के मुकाबले सात गुना अधिक. इनमें से 60 फीसदी कैदी रेड इंडियन, ब्लैक और हिस्पैनिक हैं. एड्स रोगियों के लिए जेलों में कैसे मानवीय प्रबंध हो, इसके लिए कोशिश-बहस चल रही है.

दोपहर में मुलाकात तय है अमेरिकी सरकार के हेलिंस्की के सम्मेलन के तहत गठित ‘ कमीशन ऑन सिक्यूरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप’ (सीएससीइ) के वरिष्ठ अधिकारियों से सीएससीइ से यूगोस्लाविया हटाया गया है. 52 देश सदस्य हैं. सरकार में काम करते हुए भी सरकारी अधिकारी खुल कर अपनी बात कहते हैं. अमेरिका के कृषि फार्मों में काम करनेवाले मजदूरों-श्रमिकों की दुर्दशा बताते हैं. बड़े-बड़े अमेरिकी कृषि फार्मों में काम करने के लिए आप्रवासी (माइग्रेट लेबर) मजदूर आते हैं. किसानों के फार्मवर्कर्स कहा जाता है.

यह कुछ-कुछ वैसा ही कि ठेकेदार, ग्रुप लीडर या बिचौलिया, आदिवासी मजदूरों को छोटानागपुर से असम, पंजाब या दूसरे राज्यों में ले जाते हैं. खूब खटाते हैं. दवा, भोजन पानी की व्यवस्था नहीं होती. रहने को प्रबंध नहीं होता. यौन अत्याचार होता है. यही कहानी अमेरिकी फार्महाऊस में काम करने आये बाहरी मजदूरों की भी है. शायद दुनिया में शारीरिक श्रम या मजदूरी करनेवालों की यही हालत है. देश, काल या परिस्थिति से मामूली फर्क हो सकता है. पर दुनिया में मजदूरी करके खानेवाले दिहाड़ी मजदूर दुख में ही हैं. पर हेलिंस्की सम्मेलन के तहत गठित आयोग ने विभिन्न अमेरिकी राज्यों में जाकर इसकी सुनवाई की.

आयोग को जो शिकायतें मिलीं, वे थीं-मजदूरी कम देना, मानसिक, शारीरिक और यौन अत्याचार, खतरनाक उर्वरकों के बीच रहना, जहरीले रासायनिक पदार्थों को लेकर कार्य करना, रहने की दुर्दशा, रंगभेद, नियंत्रित जीवन कानूनी सहायता लेने पर प्रतिबंध, बाल मजदूरों की पीड़ा, खराब स्वास्थ्य प्रबंध, असुरक्षित और मौत को निमंत्रित करते आवागमन के साधन, अपर्याप्त कानूनी प्रावधान. आयोग ने इन पर सुनवाई की और तत्काल सुधार के निर्देश दिये. बहस में आये आप्रवासी कृषि मजदूरों का औसत जीवन 49 वर्षों का है.

आप्रवासी मजदूरों की पीड़ा खुद अमेरिकी स्वीकारते हैं. पर दुख के साथ उन खेतों-फार्महाऊसों को ‘फील्ड आफ पेन’ (पीड़ा के मैदान) कहते हैं. पर उसके ठीक करने के अभियान में भी लगे हैं. छुपाते नहीं, पर सुधारने की कोशिश भी बताते हैं. जबरदस्त राष्ट्रीय बोध है. जैसे घर का कोई कमरा अंदर से कूड़ा भंडार बन गया है, तो अमेरिकी आपको बतायेंगे. नागरिक या सराकरी अधिकारी भी. खुलकर यह भी कहेंगे, पीड़ा और पश्चाताप के साथ कि यह हमारे सुंदर घर का बदबूदार कोना है. पर इसे हम सुधार रहे हैं और सुधारेंगे. यह संकल्प, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय बोध अमेरिका की अलग पहचान कराता है. जिद है, चुनौतियों से निबटने की और सुंदर घर के खराब कोने को ठीक करने की.
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