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‘लो सुगर’ प्रोडक्ट से जुड़ी भ्रांतियां और सुरक्षा से संबंधित सवालों के यह हैं जवाब...

Updated at : 15 Oct 2019 5:34 PM (IST)
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‘लो सुगर’ प्रोडक्ट से जुड़ी भ्रांतियां और सुरक्षा से संबंधित सवालों के यह हैं जवाब...

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह सिफारिश की है कि "फ्री सुगर" ( चीनी मुक्त खाद्य ) को कुल कैलोरी का 10 प्रतिशत से भी कम होना चाहिए ताकि जीवन में डायबिटीज जैसी बीमारियों के ख़तरे को कम किया जा सके. ज़्यादातर जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का हमारे खानपान से सीधा संबंध होता है, जिसे लोग […]

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह सिफारिश की है कि "फ्री सुगर" ( चीनी मुक्त खाद्य ) को कुल कैलोरी का 10 प्रतिशत से भी कम होना चाहिए ताकि जीवन में डायबिटीज जैसी बीमारियों के ख़तरे को कम किया जा सके. ज़्यादातर जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का हमारे खानपान से सीधा संबंध होता है, जिसे लोग प्रायः नज़रंदाज करते हैं.

पोषण संबंधित जानकारी नहीं होने के कारण यह कमजोर जीवन शैली को जन्म देता है और एक समय के बाद यह कमज़ोर स्वास्थ्य के रूप में प्रकट होता है.चीनी के अधिक सेवन से कई प्रकार की दीर्घकालीन बीमारियां होती हैं. कम कैलोरी मिठास यानी ‘लो सुगर’ का बाज़ार में आना ‘फ्री सुगर’ का विकल्प है जो मिठास से समझौता किये बगैर कुल कैलोरी आहार को कम करता है. हालांकि वे सुरक्षा चिंताओं के चलते जल्द ही विवादास्पद हो गये हैं.

अल्प कैलोरी मिठास की सुरक्षा के बारे में बताते हुए विष-विज्ञान और नियम विशेषज्ञ डॉ. रेबिका लोपेज़ गार्सीया ने कहा कि हम जानते हैं कि कम कैलोरी मिठास सुरक्षित है क्योंकि खाद्य योजक के रूप में उनका व्यापक मूल्यांकन कानून सही है. इसलिए यहां तक कि प्रत्येक देश की अपनी प्रणाली है लेकिन बुनियादी प्रोटोकॉल्स एक से हैं.मूल्यांकन का प्रारंभ अणुओं के साधारण अध्ययन से होता है फिर जटिल अध्ययन, जहां इनके पाचन, मलत्याग और शरीर पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है.यदि अणुओं की मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान किसी भी बिंदु पर कोई विषैला प्रभाव दिख जाता है तो आगामी अध्ययन रोक दिया जाता है और उस उत्पाद को कभी बाजार में नहीं लाया जाता. विष-विज्ञान का अध्ययन अंतराष्ट्रीय स्तर पर अनुमोदित प्रॉटोकॉल के आधार पर होता है. कभी कभी इसे पूरा होने में 20 साल तक का समय लग जाता है.सब प्रकार से अध्ययन पूरा होने के पश्चात अंतरराष्ट्रीय एवं स्थानीय प्राधिकरण इन याचिकाओं को देखतीं हैं और अंतराष्ट्रीय डेटा भी मंगवाती हैं.

वहीं सन्ध्या पांडेय, (क्लीनिकल न्यूट्रिशन हेड, फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम) का कहना है कि जब हम कम कैलोरी मिठास की सुरक्षा पर बात करते हैं तो इनके बाज़ार में आने से पूर्व इन पर किये गये शोध वर्षों के बारे में बात करते हैं. डायबिटीज कम कैलोरी मिठास के लक्ष्य समूहों में से एक हो सकता है और सुरक्षा विषयक मूल्यांकन में यह सुनिश्चित किया गया है कि वह एलसीएस ब्लड ग्लूकोस, इंसुलिन और डायबिटीज नियंत्रण-नियमन में कोई दखल नहीं देता है. इसके साथ ही कम कैलोरी मिठास को उनके पुनरुत्पादन प्रणाली के प्रभावों के लिए आकलित किया गया है. यह सुनिश्चित किया गया है कि उन लोगों के स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव न पड़े जो गर्भधारण की योजना बना रहे हैं या उन शिशुओं पर जो अभी विकसित हो रहे हैं.

गौर करने वाली बात यह है कि सुरक्षा के अतिरिक्त स्वाद भी उन लोगों के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय है जो लो सुगर प्रोडक्ट से सुगर यानी चीनी जैसे स्वाद की अपेक्षा रखते हैं. प्रसिद्ध भारतीय पाक-कला विशेषज्ञ संजीव कपूर बताते हैं कि " सही जानकारी सटीक पसंद की कुंजी है ". ज़्यादातर उच्च कैलोरी युक्त खाद्य पदार्थों में बदलाव मुश्किल है. हालांकि, सुगर जो कि भोजन में फ्री कैलोरी जोड़ता है उसे कम कैलोरी मिठास के साथ आसानी से प्रतिस्थापित किया जा सकता है. प्रायः लोग कहते हैं यह स्वाद वैसा नहीं है और मैं उनसे सहमत हूं. इसका स्वाद सौ फ़ीसदी वैसा नहीं होगा, हालांकि यदि कोई इसका दो-तीन हफ़्ते सेवन करता है तो उसकी आदत में यह स्वाद आ जायेगा. स्वाद के दस प्रतिशत के साथ आपका यह समझौता आपकी कुल कैलोरी सेवन को कम करने में मददगार साबित होगा.

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