जूट से बुन रही हैं सपने

Updated at : 05 Nov 2017 1:30 PM (IST)
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जूट से बुन रही हैं सपने

अलग करने की चाहत तो बहुतों की होती है, पर उन चाहतों को पूरा करने के लिए रास्ते तलाशने का हुनर बहुत कम लोगों को ही आता है. लेकिन वह कहते हैं न कि जहां चाह है, वहां राह अपने आप मिल ही जाती है. हर महिला की तरह पटेल नगर, पटना की रहनेवाली गायत्री […]

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अलग करने की चाहत तो बहुतों की होती है, पर उन चाहतों को पूरा करने के लिए रास्ते तलाशने का हुनर बहुत कम लोगों को ही आता है. लेकिन वह कहते हैं न कि जहां चाह है, वहां राह अपने आप मिल ही जाती है.
हर महिला की तरह पटेल नगर, पटना की रहनेवाली गायत्री देवी भी हमेशा से कुछ अलग करने, अपनी एक अलग पहचान बनाने का सपना देखती थीं. वर्ष 2006 में आस-पड़ोस की महिलाओं से पता चला कि पटना में केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय द्वारा कुटीर उद्योग से संबंधित ट्रेनिंग कैंप का आयोजन किया जा रहा है, तो उन्होंने भी अपनी किस्मत आजमाने की सोची.
मंत्रालय से मिला कार्ड, तो शुरू किया रोजगार
पड़ोस की नौ अन्य महिलाओं के साथ मिल कर गायत्री ने वस्त्र मंत्रालय से जूट का सामान बनाना सीखा. छह महीने की ट्रेनिंग के बाद स्वरोजगार स्थापित करने के लिए मंत्रालय की ओर से रोजगार कार्ड दिया गया. इससे उन्हें खुद का रोजगार शुरू करने और राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित मेलों में भागीदारी का भी मौका मिला. गायत्री ने छह हजार रुपये की पूंजी लगा कर स्वरोजगार शुरू किया. पहले में बाजार से पटुआ लाकर उससे जूट की रस्सियां बनातीं और फिर उन रस्सियों से सामान. बाद में जब लोगों को उनका काम पसंद आया और निर्मित सामानों की बिक्री बढ़ी, तो वह रेडिमेड जूट खरीद कर सामान बनाने लगीं. वह जूट का उपयोग कर ज्वेलरी, हैंडपर्स, बैग, चटाई, हैंडीक्राफ्टस आदि बनाती हैं. गायत्री के अनुसार- ”आम दिनों में 10-15 हजार रुपये कमा लेती हूं, वहीं मेलों में 25-30 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है.
स्टेट अवॉर्ड से हैं सम्मानित
गायत्री अब तक बिहार से बाहर जाने का मौका नहीं मिला है, पर बिहार के विभिन्न जिलों में आयोजित होनेवाले वार्षिक, मासिक मेलों तथा उद्यमिता विकास विकास संस्थान की ओर से लगनेवाले अनेक मेलों में वह अपनी कला का प्रदर्शन जरूर कर चुकी हैं. इसके अलावा वह थोक, खुदरा या व्यक्तिगत स्तर पर भी अपने उत्पाद की बिक्री करती हैं. इसके लिए गायत्री को वर्ष 2013 में डॉ भीम और डॉ रेणु कुशवाहा जी के हाथों स्टेट अवॉर्ड भी मिल चुका है. गायत्री बताती हैं- अब बच्चे बड़े हो गये हैं, तो पहली बार अगले महीने आयोजित होनेवाले ताज महोत्सव में भागीदारी के लिए फॉर्म भरा है. फिलहाल उसी की तैयारी में लगी हूं.”
खुद सीख कर अब कर रहीं सिखाने का काम
मात्र 12वीं पास गायत्री ने अपने हुनर के बूते अपना जीवन संवार लिया. अब वह दूसरी महिलाओं को भी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रशिक्षित कर रही हैं. पिछले कुछ समय से एक राष्ट्रीय बैंक की ग्रामीण शाखा की ओर से आयोजित ट्रेनिंग कैंप में वह करीब 15-20 महिलाओं को जूट कला का प्रशिक्षण दे रही हैं. यही नहीं पिछले कई वर्षों से साल उद्यमिता विकास संस्थान की ओर से स्कूली बच्चों के लिए आयोजित समर कैंप में भी वह ट्रेनिंग भी दे रही है. गायत्री की इच्छा है कि भविष्य में उनकी खुद की एक दुकान हो. साथ ही वह चाहती हैं कि सरकार ट्रेनिंग देने के साथ ही, अगर बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए मार्केटिंग की थोड़ी-बहुत जानकारी दे दे, तो उनके जैसे लाखों लोगों की जिंदगी और भी बेहतर बन सकती है.
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