स्वस्थ मुंह से मुस्कुरायेगी जिंदगी, तंबाकू छोड़ें, कैंसर से बचें

Updated at : 13 Sep 2017 1:54 PM (IST)
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स्वस्थ मुंह से मुस्कुरायेगी जिंदगी, तंबाकू छोड़ें, कैंसर से बचें

ओरल केयर का मतलब है, मुंह की देखभाल. हम जो भी खाते हैं, वो दांतों द्वारा चबाया जाता है और फिर मुंह में ही मौजूद स्लाइवरी ग्लैंड्स की मदद से उसे पचाने लायक बनाते हैं. इसके बाद यह छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट कर गैस्ट्रिक ग्लैंड, पैन्क्रियाज, लिवर और आंत में मौजूद एंजाइम्स की मदद से […]

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ओरल केयर का मतलब है, मुंह की देखभाल. हम जो भी खाते हैं, वो दांतों द्वारा चबाया जाता है और फिर मुंह में ही मौजूद स्लाइवरी ग्लैंड्स की मदद से उसे पचाने लायक बनाते हैं. इसके बाद यह छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट कर गैस्ट्रिक ग्लैंड, पैन्क्रियाज, लिवर और आंत में मौजूद एंजाइम्स की मदद से पाचन योग्य बनता है. इसलिए यदि हमारा मुंह, जिसमें दांत, जीभ, मसूड़े आदि आते हैं स्वस्थ नहीं रहेंगे, तो हमारा पूरा पाचन तंत्र गड़बड़ा जायेगा.
मुंह का सबसे अभिन्न अंग है दांत, जिसे मसूड़े जकड़ कर रखते हैं. अत: दोनों का स्वस्थ रहना जरूरी है. हममें से 90 प्रतिशत लोग डेंटिस्ट के पास तभी जाते हैं, जब दांतों में असहनीय दर्द हो या फिर उसमें कीड़े लग जायें.
ऐसा इसलिए है कि हम अपनी दातों के स्वास्थ्य की अहमियत नहीं जानते और कुछ लोग तो जानबूझ कर भी ऐसी गलतियां करते हैं-जैसे तंबाकू, गुटका और पान मसाला का सेवन. भारत में कैंसर से ग्रसित मरीजों में 30 प्रतिशत लोग कैंसर से जूझ रहे हैं, पुरुषों में होनेवाला सबसे से खराब कैंसर है और इसमें भी परेशानी की बात यह है कि यह हमारी गलतियों का नतीजा है.
सुबह कुछ भी खाने से पूर्व ब्रश करें और कुछ भी खाने के बाद कुल्ला करें साथ में दांतों में फंसे भोजन के टुकड़े को निकालने के लिए फ्लॉश करें, तो हमारी आधी परेशानी हल हो जाती है. खान-पान की आदतों का असर भी ओरल हेल्थ पर पड़ता है.
दो बार ब्रश करना है जरूरी
प्रतिदिन दो बार यानी एक बार सुबह खाने से पूर्व और रात को खाने के बाद ब्रश करना जरूरी है. ब्रश मुलायम ब्रिसेल्सवाले ब्रश से ही करें. कड़े ब्रश से मसूड़े व दांत घिस जाते हैं. कई बार सूजन भी हो जाता है. उपयुक्त मात्रा में फ्लोराइडवाला टूथपेस्ट यूज करें. इसके साथ ही ब्रश तीन से पांच मिनट तक करें, पर ब्रश को मुंह में लगा कर मत घूमें. ब्रश करने की दिशा ऊपर-नीचे, आगे-पीछे और गोलाकार मुद्रा में होनी चाहिए.
ब्रश करने के बाद जीभिया से जीभ जरूर साफ करें, क्योंकि सबसे ज्यादा बैक्टीरिया जीभ पर ही जमें होते हैं और कुल्ला नहीं करने से ये पेट में संक्रमण फैलाते हैं. साथ में खाना खाने के बाद या कुछ भी हल्का खाने के बाद भी कुल्ला जरूर करें.
मीठी चीजों से करें परहेज
दातों को सबसे ज्यादा नुकसान शुगर युक्त भोज्य पदार्थों से ही होता है, क्याेंकि मीठी चीजों से बैक्टीरिया हावी होने लगते हैं. खासकर दांतों में चिपकनेवाले चॉकलेट्स. इसलिए यदि बच्चों को चॉकलेट दें, तो खाने के बाद उनके दांत जरूर साफ करवाएं.
सुंदर मुस्कान के लिए केयर जरूरी
आम तौर पर दूध के दांत 12 साल की उम्र में टूटते हैं, पर खेल-कूद के दौरान चोट लग जाने या किसी अन्य वजह से छह-सात वर्ष की उम्र में यदि उनके दांत टूट जाये, तो अगले सात सालों तक उनका वह दांत नहीं आता ऐसे में परमानेंट दांत टेढ़े-मेढ़े निकलने की आशंका होती है. यदि ऐसा हो, तो डेंटिस्ट से मिलें. आधुनिक चिकित्सा पद्धति में दंत रोगों का हर इलाज संभव है, यदि मरीज समय से डॉक्टरी सलाह लें. यदि समय से पहले दांत टूट जायें, तो दांतों को टेढ़ा होने से बचाने के लिए क्लिप लगा सकते हैं. ये क्लिप अंदर से या बाहर से लगाये जा सकते हैं और दूध के दांतों को नियमित दांत आने तक सपोर्ट कर सकते हैं.
प्रस्तुति : सौरभ चौबे
अक्सर मुंह में होनेवाले सामान्य से छाले को हम गंभीरता से नहीं लेते हैं. इनको छोटी बीमारी समझ कर टाल देते हैं. दरअसल, ये सामान्य दिखनेवाली बीमारी मुंह के कैंसर का अलार्म भी हो सकती है. इसका समय पर इलाज न हो, तो ये जानलेवा भी साबित हो सकती है. कैंसर वैसे तो जानलेवा बीमारी माना जाता है, पर शुरुआती अवस्था में इसके लक्षणों को पहचान कर उपचार किये जायें, तो यह पूरी तरह ठीक हो जाता है.
क्या है ओरल कैंसर
ओरल कैंसर का शाब्दिक अर्थ है, मुंह में होनेवाला कैंसर. यह गाल, मसूड़ों, जीभ, गला और स्लाइवा ग्लैंड्स में हो सकता है. इसका मुख्य कारण है, मुंह की साफ-सफाई का ठीक ढंग से ख्याल नहीं रखना और खराब खान-पान की आदत व व्यसन. मुंह में दर्द, ओठ, जीभ, गाल, मुंह के ऊपरी हिस्से आदि पर कोई मुलायम या कठोर गांठ ओरल कैंसर हो सकता है. गले के ऊपरी हिस्से में कोई भी सिस्ट मुंह का कैंसर हो सकता है. फिर चाहे वह जीभ, चेहरे की हड्डियां या फिर पैलेट में क्याें न हो.
कौन है खतरे के घेरे में
विश्व स्तर पर देखा जाये, तो मुंह के कैंसर के सबसे ज्यादा मामले भारतीयों में ही पाये जाते हैं. इसका प्रमुख कारण है, भारतीयों में तंबाकू और गुटका चबाने की आदत. इसके अलावा आजकल की जीवनशैली और अनहाइजीनिक फास्ट फूड व अधिक फैट व कोलेस्ट्रॉल भी इसका परोक्ष रूप से कारण बनता है. आंकड़ों के अनुसार सभी कैंसरों में से ओरल कैंसर की हिस्सेदारी तीस प्रतिशत है.
यूपी, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और नॉर्थ इस्ट के सभी सातों राज्यों में ओरल कैंसर के मरीजो की तादाद अन्य कैंसर के मुकाबले ज्यादा है. आंकड़ों के अनुसार महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में ओरल कैंसर के मामले ज्यादा पाये जाते हैं.
धूम्रपान और तंबाकू मुख्य कारक
धूम्रपान करनेवाले, तंबाकू का सेवन करनेवाले लोगों में यह कैंसर 50 प्रतिशत तक अधिक पाया जाता है. जो लोग सिगरेट के साथ शराब का सेवन करते हैं, उन्हें भी कैंसर जल्दी होने का खतरा होता है. ओरल कैंसर के कुछ कारक आनुवंशिक भी हो सकते हैं.
कब मिलें डेंटिस्ट या डॉक्टर से
यदि मुंह में कोई भी छाला या सूजन 15 दिनों से अधिक रहे या छाला सफेद रंग का हो, तो सबसे पहले डेंटिस्ट से दिखाएं. यदि वे सलाह दें, तो ऑन्कोलॉजिस्ट से मिल कर कुछ जरूरी जांच करा लें. याद रहे कि शुरुआती लक्षणों को भांप कर यदि इसका इलाज करा लिया जाये, तो संभव है कि सिस्ट को कैंसर में तब्दील होने से पूर्व ही इसका पूरा और आसान इलाज किया जाये.
कैसे होता है उपचार
यदि कैंसर पहले और दूसरे स्टेज का हो, तो भी पूरा इलाज संभव है. इसके लिए कंबाइड ट्रीटमेंट की जरूरत होती है, जिसमें सर्जरी, दवा, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी शामिल हैं. मरीज की बीमारी और अवस्था के अनुसार डाॅक्टर उपचार की सलाह देते हैं. सर्जरी के बाद जो आस-पास की संक्रमित कोशिकाएं होती हैं, उन्हें कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की मदद से नष्ट कर दिया जाता है, ताकि उसका प्रसार न हो सके.
बातचीत : दीपा श्रीवास्तव
ये लक्षण हो सकते हैं खतरनाक
– मसूढ़े, ओठ आदि पर सूजन या गांठ
– मुंह के अंदर सफेद या लाल पैच आना
– मुंह से खून का स्राव होना – कुछ भी खाने, चबाने और बात करने पर जबड़े में दर्द
– गले में दर्द और आवाज में बदलाव
– कान में दर्द
– वजन कम होना – मुंह का कोई भी घाव, जो 15 दिनों में ठीक न हो
कैविटी से बचना जरूरी
दातों को ज्यादा परेशानी कैविटी से होती है. कैविटी बैक्टीरिया द्वारा बनायी गयी एक परत होती है, जिसके कारण दांत पीले नजर आते हैं. कैविटी को यदि नियमित रूप से साफ किया जाये, तो यह परेशान नहीं करता, पर कैविटी यदि जमकर ठोस हो जाये, तो उसे टार्टर कहते हैं.
बहुत लोगों को लगता है कि टार्टर दांतों को सपोर्ट करता है, पर सच यह है कि टार्टर धीरे-धीरे मसूड़ों को कमजोर बनाता है और उसकी जड़ों को खोखला करता जाता है. दातों की कैविटी को हटाने के लिए कई उपाय किये जा सकते हैं. इसमें फिलिंग, क्राउनिंग और आरसीटी (यदि नसें मृत हो चुकी हों). लेजर तकनीक से भी टार्टर को हटाया जाता है. एक और तकनीक है-रिमिलाइनेशन. इसमें दांतों की संरचना को फिर से खनिज तत्व प्रदान किये जाते हैं.
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