पढ़ें, घरों में बच्चों और पेरेंट्स के सामने किस तरह की आ रही हैं परेशानियां

वीना श्रीवास्तव साहित्यकार व स्तंभकार, इ-मेल : veena.rajshiv@gmail.com, फॉलो करें – फेसबुक : facebook.com/veenaparenting ट्विटर : @14veena आज सभी घरों में बच्चों और पेरेंट्स के सामने इस तरह की परेशानियां आ रही हैं. अनजाने में कहीं-न-कहीं आपके बच्चे और आप भी इस तरह से सोच सकते हैं, तो आप भी सचेत हो जाइए. बच्चे इसलिए […]
वीना श्रीवास्तव
साहित्यकार व स्तंभकार, इ-मेल : veena.rajshiv@gmail.com, फॉलो करें –
फेसबुक : facebook.com/veenaparenting
ट्विटर : @14veena
आज सभी घरों में बच्चों और पेरेंट्स के सामने इस तरह की परेशानियां आ रही हैं. अनजाने में कहीं-न-कहीं आपके बच्चे और आप भी इस तरह से सोच सकते हैं, तो आप भी सचेत हो जाइए. बच्चे इसलिए परेशान हैं कि मां–पापा उन्हें समझते ही नहीं, उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश ही नहीं करते और अभिभावक इसलिए परेशान हैं कि बच्चे समय और उम्र से कहीं से ज्यादा तेज हैं. दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा करना होगा और समय देना होगा. आपके लिए भी अलार्म है.
आज जो आपसे शेयर कर रही हूं, मुझे विश्वास है कि आपकी आंखों में आंसू जरूर आयेंगे. यह एक छोटी बच्ची के इमोशन हर्ट होने के बारे में है. पांचवीं में पढ़नेवाली बेटी ने लिखा है- “हमारे घर आफ्टर 6 इयर्स आशु (बदला हुआ नाम) का जन्म हुआ. अब वह दो साल का है. मैं उसे खूब प्यार करती हूं, लेकिन अब मेरे डैडी- मम्मा मुझे उतना प्यार नहीं करते जितना भाई को करते हैं. पहले तो प्यार करते थे, मगर अब कहते हैं कि तुम तो अपने घर चली जाओगी. हमारा तो यही सहारा है. जब भाई हुआ था, तो फुआ आयी थीं तब मैंने सुना था मैम, मम्मा ने उनसे कहा था- “भगवान ने हमारी सुन ली.
हमारे बुढ़ापे का सहारा भेज दिया. यह तो चली जायेगी. वैसे भी अभी से टेंशन है इसकी शादी की. मंहगाई बढ़ रही है. कैसे करूंगी सब?” मैम, क्या बेटियां वाकई इतनी टेंशन देनेवाली होती हैं ? क्या सभी लोग बेटियों को इतना बुरा मानते हैं? क्या मैं भी इतनी बुरी हूं? क्या मैं मम्मा की परेशानी का रीजन हूं? क्या शादी करना जरूरी होता है? शादी करके बेटी ही क्यूं लड़के के घर जाती है, लड़का क्यूं नहीं लड़की के घर आकर रहता? ऐसा करेगा, तो लड़की के पेरेंट्स को कोई प्रॉब्लम नहीं होगी, लेकिन मैम मेरी फ्रैंड्स तो मुझे ‘सैड’ नहीं दिखती. मे बी, उनके पेरेंट्स भी कहते हों और वे मुझसे शेयर न करती हों, जैसे मैंने भी तो उनसे शेयर नहीं किया. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, लेकिन बिलकुल नहीं अच्छा लगता. मुझ पर मम्मा ध्यान ही नहीं देती. एक दिन मम्मा के लिए मैंने वेज सेंडविचेज बनाये. ब्रेड पर कुकम्बर, केरेट और अनियन काट कर चीज स्प्रेड डाल कर अरेंज किया और छोटा कट भी हाथ में लग गया, जिसमें ब्लड भी निकला. यू नो, वाय? जस्ट टू फाइंड हर अटेंशन. बट शी सेड- ‘रख दो, अभी आशु को खिला दूं, फिर देखती हूं कैसा बनाया तुमने’, जबकि मैंने पहले कुछ नहीं बनाया था और मैं रूम में जाकर खूब रोई. क्यों किया मम्मा ने ऐसा? मैं बस चाहती थी कि मम्मा सरप्राइज्ड हों और मुझे ‘हग’ करें, लेकिन वह तो भाई में ही लगी रहीं, जैसे मैं तो उनकी बेटी हूं ही नहीं. वह मुझे क्यों नहीं प्यार करतीं? क्या मैं उनकी बेटी नहीं? क्या मेरी कोई इंपोर्टेंस नहीं? मैंने जब उससे पूछा कि आप कितनी बड़ी हो? किस क्लास में हो? तो जो जवाब आया वह पढ़िए.
‘’मैं 11 साल की हूं. फिफ्थ में पढ़ती हूं. क्या आप भी अपनी बेटी से ऐसे ही ट्रीट करते हो? क्यों लोग बेटियों से नफरत करते हैं. आप सब लोग प्लीज हम बेटियों को प्यार करिए. हम आपको बेटों से ज्यादा प्यार करेंगे. मम्मा पहले ऐसी नहीं थी. अब तो बस भाई- भाई ही है, मैं नहीं. मम्मा कैसे मुझे प्यार करेंगी? मैं क्या करूं कि मम्मा खुश हो जायें, मम्मा हैप्पी फील करें. मैम प्लीज हेल्प मी. आय एम लाइक यॉर डॉटर.’’
आप ही बताइए क्या आपकी आखें नम नहीं हुईं? अगर हमारी बेटियां ऐसा सोचने लगें, रोने लगें, तो दुख तो होगा ही. आप सभी बच्चे हमारे अपने हो. हम माता-पिता केवल अपने बच्चों के ही नहीं, बल्कि उनके दोस्तों के भी माता- पिता की तरह ही हैं. हमारे बच्चों की परेशानी के साथ-साथ उनके दोस्तों की परेशानी भी हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए जितनी कि हमारे बच्चों की परेशानी हमारे लिए है. पहले मैं आपसे कहूंगी कि जो भी मेल लिखते हैं, उन्हें यह लिखने की जरूरत नहीं कि उनकी पहचान गुप्त रखी जाये, क्योंकि हमारी नैतिकता ही यह गवाही नहीं देती कि हम किसी के व्यक्तिगत अनुभव, घटनाएं, दर्द उनकी पहचान के साथ सार्वजनिक करें. हमारा उद्देश्य है कि उन उदाहरणों के माध्यम से हम वह बातें आपके सामने रखें, जिनसे हम सब जूझ रहे हैं. रोज दो- चार हो रहे हैं. बच्चे, युवा व अभिभावक क्या सोच रहे हैं? उनकी एक-दूसरे से अपेक्षाएं क्या हैं? बच्चों और पेरेंट्स के बीच संवादहीनता ने जो वैक्यूम बनाया है, उससे दोनों के बीच कितनी दूरियां बढ़ी हैं, ताकि उन बातों से हम सचेत हो सकें. उन घटनाओं से सबक ले सकें, क्योंकि बुद्धिमानी तो इसी में है कि हम हवा के रुख को पहचान कर ही चलें. वरना ऊर्जा नष्ट करने से लाभ नहीं. अगर हम वक्त के साथ नहीं चले, तो वक्त को तो चलना है, वह चलेगा और आगे निकल जायेगा, हम ही कहीं पीछे रह जायेंगे.
जो भी मुझे मेल लिखते हैं, मैं उन्हें जवाब जरूर देती हूं. देर हो सकती है. बच्चों की समस्याओं का समाधान करने की, उन्हें समझाने की पूरी कोशिश करती हूं. गाइड करती हूं. उनके मेल उदाहरण स्वरूप आपके सामने रखती हूं, क्योंकि वह परेशानी आपके घर, आपके बच्चे या आपकी भी हो सकती है. लिखनेवाले को लगता है कि यह उसकी परेशानी है, मगर आज सभी घरों में बच्चों और पेरेंट्स के सामने इस तरह की परेशानियां आ रही हैं. अनजाने में कहीं-न-कहीं आपके बच्चे और आप भी इस तरह से सोच सकते हैं, तो आप भी सचेत हो जाइए. बच्चे इसलिए परेशान हैं कि मां–पापा उन्हें समझते ही नहीं, उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश ही नहीं करते और अभिभावक इसलिए परेशान हैं कि बच्चे समय और उम्र से कहीं से ज्यादा तेज हैं. दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा करना होगा और समय देना होगा. आपके लिए भी अलार्म है. यानी आनी वाली परिस्थितियों और अनदेशों को भांपकर, सोच-समझकर कदम बढ़ाना होगा. अलार्म इसीलिए होते हैं, जिससे हम समय पर आसानी से कार्य निपटा सकें.
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